तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ तर्कभाषा [ षोढा सन्निकर्षः
काशात्मकत्वाच्छब्दस्य चाकाशगुणत्वाद् गुणगुणिनोश्च समवायात् ।
कदा पुनः समवेतसमवायः सन्निकर्षः ?
यदा पुनः शब्दसमवेतं शब्दत्वादिकं सामान्यं श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यते,
तदा श्रोत्रमिन्द्रियं, शब्दत्वादि सामान्यमर्थः । अनयोः सन्निकर्षः समवेत-
समवाय एव । श्रोत्रसमवेते शब्दे शब्दत्वस्य समवायात् ।
कदा पुनर्विशेष्यविशेषणभाव इन्द्रियार्थसन्निकर्षो भवति ?
यदा चक्षुषा संयुक्ते भूतले घटाभावो गृह्यते 'इह भूतले घटो नास्ति'
इति, तदा विशेष्यविशेषणभावः सम्बन्धः । तदा चक्षुःसंयुक्तस्य भूतलस्य
श्रोत्रेन्द्रिय के साथ आकाश के गुणरूप शब्द का गुणगुणिभाव मूलक समवाय
सम्बन्ध होने से श्रोत्र से शब्द का ग्रहण समवाय सम्बन्ध से ही होता है । ]
५ [ प्रश्न ] फिर 'समवेतसमवाय' सन्निकर्ष कब होता है ?
[ उत्तर ] फिर जब शब्द में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले शब्दत्व आदि
सामान्य [ जाति ] का श्रोत्रेन्द्रिय से ग्रहण होता है तब श्रोत्र इन्द्रिय और
शब्दत्व आदि सामान्य अर्थ [ है ] इन दोनों का सन्निकर्ष 'समवेतसमवाय' ही
[ होता है ] । श्रोत्र [ इन्द्रिय ] में समवाय सम्बन्ध से रहने वाले शब्द में
शब्दत्व [ जाति ] का समवाय [ सम्बन्ध ] होने से । [ श्रोत्रेन्द्रिय से शब्दत्व
जाति का ग्रहण समवेत समवाय सम्बन्ध से ही होता है । ]
६ [ प्रश्न ] फिर 'विशेष्य विशेषणभाव' [ नामक ] इन्द्रिय और अर्थ का
सन्निकर्ष कब होता है ?
[उत्तर] जब चक्षु से संयुक्त भूतल में, 'यहाँ भूतल में घट नहीं है' इस प्रकार
घटाभाव का ग्रहण होता है तब विशेष्य विशेषणभाव सम्बन्ध होता है । तब चक्षु
से संयुक्त भूतल का घटाभाव विशेषण होता है [ और ] भूतल विशेष्य होता है ।
इस प्रकार इन्द्रिय-सम्बद्ध भूतल में घटाभाव के विशेषण होने से घटाभाव
के साथ इन्द्रिय का परम्परा से 'इन्द्रियसम्बद्धविशेषणता' सम्बन्ध होता है। इसी
प्रकार जब 'भूतलनिष्ठः घटाभावः' इस प्रकार की प्रतीति होती है तब घटाभाव
विशेष्य होता है और भूतल विशेषण होता है । उस समय इन्द्रिय का घटाभाव
के साथ 'इन्द्रियसम्बद्धविशेष्यता' सम्बन्ध होता है। इस प्रकार इन्द्रिय का अभाव
के साथ कहीं 'इन्द्रियसम्बद्धविशेष्यता' और कहीं 'इन्द्रियसम्बद्धविशेषणता'
सम्बन्ध होता है । इसी को संक्षेप में 'विशेष्यविशेषणभाव' सम्बन्ध कहा है ।
विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध के अन्तर्गत एक कोई और भी सम्बन्ध होना
आवश्यक है । जैसे 'घटवद् भूतलम्' इस प्रतीति में भूतल विशेष्य है और घट