तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५० तर्कभाषा [ अवान्तरव्यापारः
तज्जन्यस्तज्जन्यजनकोऽवान्तरव्यापारः। यथा कुठारजन्यः कुठारदारु-
संयोगः कुठारजन्यच्छिदाजनकः। अत्र कश्चिदाह-सविकल्पकादीना-
मपीन्द्रियमेव करणम्। यावन्ति त्यान्तरालिकानि सन्निकर्षादीनि तानि
सर्वाण्यवान्तरव्यापार इति।
ग्रहण करने अथवा उपेक्षा करने की बुद्धि उत्पन्न होती है तब [ उस हान उपादान
अथवा उपेक्षा बुद्धि रूप फल के प्रति ] निर्विकल्पक ज्ञान करण [ होता है ]
सविकल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार और हानादि बुद्धि फल होती है।
इन तीनों करणों के निरूपण में 'अवान्तरव्यापार' शब्द का प्रयोग हुआ
है। अत एव 'अवान्तरव्यापार' किस को कहते हैं यह जिज्ञासा उत्पन्न होती
है। उसके निराकरण के लिए आगे 'अवान्तरव्यापार' का लक्षण करते हैं—
[ जो स्वयं ] तत् अर्थात् उस [ करण ] से जन्य हो और तज्जन्य अर्थात्
उस करण से जन्य, का जनक हो, वह अवान्तर व्यापार है। जैसे कुठारजन्य
कुठार दारु [ लकड़ी ] का संयोग कुठार से उत्पन्न होने वाली छेदन क्रिया का
जनक होता है।
यहां [ अर्थात् त्रिविध करण के प्रतिपादन होने ] पर कोई कहते हैं कि
सविकल्पक आदि सब ही [ फलों ] का करण [ केवल एक ] इन्द्रिय ही है और
बीच के जितने हैं वे सब अवान्तर व्यापार हैं। [ अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान की
उत्पत्ति में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष रूप एक अवान्तर व्यापार है। सविकल्पक की
उत्पत्ति में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष और निर्विकल्पक ज्ञान ये दो अवान्तर व्यापार हैं।
और हानोपादान उपेक्षा बुद्धि की उत्पत्ति में इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष, निर्विकल्पक ज्ञान
और सविकल्पक ज्ञान ये तोनों अवान्तर व्यापार हैं। ]
निर्विकल्पक ज्ञान के विषय में बौद्ध और जैन मत—
प्रत्यक्ष ज्ञान के इस निर्विकल्पक और सविकल्पक स्वरूप के विषय में
प्रायः तीन प्रकार के सिद्धान्त दार्शनिक क्षेत्र में पाए जाते हैं। बौद्ध दार्शनिक
केवल निर्विकल्पक को ही प्रत्यक्ष मानते हैं। 'दिङ्नागाचार्य' ने अपने 'प्रमाण
समुच्चय' में लिखा है:—
'प्रत्यक्षं कल्पनापोढं नामजात्याद्यसंयु¹तम्'
'दिङ्नागाचार्य' के समान ही 'धर्मकीर्ति' आदि बौद्ध आचार्यों ने भी केवल
निर्विकल्पक को ही प्रत्यक्ष माना है। सविकल्पक को नहीं। इसके विपरीत जैन
दर्शन की परम्परा में केवल सविकल्पक को ही प्रत्यक्ष माना गया है निर्विकल्पक
को नहीं। आचार्य हेमचन्द्र ने अपने जैन दर्शन की परम्परा के अनुसार सविक-
ल्पक को ही प्रत्यक्ष मानने के कारण निर्विकल्पक को 'अनध्यवसाय' रूप कह कर
१ प्रमाण समुच्चय १,