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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 330 में से

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पृष्ठ 114

त्रिविधं करणम् ] प्रत्यक्षनिरूपणम् ४६
कदा पुनरिन्द्रियार्थसन्निकर्षः करणम् ?
यदा निर्विकल्पकानन्तरं सविकल्पकं नामजात्यादियोजनात्मकं
डित्थोऽयं, ब्राह्मणोऽयं, श्यामोऽयमिति विशेषणविशेष्यावगाहि ज्ञानमुत्प-
द्यते, तदेन्द्रियार्थसन्निकर्षः करणम् । निर्विकल्पकं ज्ञानमवान्तरव्यापारः,
सविकल्पकं ज्ञानम् फलम् ।
कदा पुनर्ज्ञानं करणम् ?
यदा, उक्तसविकल्पकानन्तरं हानोपादानोपेक्षाबुद्धयो जायन्ते तदा
निर्विकल्पकं ज्ञानं करणम् । सविकल्पकं ज्ञानमवान्तरव्यापारः, हानादि-
बुद्धयः फलम् ।
यहां इन्द्रिय को 'करण', निर्विकल्पक ज्ञान को 'फल' और उनके बीच में
होने वाले इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को 'अवान्तर व्यापार' बताया है । अवान्तर
व्यापार का लक्षण है 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकोऽवान्तरव्यापारः' । जो स्वयं
तत् अर्थात् उस करण से जन्य हो और उस करण से जन्य = उत्पन्न होने वाले
अन्य फल का जनक हो उसको 'अवान्तर व्यापार' कहते हैं । जैसे कुल्हाड़ी से
लकड़ी के काटने में कुल्हाड़ी और लकड़ी का संयोग 'अवान्तर व्यापार' है ।
यह संयोग रूप 'अवान्तर व्यापार' तज्जन्य अर्थात् परशुजन्य है और साथ ही
परशुजन्य जो छेदन रूप फल है उसका जनक भी है । इसलिए 'तज्जन्यत्वे
सति' अर्थात् परशुजन्यत्वे सति 'तज्जन्यजनकः' अर्थात् परशुजन्यच्छिदाजनको
दारुपरशुसंयोगोऽवान्तरव्यापारः । दारु और परशु अर्थात् कुल्हाड़ी और लकड़ी
का संयोग 'अवान्तर व्यापार' है। इसी प्रकार इन्द्रियरूप करण से निर्विकल्पक
ज्ञानरूप फल की उत्पत्ति में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष रूप 'अवान्तर व्यापार' है।
क्योंकि वह इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष स्वयं इन्द्रियजन्य है और इन्द्रियजन्य
निर्विकल्पक ज्ञान का जनक है। अतः उसको 'अवान्तर व्यापार' कहते हैं।
२. और इन्द्रिय तथा अर्थ का सन्निकर्ष कब करण होता है ?
जब निर्विकल्पक के बाद नाम-जात्यादि योजना सहित यह डित्थ है [ नाम
युक्त प्रतीति ], यह ब्राह्मण है [ जातियुक्त प्रतीति ], यह श्याम है [ श्याम रूप,
गुणविशिष्ट प्रतीति ] इस प्रकार का विशेषणविशेष्य [ भाव ] विषयक ज्ञान
उत्पन्न होता है तब इन्द्रियार्थसन्निकर्ष करण, निर्विकल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार
और सविकल्पक ज्ञान फल [ होता ] है ।
३ और ज्ञान [ निर्विकल्पक ज्ञान ] कब करण होता है ?
जब उक्त सविकल्पक ज्ञान के अनन्तर [ ज्ञात वस्तु के ] परित्याग करने,
४ त० भा०