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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 330 में से

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पृष्ठ 117

५२ तर्कभाषा [ निर्विकल्पकं ज्ञानम्
निर्विकल्पक ज्ञान का अस्तित्व मानने वाले सभी लोग उसको केवल प्रत्यक्ष
या अपरोक्ष मानते हैं परन्तु जैन परम्परा में जिसने निर्विकल्पक को 'दर्शन' नाम
से व्यवहृत किया है इस 'दर्शन' को परोक्ष भी माना है। क्योंकि उनके यहां परोक्ष
'मतिज्ञान' को भी सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहा है ।
प्रत्यक्ष के प्रकारान्तर से लौकिक और अलौकिक ये दो भेद प्रायः सभी को
स्वीकृत हैं। अस्मदादि लौकिक पुरुषों का प्रत्यक्ष लौकिक प्रत्यक्ष है । और वह
इन्द्रिय सन्निकर्ष आदि कारण सामग्री के होने पर ही सम्भव है। परन्तु योगियों
के प्रत्यक्ष के लिए इन्द्रिय सन्निकर्ष आदि कारण सामग्री की आवश्यकता नहीं है।
योगी जन अपनी योगज सामर्थ्य से इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष के बिना भी भूत, भविष्यत्,
सूक्ष्म, व्यवहित, विप्रकृष्ट सभी वस्तुओं को ग्रहण कर सकते हैं। उनका यह ज्ञान
यथार्थ और साक्षात्कारात्मक निर्विकल्पक ज्ञान होता है। इस प्रकार लौकिक और
अलौकिक दोनों प्रकार के निर्विकल्पक ज्ञान और उनकी कारण सामग्री के विषय
में प्रायः सभी निर्विकल्पकवादी एक मत हैं ।
परन्तु शाङ्कर वेदान्त में इस कारण सामग्री के विषय में एक नवीन मत
प्रस्तुत किया गया है। अन्य कोई दर्शन प्रत्यक्ष को छोड़कर अनुमानादि अन्य
किसी प्रमाण से अपरोक्ष ज्ञान अथवा निर्विकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति नहीं
मानते हैं। परन्तु शाङ्कर वेदान्त में 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्य से अपरोक्ष
निर्विकल्पक की उत्पत्ति मानी है। और इसका उपपादन करने के लिए
'दशमस्त्वमसि' यह लौकिक उदाहरण दिया है। कोई व्यक्ति अपने साथियों की
गणना करता है वह एक से लेकर नौ तक हर एक व्यक्ति को गिन जाता है
परन्तु उसके दसवें साथी का उसको पता नहीं चलता है। तब उसको कोई
दूसरा व्यक्ति बताता है कि 'दशमस्त्वमसि'। इस वाक्य को सुनकर जैसे
दशम व्यक्ति रूप में उसको स्वयं अपना अपरोक्ष ज्ञान होता है। इसी प्रकार
'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों में भी शब्द प्रमाण से अपरोक्ष निर्विकल्पक ज्ञान
हो सकता है। इस प्रकार शाङ्कर वेदान्त में शब्द प्रमाण को भी अपरोक्ष
निर्विकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति का कारण माना है।
निर्विकल्पक के प्रामाण्याप्रामाण्य विषयक द्विविध न्याय मत—
निर्विकल्पक ज्ञान के प्रामाण्य के विषय में भी जैसा कि ऊपर लिख आए
हैं कई पक्ष हैं। बौद्ध दर्शन तथा वेदान्त दर्शन तो निर्विकल्पक को ही प्रत्यक्ष
मानते हैं और उनके अनुसार निर्विकल्प ही मुख्यतः प्रमाण है। न्याय और
वैशेषिक दर्शन में सविकल्पक तथा निर्विकल्पक दोनों को ही प्रमाण माना है ।