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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 330 में से

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पृष्ठ 123

५८ तर्कभाषा [ षोढा सन्निकर्षः
एवं समवायोऽपि । चक्षुःसम्बद्धस्य तन्तोर्विशेषणभूतः पटसमवायो
गृह्यते 'इह तन्तुषु पटसमवाय' इति ।
तदेवं षोढा सन्निकर्षो वर्णितः । संग्रहश्च—
अक्षजा प्रमितिर्द्वेधा सविकल्पाविकल्पिका ।
करणं त्रिविधं तस्याः सन्निकर्षश्च षड्विधः ॥
घट—तन्नील—नीलत्व—शब्द--शब्दत्वजातयः ।
अभावसमवायौ च ग्राह्याः सम्बन्धषट्कतः ॥
सम्बन्ध से सम्बद्ध विशेष्यविशेषणभाव रूप इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से
अभाव का इन्द्रिय द्वारा [ ही ] ग्रहण किया जाता है ।
इसी प्रकार समवाय भी [विशेष्य विशेषण भाव सम्बन्ध द्वारा] इन्द्रिय से ही
गृहीत होता है । चक्षु से संयुक्त तन्तु का विशेषणभूत पटसमवाय 'इन तन्तुओं में
पटसमवाय [ सम्बन्ध से ] है' इस [प्रतीति] में [विशेष्यविशेषणभाव सम्बन्ध से ]
गृहीत होता है ।
इस प्रकार छः प्रकार के सन्निकर्ष का वर्णन किया गया । और [ इस सब ]
विषय का [ संग्रह ] संक्षेप [ इस प्रकार ] है ।
[ इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न ] इन्द्रियजन्य [ प्रत्यक्ष ] प्रमिति
दो प्रकार की है एक सविकल्पक और दूसरा निर्विकल्पक । उस [ प्रत्यक्ष प्रमा ]
के करण [ १ कभी इन्द्रिय २ कभी इन्द्रियार्थ-सन्निकर्ष, और ३ कभी निर्विकल्पक
ज्ञान ] तीन प्रकार के हैं और [ इन्द्रिय तथा अर्थ का ] सन्निकर्ष [ १ संयोग,
२ संयुक्तसमवाय, ३ संयुक्तसमवेतसमबाय, ४ समवाय, ५ समवेतसमवाय और
३ विशेष्यविशेषणभाव ] छः प्रकार का है ।
[ इस छः प्रकार के सन्निकर्ष से क्रमशः ] १ घट [का १ संयोग सम्बन्ध से]
[ घट ] में रहने वाले नील [ रूप गुण का ग्रहण संयुक्तसमवायसम्बन्ध से और
उस नील गुण में रहने वाली जाति ] नीलत्व [ का ३ संयुक्तसमवेतसमवाय
सम्बन्ध से तथा ] शब्द [ रूप गुण का कर्णाशष्कुली से अवच्छिन्न आकाश रूप
श्रोत्र से समवाय सम्बन्ध से ] और [ उस शब्द में रहने वाली ] शब्दत्व जाति
[ का समवेतसमवाय सम्बन्ध से ] तथा अभाव और समवाय [ का विशेष्य-
विशेषणभाव से ] का छः सम्बन्धों से [ यथाक्रम ] ग्रहण होता है ।
अलौकिक सन्निकर्ष—
ऊपर जिन छः प्रकार के इन्द्रियार्थसन्निकर्षों का वर्णन किया है वे सब
लौकिक सन्निकर्ष हैं । इनके अतिरिक्त तीन प्रकार के अलौकिक सन्निकर्ष भी