सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 120

षोढा सन्निकर्षः ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ५५
यथा । इन्द्रियावयवैरर्थावयविनाम् ।, २ इन्द्रियावयविनामर्थावय-
वानाम् । ३ इन्द्रियावयवैरर्थावयवानाम् । ४ अर्थावयविनामिन्द्रियावय-
विनां सन्निकर्ष इति ।
यदा पुनश्चक्षुषा घटरूपसमवेतं रूपत्वादिसामान्यं गृह्यते, तदा
चक्षुरिन्द्रियं, रूपत्वादिसामान्यमर्थः, अनयोः सन्निकर्षः संयुक्तसमवेत-
(समवाय एव । चक्षुःसंयुक्ते घटे रूपं समवेतं, तत्र रूपत्वस्य समवायात् ।
कदा पुनः समवायः सन्निकर्षः ?
यदा श्रोत्रेन्द्रियेण शब्दो गृह्यते तदा श्रोत्रमिन्द्रियं, शब्दोऽर्थः, अनयोः
सन्निकर्षः समवाय एव । कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नं नभः श्रोत्रम् । श्रोत्रस्या-
[ क्योंकि ] उस [ चतुष्टय सन्निकर्ष ] के अभाव में [ परिमाण आदि के साथ
चक्षुः का ] संयुक्त समवाय [ सम्बन्ध ] होने पर भी दूर में [ पदार्थ के ]
परिमाणादि का [ ठीक ] ग्रहण नहीं होता [ इसलिए परिमाणादि के
ग्रहण में ‘संयुक्तसमवाय’ के अतिरिक्त ‘चतुष्टय सन्निकर्ष’ को भी कारण मानना
आवश्यक है ।
[ वह ] ‘चतुष्टय सन्निकर्ष’ [ इस प्रकार होगा ] जैसे १ इन्द्रियावयव और
अर्थावयवी का [ सन्निकर्ष ] २ इन्द्रिय अवयवी के साथ अर्थ के अवयवों का ।
३ इन्द्रिय के अवयवों के साथ अर्थ के अवयवों का और ४ इन्द्रिय अवयवी और
अर्थावयवी का सन्निकर्ष ।
३ जब चक्षुः से घटरूप में समवेत रूपत्व आदि सामान्य का ग्रहण किया
जाता है तब चक्षुः इन्द्रिय, रूपत्वादि सामान्य अर्थ और उन दोनों का सन्निकर्ष
‘संयुक्तसमवेतसमवाय’ ही होता है । क्योंकि चक्षुः से संयुक्त घट में रूप समवाय
सम्बन्ध से रहता है और उस [ रूप ] में रूपत्व [ जाति ] का समवाय [सम्बन्ध]
है । [ इसलिए रूपत्व जाति के साथ चक्षुः का परम्परया ‘संयुक्तसमवेतसमवाय’
सम्बन्ध हुआ ]
४ फिर ‘समवाय’ सन्निकर्ष कब होता है ?
जब श्रोत्रेन्द्रिय से शब्द का ग्रहण होता है तब श्रोत्र इन्द्रिय और शब्द अर्थ
[ होता ] है, और इन दोनों का सम्बन्ध समवाय ही [ होता ] है । [ क्योंकि ]
कर्णशष्कुली [ अर्थात् शष्कुली कचौड़ी के आकार का बना जो कर्ण का बाह्य
गोलक उस ] से घिरा हुआ [ उसका मध्यवर्त्ती ] आकाश श्रोत्र है । [ अर्थात्
श्रोत्रेन्द्रिय आकाश स्वरूप ही है आकाश से अतिरिक्त नहीं ] । इसलिए श्रोत्र के
आकाश रूप होने से और शब्द के आकाश का गुण होने तथा गुण गुणी
का समवाय सम्बन्ध होने से [ 'कर्णशष्कुली अवच्छिन्न 'आकाश' रूप