तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोढा सन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५७
घटाद्यभावो विशेषणं, भूतलं विशेष्यम् । यदा च मनःसंयुक्त आत्मनि
सुखाद्यभावो गृह्यते 'अहं सुखरहित' इति, तदा मनःसंयुक्तस्यात्मनः
सुखाद्यभावो विशेषणम् । यदा श्रोत्रसमवेते गकारे घत्वाभावो गृह्यते
तदा श्रोत्रसमवेतस्य गकारस्य घत्वाभावो विशेषणम् ।
तदेवं संक्षेपतः पञ्चविधसम्बन्धान्यतमसम्बन्धसम्बद्धविशेषणविशे-
ष्यभावलक्षणेनेन्द्रियार्थसन्निकर्षेण अभाव इन्द्रियेण गृह्यते ।
उसका विशेषण है। भूतल और घट का संयोग संबन्ध है। इस लिये
भूतल में घट संयोग सम्बन्ध से विशेषण है, यह कहा जा सकता है। इसी
प्रकार 'पटवन्तस्तन्तवः' इस प्रतीति में तन्तु विशेष्य है पट विशेषण है। इन
दोनों का समवाय सम्बन्ध है। इसलिए तन्तु में पट समवाय सम्बन्ध से विशेषण
है। इस प्रकार विशेषण विशेष्यभाव सम्बन्ध के अन्तर्गत कोई एक सम्बन्ध
और होना चाहिए। वह सम्बन्ध ऊपर गिनाए हुए सम्बन्धों में से ही कोई हो
सकता है। ऊपर इन्द्रिय और अर्थ के छः प्रकार के सम्बन्ध गिनाए हैं। इनमें
से एक तो स्वयं विशेष्यविशेषण भाव ही है। इसलिए उसको छोड़कर शेष
पाँच सम्बन्ध और रह जाते हैं जो इस विशेष्यविशेषण भाव सम्बन्ध के
नियामक हो सकते हैं इसलिए उन पञ्चविध सम्बन्धों में से अन्यतम सम्बन्ध
से घटादि विशेषण भूतलादि विशेष्य के साथ सम्बद्ध हो सकते हैं। और जिस
सम्बन्ध से घटादि भाव पदार्थ भूतलादि में विशेषण होते हैं उन घटादि का
अभाव भी उसी सम्बन्ध से भूतल आदि में विशेषण होता है। इसलिए पूर्वोक्त
पञ्चविध सम्बन्ध में से अन्यतम सम्बन्ध द्वारा घटाभावादि भूतलादि में विशेष्य
या विशेषण हो सकते हैं। इसी विशेष्यविशेषण भाव से चक्षुः आदि द्वारा
घटाभावादि का ग्रहण होता है। ऊपर संयोग सम्बन्ध का उदाहरण दिया था,
आगे समवायादि सम्बन्ध के भी उदाहरण देकर इस बात को स्पष्ट करेंगे।
और जब मन से संयुक्त आत्मा में सुखादि [गुणों] का अभाव 'मैं सुखरहित
हूँ' इस रूप में गृहीत होता है तब मन से संयुक्त आत्मा में सुखाभाव [समवाय
सम्बन्ध से] विशेषण होता है। [और] जब श्रोत्र में समवायसम्बन्ध से रहने
वाले गकार में घत्व आदि [जाति] का अभाव गृहीत होता है तब श्रोत्रसमवेत
गकार का घत्वाभाव [समवेत समवाय सम्बन्ध से] विशेषण होता है। [और
उनका ग्रहण विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध से होता है]
इस प्रकार संक्षेप में [१ संयोग, २ संयुक्तसमवाय, ३ संयुक्तसमवेतसमवाय,
४ समवाय और ५ समवेतसमवाय इन] पाँच प्रकार के सम्बन्धों में किसी एक