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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 330 में से

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पृष्ठ 129

६४ तर्कभाषा [ मरुमरीचिका
हल्की वस्तु सदा ऊपर रहती है। इसलिये गर्म वायु भी हल्की होकर ऊपर
जाने लगती है और उसका स्थान लेने के लिए ऊपर की ठंडी वायु नीचे
आने लगती है। परन्तु नीचे आकर भूमि का स्पर्श होते ही वह भी गर्म और
हल्की होकर ऊपर जाने लगती है। इस प्रकार वायुमण्डल में अत्यन्त शीघ्रता
से परिवर्तन होने लगता है। इसी परिवर्तन के वेग के कारण मरुस्थल में
आँधियाँ बहुत अधिक आती हैं और यही वायुमण्डल का परिवर्तन प्रकाश
की किरणों के मार्ग परिवर्तन के द्वारा 'मरुमरीचिका' या 'मृगतृष्णा' आदि का
कारण होता है। 'मरीचि' शब्द का अर्थ किरण होता है। मरुस्थल के वृक्ष
आदि से प्रतिक्षिप्त होने वाली प्रकाश की किरणों के मार्ग के 'माध्यम' में
घन विरल भाव के तारतम्य से उनकी गति में क्रमिक परिवर्तन द्वारा वृक्ष आदि
का उल्टा प्रतिबिम्ब सा दीखने लगने के कारण ही मरुस्थल में जल की मिथ्या
प्रतीति होने लगती है। इसीलिए उस जल के मिथ्या ज्ञान को 'मरुमरीचिका'
कहा जाता है।
न्यायदर्शन के भाष्यकार वात्स्यायन ने प्रत्यक्ष सूत्र के भाष्य में लगभग
इसी रूप में 'मरुमरीचिका' का उल्लेख इस प्रकार किया है:—
'ग्रीष्मे¹ मरीचयो भौमेनोष्मणा संसृष्टाः स्पन्दमाना दूरस्थस्य चक्षुषा सन्नि-
कृष्यन्ते । तत्रेन्द्रियार्थसन्निकर्षादुदकमिति ज्ञानमुत्पद्यते । तत्प्रत्यक्षं प्रसज्यत
अत आह अव्यभिचारीति' ।
अर्थात् ग्रीष्मकाल में पृथिवी की गर्मी के कारण अपने मार्ग से विचलित
होकर प्रकाश की किरणें दूरस्थ पुरुष की आँखों में पहुँचती हैं। इसके कारण
उसको वहाँ जल का ज्ञान होता है। यह ज्ञान व्यभिचारी ज्ञान है। वह प्रत्यक्ष
की श्रेणी में न आ जाय इसलिए सूत्रकार ने प्रत्यक्ष के लक्षण में अव्यभिचारी
पद का ग्रहण किया है।
भाष्यकार ने प्रकाश की किरणों के मार्ग परिवर्तन के लिए 'स्पन्दमानाः'
पद का प्रयोग किया है। 'स्पदि' धातु जिससे 'स्पन्दमाना' पद बना है, का
अर्थ 'स्पदि किंचिच्चलने' है। अर्थात् प्रकाश की किरणों में परिवर्तन माध्यम के
परिवर्तन के अनुसार थोड़ा-थोड़ा होता है इस प्रकार यह अनुमान किया जा
सकता है कि 'प्रकाश विज्ञान' का यह सिद्धान्त प्राचीन आचार्यों को भी
विदित था।
हमने अपनी दर्शनमीमांसा में इन्द्रिय तथा अर्थ के सन्निकर्ष देश की
चर्चा करते हुए इस विषय में लिखा है—
१ न्यायदर्शन वात्स्यायन भाष्य १, १, ४ ।