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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 118, कुल 330 में से

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पृष्ठ 118

षोढा सन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५३
इन्द्रियार्थयोस्तु यः सन्निकर्षः साक्षात्कारिप्रमाहेतुः स षड्विध एव ।
तद्यथा, संयोगः, संयुक्तसमवायः, संयुक्तसमवेतसमवायः, समवायः, समवेतसमवायः
विशेष्यविशेषणभावश्चेति ।
तत्र यदा चक्षुषा घटविषयं ज्ञानं जयन्ते तदा चक्षुरिन्द्रियं, घटोऽर्थः।
परन्तु उनमें भी नव्य और प्राचीन भेद से कुछ मतभेद है । प्राचीन परम्परा के
अनुसार निर्विकल्पक को प्रमा रूप माना जाता है । जैसा कि श्रीधराचार्य ने
'कन्दली' के पृष्ठ १९८ पर स्पष्ट किया है। परन्तु नव्य न्याय में आकर निर्विकल्पक
ज्ञान के प्रमात्व विषय में दो प्रकार के मत हो गए हैं। 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावली'
की कारिका १३४ में 'भ्रमभिन्नं ज्ञानमत्रोच्यते प्रमा' यहां भ्रम भिन्न ज्ञान को
प्रमा कहा है । इससे निर्विकल्पक ज्ञान भी भ्रम भिन्न होने से प्रमा श्रेणी में
आ जाता है । अर्थात् विश्वनाथ को निर्विकल्पक ज्ञान का प्रमात्व अभीष्ट है ।
परन्तु नव्य न्याय के प्रमुख व्यवस्थापक गङ्गेशोपाध्याय के अनुसार निर्वि-
कल्पक ज्ञान न प्रमा कहा जा सकता है और न अप्रमा । क्यों कि उनके यहाँ
प्रमात्व और अप्रमात्व दोनों प्रकारता [ विशेषणता ] आदि घटित ज्ञान हैं और
निर्विकल्पक ज्ञान प्रकारतादि शून्य है । इसलिए वह प्रमा और अप्रमा दोनों
से विलक्षण है । इस नव्य मत का उल्लेख करते हुए विश्वनाथ ने लिखा है:—
'अथवा तत्प्रकारं यज्ज्ञानं तद्वद्विशेष्यकम् ।
तत्प्रमा, न प्रमा नापि भ्रमः स्यान्निर्विकल्पकम् ॥
प्रकारतादिशून्यं हि सम्बन्धानवगाहि तत्' ।
अर्थात् प्रमात्व और अप्रमात्व दोनों प्रकारतादि [ विशेषणता आदि ] घटित
ज्ञान में रहते हैं और निर्विकल्पक ज्ञान प्रकारतादि से शून्य होता है । इसलिए
निर्विकल्पक ज्ञान को न प्रमा कहा जा सकता है और न अप्रमा कहा जा सकता
है इसलिए वह दोनों से विलक्षण है ।
इस प्रकार निर्विकल्पक ज्ञान अनेक रूपों में दार्शनिकों की चर्चा का
विषय रहा है ।
[ प्रत्यक्ष का कारणभूत ] इन्द्रिय और अर्थ का जो सन्निकर्ष साक्षात्कारि-
प्रमा का हेतु है वह छह प्रकार का ही है । १ संयोग, २ संयुक्तसमवाय, ३ संयुक्त-
समवेतसमवाय, ४ समवाय, ५ समवेत समवाय और ६ विशेष्यविशेषणभाव ।
१ उनमें, जब चक्षु से घटविषयक ज्ञान उत्पन्न होता है तब चक्षुः इन्द्रिय, और
घट अर्थ [ होता है और ] इन दोनों का सन्निकर्ष संयोग ही [ होता ] है ।
१—२ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली का० १३४, १३५, १३६ ।