तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअलौकिकसन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५६
माने गये हैं। १ 'सामान्यलक्षणा प्रत्यासत्ति' २ 'ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति' और
३ 'योगज प्रत्यासत्ति' । इनका वर्णन करते हुये 'न्यायसिद्धान्तमुक्तावलीकार'
श्री विश्वनाथ ने लिखा है—
'अलौकिकस्तु व्यापारस्त्रिविधः परिकीर्तितः ।
सामान्यलक्षणो ज्ञानलक्षणो योगजस्तथा ॥'
१ इनमें से योगज सन्निकर्ष सबसे अधिक स्पष्ट है। योगियों को भूत,
भविष्यत्, सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट सभी वस्तुओं का प्रत्यक्ष हो सकता है।
व्यवहित, भूत, भविष्यत् आदि की वस्तुओं के साथ लौकिक इन्द्रिय और अर्थ
का सन्निकर्ष नहीं बन सकता है अतएव वहां योगज सामर्थ्य से अलौकिक
इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष हो जाता है। वह भी 'युक्त' और 'युञ्जान' भेद से दो
प्रकार का होता है। 'युक्त' योगी को सर्वदा भान होता है और 'युञ्जान' को
चिन्ता करने से अर्थ का भान होता है।
'युक्तस्य सर्वदा भानं चिन्तासहकृतोऽपरः ।' १
२ 'ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति' का उदाहरण 'सुरभि चन्दनखण्डम्' यह ज्ञान है।
एक दिन बाजार में किसी ने चन्दन के टुकड़े को सूँघकर परीक्षा कर निश्चय कर
लिया कि यह सुगंधित चंदन का टुकड़ा है। दूसरे दिन किसी ग्राहक ने वह चंदन
का टुकड़ा उस व्यक्ति को दिखलाकर उसके विषय में उसकी सम्मति पूछी। तो उसने
दूर से ही उसको देखकर कहा कि यह सुगन्धित चन्दन है। यहाँ उसने चंदन
को आँख से तो देखा। परन्तु इस समय उसकी गन्ध को घ्राणेन्द्रिय से ग्रहण
नहीं किया है फिर भी 'सुरभिचन्दनखण्डम्' यह प्रतीति हो रही है। इस
प्रतीति में चन्दन, उसमें रहने वाली चन्दनत्व जाति, और उसके सौरभ गुण,
इन तीनों का प्रत्यक्ष होता है इसमें से चंदन के साथ चक्षु का संयोग सम्बन्ध, और
चन्दनत्व सामान्य के साथ संयुक्तसमवाय सम्बन्ध होता है। यह दोनों लौकिक
सन्निकर्ष के अन्तर्गत ही हैं। परंतु सौरभ के साथ तो चक्षु का लौकिक सन्निकर्ष
नहीं बन सकता है। अतएव उसके साथ 'ज्ञानलक्षणा प्रत्यासत्ति' रूप अलौकिक
सन्निकर्ष बनता है। यहाँ चक्षु का और सौरभ का चक्षुःसंयुक्तमनःसंयुक्तात्मस-
मवेतज्ञानरूपेण' अथवा 'चक्षुःसंयुक्तात्मसमवेतसंस्काररूपेण' अर्थात् चक्षु से संयुक्त
जो मन उससे संयुक्त जो आत्मा उस आत्मा में समवेत जो सौरभगुण का ज्ञान
अथवा उस सौरभज्ञान से उत्पन्न संस्कार के द्वारा चक्षुः से ही उस सौरभ का
अलौकिक सन्निकर्ष द्वारा ग्रहण हो जाता है। इसलिये सौरभ के चक्षु का विषय
१, २ न्यायसिद्धान्तमुक्तावली ६३, ६६ ।