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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 330 में से

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पृष्ठ 126

अलौकिकसन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६१
न वा' इस प्रकार का संशय ही नहीं बन सकता है। क्योंकि वर्तमान धूम और
वह्नि का तो सम्बन्ध गृहीत ही है। उनमें व्यभिचार शङ्का हो ही नहीं सकती ।
और कालान्तर देशान्तर के धूम का ग्रहण 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' द्वारा ही
हो सकता है अतएव 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' अवश्य माननी चाहिए । इसी
लिए आचार्य पक्षधर मिश्र ने 'सामान्यलक्षणा' को न मानने वाले श्रीरघुनाथ
शिरोमणि का, जो कि काणे थे, उपहास करते हुए कहा था:—
'वक्षोजपानकृत् काण ! संशये जाग्रति स्फुटे ।
सामान्यलक्षणा कस्मादकस्मादपलप्यते ॥'
तर्कभाषाकार ने केवल षोढा लौकिक सन्निकर्ष का ही प्रतिपादन किया है ।
अधिक क्लिष्ट होने से त्रिविध अलौकिक सन्निकर्ष का प्रतिपादन नहीं किया है ।
हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में इस त्रिविध अलौकिक सन्निकर्ष का निरूपण
इस प्रकार किया है—
इन्द्रियार्थसन्निकर्षं दर्शयति—
न्यायादौ प्राप्यकारित्वमिन्द्रियाणां यदिष्यते ।
तदिन्द्रियार्थसम्बन्धजिज्ञासां सन्तनोति वै ॥
लौकिकोऽलौकिकश्चेति स तु तावद् द्विधाकृतः ।
षड्विधो लौकिकस्तत्र त्रिविधश्चास्त्यलौकिकः ॥
अलौकिकं सन्निकर्षं त्रिधा विभजते—
ज्ञानलक्षणसम्बन्धस्तथा सामान्यलक्षणः ।
योगजश्चेति विज्ञेयस्त्रिविधोऽयमलौकिकः ॥
तत्र ज्ञानलक्षणप्रत्यासत्तिं दर्शयति—
चन्दनग्रहणे दूरात् सौरभं यत्तु गृह्यते ।
ज्ञानलक्षणसम्बन्धजन्यं तच्चाक्षुषं मतम् ॥
ज्ञानं गुणो निरंशोऽतो नांशभेदोऽत्र विद्यते ।
सौरभांशे स्मृतिर्नातो चाक्षुषं ज्ञानलक्षणात् ॥
सामान्यलक्षणप्रत्यासत्तिं दर्शयति—
धूमादिसहचारोऽयं सर्वधूमादिगोचरः ।
सन्, व्याप्तिं ग्राहयेत् तस्मान्मता सामान्यलक्षणा ॥
सर्वाग्निसहचारोऽयं धूमेष्वखिलकेषु च ।
कथं गृह्येत सामान्यलक्षणा चेन्न मन्यते ॥
१. दर्शन मीमांसा ४ ।