तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमरुमरीचिका ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ६३
परन्तु प्रकाश की किरणों के 'माध्यम' रूप वायुमण्डल में अत्यन्त वेग से
परिवर्तन होने से उक्त 'वक्रीभवन' नियम के अनुसार किरणों के मार्ग में
परिवर्तन होने के कारण वृक्ष आदि का उल्टा प्रतिबिम्ब दीखने लगता है ।
जैसा कि निम्नांकित चित्र से प्रकट होगा ।
मरु मरीचिका
इस चित्र में बाईं ओर एक वृक्ष खड़ा है। इस वृक्ष के ऊपर के भाग से
प्रतिक्षिप्त होकर जो प्रकाश की किरण चलती है वह रेगिस्तान की वायु के
माध्यम में अति वेग से परिवर्तन होने के कारण अपने मार्ग से विचलित होते-
होते 'क्रान्तिबिन्दु' तक जा पहुँचती है। और फिर वहाँ से 'प्रतिक्षेप नियम' के
अनुसार उतने ही अंश का कोण बनाते हुए प्रतिक्षिप्त होकर दूसरी ओर देखने
वाले की आँख में पहुँचती है। देखने वाला अभ्यासवश जिधर से किरण आ
रही है उसकी सीध में अर्थ को देखता है जिसका परिणाम यह होता है कि वृक्ष
का पत्तों वाला ऊपर का भाग उसको नीचे की ओर दीखता है और नीचे का जड़
वाला भाग इसी प्रक्रिया से उसे ऊपर दीखने लगता है। अर्थात् वृक्ष उल्टा दीखता
है। तब देखने वाले को यह प्रतीत होता है कि मानो पानी में पेड़ का उल्टा
प्रतिबिम्ब पड़ रहा है। इसीसे वह पानी समझ कर वहाँ जाता है परन्तु पानी
नहीं पाता है। यह 'मरुमरीचिका' की वैज्ञानिक प्रक्रिया मानी जाती है।
मरुस्थल के वायुमण्डल में जो अत्यन्त शीघ्रता से परिवर्तन होता है
उसका कारण गर्मी की अधिकता ही होती है। मरुभूमि के अत्यधिक उष्ण
होने के कारण जो वायु भूतल का स्पर्श करती है वह तुरन्त उष्ण हो जाती है।
विज्ञान के साधारण नियम के अनुसार गर्मी से वस्तु हल्की हो जाती है। और