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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 330 में से

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पृष्ठ 113

४८ तर्कभाषा [ प्रत्यक्षम्
कदा पुनरिन्द्रियं करणम् ? यदा निर्विकल्परूपा प्रमा फलम् । तथा
हि, आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन । इन्द्रियाणां
वस्तुप्राप्यप्रकाशकारित्वनियमात् । ततोऽर्थसन्निकृष्टेनेन्द्रियेण निर्विकल्पकं
नामजात्यादियोजनाहीनं वस्तुमात्रावगाहि किञ्चिदिदमिति ज्ञानं जन्यते ।
तस्य ज्ञानस्येन्द्रियं करणं, छिदाया इवं परशुः । इन्द्रियार्थसन्निकर्षोऽवा-
न्तरव्यापारः छिदाकरणस्य परशोरिव दारुसंयोगः । निर्विकल्पकं ज्ञानं
फलं, परशोरिव छिदा ।
कल्पक ज्ञान उसका फल और बीच का दूसरा अर्थात् इन्द्रियार्थसन्निकर्ष
अवान्तर व्यापार होगा । अर्थात् इन्द्रिय को कब करण कहा जायगा जब
निर्विकल्पक ज्ञान को फल और इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को अवान्तर व्यापार माना
जाय । इसी प्रकार जब दूसरी संख्या के इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को करण माना
जायगा तब तीसरी संख्या के निर्विकल्पक ज्ञान को अवान्तर व्यापार और चौथी
संख्या के सविकल्पक ज्ञान को फल कहा जायगा । इसी प्रकार जब तीसरी
संख्या के निर्विकल्पक ज्ञान को करण कहा जायगा तब चौथी संख्या का सवि-
कल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार और पाँचवीं संख्या की हानोपादानोपेक्षाबुद्धि
फल होगी । इसी पद्धति से आगे तीन प्रकार के करणों की व्याख्या कहते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर इन्द्रिय कब करण होती है ?
[ उत्तर ] जब [ तृतीय संख्या वाला ] निर्विकल्पक [ ज्ञान ] रूप प्रमा फल
होती है । जैसे कि [पहिले १] आत्मा का मन के साथ संयोग होता है [फिर २]
मन का इन्द्रिय के साथ [ ३ ] इन्द्रिय अर्थ के साथ [ संयुक्त होती है ] इन्द्रियों
के वस्तु को प्राप्त करके [ अर्थात् वस्तु से सम्बद्ध होकर ] ही अर्थ को प्रकाशित
[ अर्थात् पदार्थ का ज्ञान करा सकती है ऐसा ] करने का नियम होने से ।
तब [ अर्थात् इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष होने के बाद ] अर्थ से संयुक्त
इन्द्रिय के द्वारा नाम जाति आदि की योजना से रहित वस्तु [ के स्वरूप ] मात्र
का ग्रहण करने वाला यह कुछ [नाम जात्यादि रहित सी वस्तु] है इस प्रकार का
निर्विकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है। उस [नाम जात्यादि योजना रहित निर्विकल्पक]
ज्ञान का करण इन्द्रिय होती है । जैसे छेदन [ अर्थात् लकड़ी आदि के काटने
की ] क्रिया का [ करण ] फरसा [ होता है ] २ इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष
अवान्तर व्यापार होता है जैसे काटने के साधनभूत फरसे का [ लकड़ी के
काटने में ] लकड़ी [ दारु ] के साथ संयोग [ अवान्तर व्यापार होता है ]
[ और ३ संख्या का ] निर्विकल्पक ज्ञान फल [ होता है ] जैसे फरसे [ रूप
करण का फरसा और लकड़ी के संयोग रूप अवान्तर व्यापार द्वारा ] का [ फल ]
कटना [ होता है ] ।