तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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प्रत्यक्षम्
किं पुनः प्रत्यक्षम् ?
साक्षात्कारिप्रमाकरणं प्रत्यक्षम् । साक्षात्कारिणी च प्रमा सैवोच्यते
या इन्द्रियजा । सा च द्विधा सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदात् । तस्याः करणं
त्रिविधम् । कदाचिद् इन्द्रियं, कदाचित् इन्द्रियार्थसन्निकर्षः, कदाचिज् ज्ञानम् ।
[ प्रश्न ] फिर प्रत्यक्ष किसको कहते हैं ?
[ उत्तर ] साक्षात्कारिणी प्रमा के करण को प्रत्यक्ष कहते हैं । और साक्षा-
त्कारिणी प्रमा उसको ही कहते हैं जो इन्द्रिय जन्य [ प्रमा ] होती है । वह दो
प्रकार की है [एक] सविकल्पक और [दूसरी] निर्विकल्पक भेद से । उसके करण
तीन प्रकार के हैं । १ कभी इन्द्रिय २ कभी इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष, और
कभी ( निर्विकल्पक ) ज्ञान ।
'प्रत्यक्ष' शब्द का प्रयोग मुख्यतः, साक्षात्कारिणी प्रमा के 'करण' के लिए
होना चाहिए । परन्तु उस करण से उत्पन्न होने वाली प्रमा जो उस प्रमाण का
फल है वह भी 'प्रत्यक्ष' नाम से व्यवहार में कही जाती है । अन्य प्रमाणों में
तो फल और करण में अलग-अलग शब्द प्रयुक्त होते हैं । जैसे अनुमान प्रमाण
के फल के लिए अनुमिति, उपमान प्रमाण के फल के लिए उपमिति, शब्द
प्रमाण के फल के लिए शाब्दबोध, शब्दों का प्रयोग प्रायः होता है । इसलिए
उनमें 'प्रमाण' और 'प्रमा' का व्यवहार भिन्न-भिन्न शब्दों से होता है । परन्तु
प्रत्यक्ष स्थल में 'प्रमाण' और 'प्रमा' दोनों के लिए ही प्रत्यक्ष पद का प्रयोग
होता है । इसलिए यथास्थान उसका उचित अर्थ ग्रहण करना चाहिए ।
प्रत्यक्ष ज्ञान के दो भेद किए हैं एक 'सविकल्पक' और दूसरा 'निर्विक-
ल्पक' । 'नामजात्यादियोजनासहितं सविकल्पकम्' अर्थात् जिसमें वस्तु के स्वरूप
की प्रतीति के साथ उसके नाम जाति आदि का भी भान होता है उसको
सविकल्पक कहते हैं । जैसे घटः पटः आदि की प्रतीति के साथ उनके नाम
जात्यादि का भान होने से, साधारणतः व्यवहार में आने वाले सभी ज्ञान सवि-
कल्पक के उदाहरण हैं । परन्तु जहां केवल वस्तु का स्वरूप प्रतीत होता है
उसके नाम जाति आदि की प्रतीति नहीं होती उसको निर्विकल्पक ज्ञान कहते
हैं । साधारणतः हमारे सभी व्यवहार में आने वाले ज्ञान सविकल्पक ही होते
हैं । इसलिए हम निर्विकल्पक ज्ञान की कल्पना नहीं कर पाते हैं । इसलिए
निर्विकल्पक ज्ञान का उदाहरण विशेष रूप से बालक तथा गूंगे आदि पुरुषों
के ज्ञान को बताया गया है ॥