श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१८) “जीवापेतं वाव किलेदं | “जीवसे रहित होकर यह शरीर ही
म्रियते न जीवो म्रियत इति” | मरता है जीव नहीं मरता”, “जरा-
(छा० उ० ६ । ११ । ३) । | मृत्यु ये शरीरके धर्म हैं”, “हे
“जरामृत्यू शरीरस्य” । “अवि- | मैत्रेयि ! यह आत्मा अविनाशी और
नाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्ति- | अनुच्छित्तिधर्मा ( कभी उच्छिन्न न
धर्मा”(बृ०उ० ४।५।१४) इति। | होनेवाला ) है ।” ऐसा ही स्मृति
तथा च स्मृतिः— “अजः शरीर- | भी कहती है— “वह अजन्मा
ग्रहणात्स जात इतिकीर्त्यते” इति। | शरीरग्रहण करनेसे 'जन्म लेता है'
किं च, जीवाम केन—केन वा | ऐसा कहा जाता है ।”
| इसके सिवा [ एक प्रश्न यह
वयं सृष्टाः सन्तो जीवामेति | है—] हम किसके द्वारा जीवित रहते हैं?
| अर्थात् उत्पन्न होनेपर हम किसके
स्थितिविषयः प्रश्नः । क्व च | द्वारा जीवन धारण करते हैं ? इस
| प्रकार यह स्थितिविषयक प्रश्न है ।
संप्रतिष्ठाः प्रलयकाले स्थिताः ? | तथा कहाँ प्रतिष्ठित होते हैं—प्रलय-
| कालमें किसमें स्थित रहते हैं ? और
अधिष्ठिता नियमिताः केन सुखे- | हे ब्रह्मविद्गण ! किसके द्वारा अधिष्ठित
| अर्थात् प्रेरित होकर सुखासुख यानी
तरेषु सुखदुःखेषु वर्तामहे ब्रह्म- | सुख-दुःखमें व्यवस्था (संसार-यात्रा )
विदो व्यवस्थां हे ब्रह्मविदः | को वर्तते हैं ? अर्थात् हे ब्रह्मवेत्ताओ !
| हम किसके द्वारा प्रेरित होकर सुख-
सुखदुःखेषु व्यवस्थां केना- | दुःखमें व्यवस्था ( लोक-यात्रा ) का
धिष्ठिताः सन्तोऽनुवर्तामह इति | अनुवर्तन करते हैं ? इस प्रकार
| किम् इत्यादि प्रश्नसमूह जगत्की
सृष्टिस्थितिम्रलयनियमहेतुः कि- | उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और नियमके
मिति प्रश्नसंग्रहः ॥ १ ॥ | हेतुके विषयमें है ॥१॥
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
काल, स्वभाव आदिकी जगत्-कारणताका खण्डन
इदानीं कालादीनि ब्रह्मकारण- | अब श्रुति ब्रह्मकारणवादके विरोधी
वादप्रतिपक्षभूतानि विचारविषय- | कालादिको विचारके विषयरूपसे
त्वेन दर्शयति— | प्रदर्शित करती है—
कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा
भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या ।
संयोग एषां न त्वात्मभावा-
दात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥
काल, स्वभाव, नियति, यदृच्छा, भूत और पुरुष—ये कारण हैं
[ या नहीं ] इसपर विचारना चाहिये । इनका संयोग भी [ अपने शेषी ]
आत्माके अधीन होनेके कारण कारण नहीं हो सकता तथा जीवात्मा भी
सुख-दुःखके हेतु [ पुण्यापुण्य कर्मों ] के अधीन है । [ इसलिये वह भी
कारण नहीं हो सकता ] ॥ २ ॥
कालः स्वभाव इति । योनि- | ‘कालः स्वभावः'इत्यादि। इन सबके
शब्दः संबध्यते । कालो योनिः | साथ 'योनिः' शब्दका सम्बन्ध है। क्या
कारणं स्यात् ? कालो नाम सर्व- | काल योनि—कारण हो सकता है ?
भूतानां विपरिणामहेतुः। स्वभावः, | सम्पूर्ण भूतोंकी रूपान्तर-प्राप्तिमें जो
स्वभावो नाम पदार्थानां प्रति- | हेतु हैं उसको काल कहते हैं । इसी
नियता शक्तिः; अग्नेरौष्ण्यमिव । | प्रकार क्या स्वभाव कारण है ? पदार्थों-
नियतिरविषमपुण्यपापलक्षणं कर्म | की नियत शक्तिका नाम स्वभाव है,
तद्वा कारणम् ? यदृच्छाकास्मिकी | जैसे अग्निका स्वभाव उष्णता ।
| अथवा क्या नियति कारण है ? पुण्य-
| पापरूप जो अविषम कर्म हैं वे
| ‘नियति' कहे जाते हैं ? या यदृच्छा—
१. जिनका फल कभी विपरीत नहीं होता ।
६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[संस्कृत-टीका]
प्राप्तिः । भूतान्याकाशादीनि वा
योनिः ? पुरुषो वा विज्ञानात्मा
योनिः ? इतीत्थमुक्तप्रकारेण किं
योनिरिति चिन्त्या चिन्त्यं
निरूपणीयम् । केचिद्योनिशब्दं
प्रकृतिं वर्णयन्ति । तस्मिन्यक्षे
किं कारणं ब्रह्मेति पूर्वोक्तं कारण-
पदमत्राप्यनुसंधेयम् ।
तत्र कालादीनामकारणत्वं
(पार्श्व-टिप्पणी: कालादीनाम् अकारणत्वोपपादनम्)
दर्शयति—संयोग
एषामित्यादिना ।
अयमर्थः—किं काला-
दीनि प्रत्येकं कारणमुत तेषां
समूहः । न च प्रत्येकं कालादीनां
कारणत्वं संभवति, दृष्टविरुद्ध-
त्वात् । देशकालनिमित्तानां संह-
तानामेव लोके कार्यकरत्वदर्श-
नात् । न चाप्येषां कालादीनां
संयोगः समूहः कारणम्,
समूहस्य संहतेः परार्थत्वेन
शेषत्वेन शेषिण आत्मनो विद्य-
[हिन्दी-अनुवाद]
आकस्मिक घटना अथवा आकाशादि
भूत कारण हैं ? या पुरुष यानी
विज्ञानात्मा जगत्का कारण है ? इस
प्रकार उपर्युक्त रीतिसे यह विचारना
यानी बतलाना चाहिये कि इसमें
कौन कारण है ? कोई 'योनिः'
शब्दका अर्थ प्रकृति बतलाते हैं ?
उस अवस्था में पूर्व मन्त्रमें 'किं कारणं
ब्रह्म' इस प्रश्नमें आये हुए कारण-
पदकी यहाँ भी अनुवृत्ति कर लेनी
चाहिये ।
इसपर श्रुति 'संयोग एषाम्' इत्यादि
वाक्यसे यह प्रदर्शित करती है कि
काल आदि कारण नहीं है । इसका
अभिप्राय यों समझना चाहिये—क्या
काल, स्वभाव आदिमेंसे प्रत्येक
ही कारण है अथवा उन सबका
समूह ? कालादिमेंसे प्रत्येक तो
कारण हो नहीं सकता, क्योंकि
ऐसा मानना प्रत्यक्ष विरुद्ध है । लोकमें
देश-कालादि निमित्तोंको परस्पर
मिलकर ही कार्य करते देखा गया
है । और इन कालादिका संयोग
यानी समूह भी कारण नहीं हो
सकता है; क्योंकि समूह यानी संहति
परार्थ अर्थात् शेष है और उसका शेषी
आत्मा विद्यमान है, अतः स्वतन्त्र न
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
मानत्वादस्वातन्त्र्यात्सृष्टिस्थिति- | होनेके कारण वह सृष्टि, स्थिति,
प्रलयनियमलक्षणकार्यकरणत्वा- | प्रलय और प्रेरणारूप कार्य करनेमें
योगात् । | समर्थ नहीं है ।
आत्मा तर्हि कारणं स्यादे- | तब तो आत्मा कारण हो ही
[आत्मनः सृष्टिकारणत्व-निरासः] वात आह—आत्मा- | सकता है, इसपर कहते हैं—
प्यनीशः सुखदुःख- | 'आत्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ।'
हेतोरिति । आत्मा | अर्थात् आत्मा यानी जीव भी अनीश—
जीवोऽप्यनीशोऽस्वतन्त्रो न कार- | अस्वतन्त्र है—वह भी सृष्टि आदिका
णम्, अस्वातन्त्र्यादेव चात्मनो- | कारण नहीं है । तात्पर्य यह है
ऽपि सृष्ट्यादिहेतुत्वं न संभव- | कि अस्वतन्त्रताके ही कारण आत्माका
तीत्यर्थः । कथमनीशत्वम् ? सुख- | भी सृष्टि आदिमें हेतु होना सम्भव
दुःखहेतोः सुखदुःखहेतुभूतस्य | नहीं है । इसकी अस्वतन्त्रता कैसे है !
पुण्यापुण्यलक्षणस्य कर्मणो विद्य- | [ सो बताते हैं-] सुखदुःखहेतोः-
मानत्वात्कर्मपरवशतवेनास्वात- | सुख-दुःखके हेतुभूत पुण्यापुण्यरूप
न्त्र्याच्च । त्रैलोक्यसृष्टिस्थितिनियमे | कर्म विद्यमान हैं, अतः उन कर्मोंके
सामर्थ्यं न विद्यत एवेत्यर्थः । | अधीन होनेसे इसकी अस्वतन्त्रता है ।
अथवा सुखदुःखादिहेतुभूतस्या- | इसीसे त्रिलोकीकी सृष्टि, स्थिति और
ध्यात्मिकादिभेदभिन्नस्य जगतो- | नियमनमें इसका सामर्थ्य नहीं ही
ऽनीशो न कारणम् ॥ २ ॥ | है—यही इसका अभिप्राय है। अथवा
| [ यों समझना चाहिये कि ] आत्मा
| सुख-दुःखादिके हेतुभूत आध्यात्मि-
| कादि भेदोंवाले जगत्का ईश—
| कारण नहीं है* ॥ २ ॥
* क्योंकि जो आध्यात्मिकादि भेदोंवाला जगत् आत्माके बन्धन और दुःखका
कारण है उसकी वह स्वतन्त्रतासे स्वयं ही क्यों रचना करेगा ?
६२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
६२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
ध्यानके द्वारा ऋषियोंको कारणभूता
ब्रह्मशक्तिका साक्षात्कार
एवं पक्षान्तराणि निराकृत्य | इस प्रकार अन्य सब पक्षोंका
निराकरण कर अब श्रुति यह बतलाती
प्रमाणान्तरागोचरे वस्तुनि प्रका- | है कि उन ब्रह्मवेत्ताओंने प्रमाणान्तरसे
ज्ञात न होनेवाले उस मूलतत्त्वके
रान्तरमपश्यन्तो ध्यानयोगानु- | विषयमें अन्य किसी उपायकी गति
न देखकर ध्यानयोगके अनुशीलन-
गमेन परममूलकारणं स्वयमेव | द्वारा उस परममूलकारणको स्वयं ही
प्रतिपेदिर इत्याह— | अनुभव कर लिया—
ते ध्यानयोगानुगता अपश्य-
न्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् ।
यः कारणानि निखिलानि तानि
कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३ ॥
उन्होंने ध्यानयोगका अनुवर्तन कर अपने गुणोंसे आच्छादित
परमात्माकी शक्तिका साक्षात्कार किया; जो (परमात्मा) कि अकेले ही
कालसे लेकर आत्मापर्यन्त समस्त कारणोंके अधिष्ठान हैं ॥ ३ ॥
ते ध्यानयोगेति । ध्यानं नाम | ‘ते ध्यानयोगानुगताः’ इत्यादि
ध्यान चित्तकी एकाग्रताको कहते
चित्तैकाग्र्यं तदेव योगो युज्यते- | हैं; वही योग है—जिसके द्वारा
चित्तको युक्त किया जाय इस
ऽनेनेति ध्यातव्यस्वीकारोपायः, | व्युत्पत्तिके अनुसार ध्येय वस्तुके
ग्रहणका उपाय ही योग है । उसका
तमनुगताः समाहिता अपश्यन् | अनुगमन कर अर्थात् समाहित हो
उन्होंने देवात्मशक्तिका दर्शन—
दृष्टवन्तो देवात्मशक्तिमिति । | साक्षात्कार किया ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
[संस्कृत]
पूर्वोक्तमेव प्रश्नसमुदायपरि-
हाराणां सूत्रमुत्तरत्र प्रत्येकं प्रप-
ञ्चयिष्यते। तत्रायं प्रश्नसंग्रहः-किं
ब्रह्म कारणम् ? आहोस्वित्कालादि?
तथा किं कारणं ब्रह्माहोस्वित्कार्य-
कारणविलक्षणम् ? अथवा कारणं
वाऽकारणं वा ? कारणत्वेऽपि
किमुपादानमुत निमित्तम् ? अथ-
वोभयकारणं ब्रह्म किंलक्षणम् ?
अकारणं वा ब्रह्म किंलक्षणम् ? इति।
तत्रायं परिहारः—न कारणं
नाप्यकारणं न चोभयं नाप्यनु-
भयं न च निमित्तं न चोपादानं
न चोभयम् । एतदुक्तं भवति—
अद्वितीयस्य परमात्मनो न स्वतः
कारणत्वमुपादानत्वं निमित्तत्वं
च। यदुपाधिकमस्य कारणत्वादि
तदेव कारणं निमित्तमुपपाद्य
तदेव प्रयोजकं निष्कृष्य दर्श-
[हिन्दी भाष्यार्थ]
प्रश्नसमुदाय और उसके समा-
धानोंका जो सूत्र पहले कहा जा
चुका है उसीको अब आगे प्रत्येकका
विस्तार करके कहा जायगा । इनमें
प्रश्नसमुदाय तो इस प्रकार है—
क्या ब्रह्म जगत्का कारण है अथवा
कालादि? तथा ब्रह्म कारण है या कार्य-
कारणसे अतीत ? अथवा ब्रह्म कारण है
या नहीं ? यदि कारण है भी तो
उपादान कारण है या निमित्त
कारण ? अथवा दोनों प्रकारका कारण
होनेपर भी ब्रह्मका लक्षण क्या है ?
और यदि वह कारण नहीं है तो
भी उसका क्या लक्षण है ?
इस प्रश्नसमुदायका यह उत्तर
है—ब्रह्म न कारण है, न अकारण
है, न कारणाकारण उभयरूप है, न
इन दोनोंसे भिन्न है, न निमित्त
कारण है, न उपादान कारण है और
न दोनों प्रकारका कारण है। यहाँ
कहना यह है कि अद्वितीय परमात्मा-
का कारणत्व, उपादानत्व अथवा
निमित्तत्व स्वतः कुछ भी नहीं है।
जिस उपाधिके कारण इसका
कारणत्वादि है उसी कारण यानी
निमित्तका उपपादन कर और
उसीको प्रयोजक निश्चित करके
६४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
यति—देवात्मशक्तिमिति। देवस्य | 'देवात्मशक्तिम्' इत्यादि वाक्यसे
द्योतनादियुक्तस्य मायिनो महे- | दिखाते हैं—उन्होंने देव—
श्वरस्य परमात्मन आत्मभूताम- | द्योतनादियुक्त मायावी महेश्वर—
स्वतन्त्रां न सांख्यपरिकल्पित- | परमात्माकी स्वरूपभूता—अस्वतन्त्रा
प्रधानादिवत्पृथग्भूतां स्वतन्त्रां | शक्तिको कारणरूपसे देखा,
शक्तिं कारणमपश्यन् । दर्शयि- | सांख्यमतद्वारा कल्पना किये हुए
ष्यति च—"मायां तु प्रकृतिं | प्रधानादिके समान उससे भिन्न किसी
विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्” | स्वतन्त्रा शक्तिको नहीं। आगे श्रुति
( श्वेता० उ० ४ । १०) इति । | यह दिखलावेगी भी—"मायाको
| प्रकृति जानो और मायावीको
| महेश्वर ।"
तथा ब्राह्मे—"एषा चतुर्विं- | इसी प्रकार ब्रह्मपुराणमें कहा है—
शतिभेदभिन्ना माया परा प्रकृति- | "यह चौबीस प्रकारके भेदोंवाली माया
स्तत्समुत्था ।” तथा च—"मया- | परमात्मासे प्रकट हुई उसीकी परा-
ध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचरा- | प्रकृति है।" तथा गीतामें कहा
चरम् ।” ( गीता ९।१०) इति । | है---"मुझ अधिष्ठानके द्वारा प्रकृति
| चराचरको उत्पन्न करती है।"
स्वगुणैः प्रकृतिकार्यभूतैः पृथि- | [ कैसी शक्तिको देखा—] जो
व्यादिभिश्च निगूढां संवृतां का- | अपने गुणोंसे प्रकृतिके कार्यभूत
र्याकारेण कारणाकारस्याभिभूत- | पृथ्वी आदिसे निगूढ—आच्छादित
त्वात्कार्यात्पृथक्स्वरूपेणोपलब्धु- | थी । अर्थात् कारणका स्वरूप
मयोग्यामित्यर्थः । तथा च प्रकृ- | कार्यके स्वरूपसे दब जानेके कारण,
तिकार्यत्वं गुणानां दर्शयति | जो कार्यसे पृथक् अपने स्वरूपसे
व्यासः—"सत्त्वं रजस्तम इति | उपलब्ध होनेयोग्य नहीं थी । गुण
गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।” ( गीता | प्रकृतिके कार्य हैं—यह बात
१४ । ५) इति । | "सत्त्व, रज और तम ये प्रकृतिसे
| उत्पन्न हुए गुण हैं।" इस वाक्यसे
| व्यासजी भी दिखलाते हैं ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५
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कोऽसौ देवो यस्येयं विश्व- | यह विश्वको उत्पन्न करनेवाली
जननी शक्तिरभ्युपगम्यत इत्य- | शक्ति जिसकी समझी जाती है वह
त्राह—यः कारणानीति । यः | देव कौन है ? इसपर कहते
कारणानि निखिलानि तानि पूर्वो- | हैं—'यः कारणानि' इत्यादि । जो
क्तानि कालात्मयुक्तानि कालात्म- | एक अद्वितीय परमात्मा पहले बतलाये
भ्यां युक्तानि कालपुरुषसंयुक्तानि | हुए कालात्मयुक्त समस्त कारणोंको—
स्वभावादीनि 'कालः स्वभावः' | काल और आत्मासे युक्त अर्थात् काल
इति मन्त्रोक्तान्यधितिष्ठति नियम- | और पुरुषसे संयुक्त स्वभावादिको, जो
यत्येकोऽद्वितीयः परमात्मा तस्य | कि 'कालः स्वभावः' इत्यादि मन्त्रमें
शक्तिं कारणमपश्यन्निति वा- | बतलाये गये हैं, अधिष्ठित–नियमित
क्यार्थः । | करता है, उसीकी शक्तिको जगत्के
| कारणरूपसे देखा—ऐसा इस वाक्यका
| तात्पर्य है ।
अथवा देवात्मशक्तिं देवा- | अथवा देवात्मशक्तिम्—देवात्मना
त्मनेश्वररूपेणावस्थितां शक्तिम्। | अर्थात् ईश्वररूपसे स्थित शक्तिको
तथा च— | देखा; ऐसा ही यह वाक्य भी है—
"सर्वभूतेषु सर्वात्म- | "हे सर्वात्मन् ! आपकी जो गुणोंकी
न्या शक्तिरपरा तव । | आश्रयभूता अपरा शक्ति समस्त
गुणाश्रया नमस्तस्यै | भूतोंमें स्थित है, हे परमेश्वर ! उस
शाश्वतायै परेश्वर ॥ | नित्या शक्तिको नमस्कार है । जो
यातीतागोचरा वाचां | वाणी तथा मनसे अतीत और अगोचर
मनसां चाविशेषणा । | एवं निर्विशेष है तथा ज्ञान और
ज्ञानध्यानपरिच्छेद्या | ध्यानसे जिसका भलीभाँति विवेक
तां वन्दे देवतां पराम्"॥इति | हो सकता है उस परा देवताकी मैं
प्रपञ्चयिष्यति स्वभावादीना- | वन्दना करता हूँ ।" इसके अतिरिक्त
| श्रुति स्वभावादि जगत्के कारण नहीं हैं,
६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
६६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
मकारणत्वमज्ञानस्यैव कारणत्वं अज्ञान ही कारण है—इस बातका आगे
विस्तारपूर्वक वर्णन करेगी; यथा "कोई-
"स्वभावमेके कवयो वदन्ति" कोई विद्वान् स्वभावको ही जगत्का
कारण बतलाते हैं" इत्यादि, "मायी
( श्वेता० उ० ६ । १ ) इत्यादि। परमेश्वर इस विश्वकी रचना करता
"मायी सृजते विश्वमेतत्" है", "एक रुद्र ही है, परमार्थदर्शी
ब्रह्मवेत्ता दूसरेकी अपेक्षा नहीं
( श्वेता० उ० ४ । ९ ) । "एको रखते", "वर्ण ( जाति ) आदि
रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः" विभेदोंसे रहित जिन एकमात्र—
अद्वितीय परमात्माने अपनी नाना
( श्वेता० उ० ३।२) । "एकोऽ- प्रकारकी शक्तियोंके योगसे [ अनेकों
वर्णोंकी सृष्टि की है ]" इत्यादि ।
वर्णो बहुधा शक्तियोगात्" [ कैसी शक्तिको देखा ? ] अपने
( श्वेता० उ० ४ । १ ) इत्यादि। गुणोंसे यानी सर्वज्ञत्वादि ईश्वरीय
स्वगुणैरीश्वरगुणैः सर्वज्ञत्वादि- गुणोंसे अथवा सत्त्वादि प्रकृतिके
गुणोंसे निगूढ देखा; अर्थात् जो
भिर्वा सत्त्वादिभिर्निगूढां कार्य- कार्यकारणभावसे रहित पूर्णानन्दा-
कारणविनिर्मुक्तपूर्णानन्दाद्वितीय- द्वितीय परब्रह्मसे अभिन्न होनेके
कारण उपलब्ध नहीं हो सकती
ब्रह्मात्मनैवानुपलभ्यमानाम् । [ ऐसी शक्तिको देखा ] ।
कोऽसौ देवः ? यः कारणा- वह देव कौन है ? [इसका उत्तर देते
हैं—]जो सब कारणोंका अधिष्ठान है—
नीत्यादि पूर्ववत् । अथवा देवस्य इत्यादि पूर्ववत् समझना चाहिये ।
परमेश्वरस्यात्मभूतां जगदुदय- अथवा देव यानी परमेश्वरकी स्वरूप-
भूता अर्थात् जगत्की उत्पत्ति,
स्थितिलयहेतुभूतां ब्रह्मविष्णु- स्थिति और लयकी हेतुभूता ब्रह्मा,
शिवात्मिकां शक्तिमिति । तथा विष्णु और शिवरूपा शक्तिको
देखा । ऐसा ही कहा भी है—
चोक्तम्—
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६७
“शक्तयो यस्य देवस्य | “जिस देवकी ब्रह्मा, विष्णु और
ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाः” इति। | शिवरूपा शक्तियाँ हैं” इत्यादि तथा
“ब्रह्मविष्णुशिवा ब्रह्म- | “हे ब्रह्मन् ! ब्रह्मा, विष्णु और शिव—
न्प्रधाना ब्रह्मशक्तयः” | ये ब्रह्मकी प्रधान शक्तियाँ हैं”
इति च । | इत्यादि ।
स्वगुणैः सत्त्वरजस्तमोभिः । | ‘स्वगुणैः’ अर्थात् सत्त्व, रज और
सत्त्वेन विष्णू रजसा ब्रह्मा तमसा | तमसे युक्त । सत्त्वादि गुणरूप
महेश्वरः सत्त्वाद्युपाधिसंबन्धात्स्व- | उपाधिके कारण ही वह सत्त्वसे
रूपेण निरुपाधिकपूर्णानन्दाद्वि- | विष्णु, रजसे ब्रह्मा और तमसे महादेव
तीयब्रह्मात्मनैवानुपलभ्यमानाः । | कहा जाता है, ये सब स्वतः निरु-
परस्यैव ब्रह्मणः सृष्ट्यादिकार्यं | पाधिक पूर्णानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूपसे
कुर्वन्तोऽवस्थाभेदमाश्रित्य शक्ति- | तो उपलब्ध हो ही नहीं सकते ।
भेदव्यवहारो न पुनस्तत्त्वभेदमा- | ये परब्रह्मके ही सृष्टि आदि कार्य
श्रित्य । तथा चोक्तम्— | करते हैं, इसलिये अवस्थाभेदके
“सर्गस्थित्यन्तकरणीं | आधारपर इनमें शक्तिभेदका व्यवहार
ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकाम्। | होता है, तात्त्विकभेदके कारण नहीं ।
स संज्ञां याति भगवा- | ऐसा ही कहा भी है—“वह एक ही
नेक एव जनार्दनः” इति । | भगवान् जनार्दन उत्पत्ति, स्थिति
( विष्णुपु० १ । २ । ६६ ) | और संहारकारिणी ब्रह्मा, विष्णु और
| शिवरूप संज्ञाओंको प्राप्त हो
| जाता है ।”
प्रथममीश्वरात्मना मायिरूपे- | परब्रह्म पहले तो ईश्वरस्वरूप
णावतिष्ठते ब्रह्म । स पुनर्मूर्ति- | मायामयरूपसे स्थित होता है ।
रूपेण त्रिधा व्यवतिष्ठते । तेन | फिर वह मूर्त्तरूप होकर तीन
च रूपेण सृष्टिस्थितिसंहाररूप- | प्रकारका हो जाता है । उस
नियमनादिकार्यं करोति । तथा | त्रिविधरूपसे वह जगत्की उत्पत्ति,
| स्थिति, संहार और नियमनादि कार्य
| करता है । इसी प्रकार श्रुति भी
६८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
६८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[मूल संस्कृत-भाष्य]
च श्रुतिः परस्य शक्तिद्वारेण
नियमनादिकार्यं दर्शयति—
“लोकांनीशत ईशनीभिः प्रत्यङ्-
जनांस्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले
संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपाः”
(श्वेता० उ० ३ । २) इति ।
ईशनीभिर्जननीभिः परमशक्ति-
भिरिति विशेषणात् । “ब्रह्म-
विष्णुशिवा ब्रह्मन्प्रधाना ब्रह्म-
शक्तयः” इति स्मृतेः परमशक्ति-
भिरिति परदेवतानां ग्रहणम् ।
अथवा देवात्मशक्तिमिति दे-
वश्चात्मा च शक्तिश्च यस्य परस्य
ब्रह्मणोऽवस्थाभेदास्तां प्रकृति-
पुरुषेश्वराणां स्वरूपभूतां ब्रह्म-
रूपेणावस्थितां परात्परतरां शक्तिं
कारणमपश्यन्निति । तथा च
त्रयाणां स्वरूपभूतं प्रदर्शयिष्य-
ति—“भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च
[हिन्दी-अनुवाद/व्याख्या]
शक्तिके द्वारा परमात्माके नियमनादि
कार्य प्रदर्शित करती है । “परमात्मा
अपनी ईशानी शक्तियोंसे लोकोंका
शासन करता है, वह सभी प्राणियोंके
भीतर विराजमान है । उसने समस्त
लोकोंकी सृष्टि करके उसकी रक्षा
करते हुए प्रलयकाल आनेपर सबको
अपनेमें लीन कर लिया” इत्यादि ।
यहाँ ‘ईशनीभिः’—उत्पत्तिकारिणी
परमशक्तियोंसे ऐसा विशेषण दिया
है [ इससे जाना जाता है कि ब्रह्म
ही अपनी शक्तियोंद्वारा सृष्टि आदि
कार्य करता है ] । तथा “हे ब्रह्मन् !
ब्रह्मा, विष्णु और महादेव ये ब्रह्मकी
प्रधान शक्तियाँ हैं” इस स्मृतिके
अनुसार ‘परमशक्तिभिः’ इस पदसे इन
परदेवताओंका ही ग्रहण होता है ।
अथवा ‘देवात्मशक्तिम्’—देवता,
आत्मा और शक्ति ये जिस परब्रह्मके
अवस्थाभेद हैं उस प्रकृति, पुरुष और
ईश्वरकी स्वरूपभूता ब्रह्मरूपसे स्थित
परात्पर शक्तिको उन्होंने कारण-
रूपसे देखा; ऐसा ही इन तीनोंके स्व-
रूपभूत ब्रह्मका “भोक्ता (जीव), भोग्य
(प्राकृत प्रपञ्च) और प्रेरक (अन्त-
र्यामी) परमात्मा इन तीनोंके स्वरूपको
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९
मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममे- | जानकर फिर तीन भेदोंमें बताये हुए
तत्” (श्वेता० उ० १ । १२) “त्रयं | समस्त तत्त्वोंको ब्रह्म ही समझे”
यदा विन्दते ब्रह्ममेतत्” (श्वेता० | तथा “जिस समय इन तीनोंको ब्रह्म-
उ० १ । ९) इति । स्वगुणैर्ब्रह्म- | रूपसे अनुभव करता है ।” इन
परतन्त्रैः प्रकृत्यादिविशेषणैरुपा- | वाक्योंसे श्रुति उल्लेख करेगी ।
धिभिर्निगूढाम् । तथा च दर्श- | [उस शक्तिको] स्वगुणैः—ब्रह्मके
यिष्यति—“एको देवः सर्व- | आश्रित प्रकृति आदि विशेषणरूप
भूतेषु गूढः” (श्वेता० उ० ६ । | उपाधियोंसे आच्छादित देखा । ऐसा
११) इति । “तं दुर्दर्शं गूढ- | ही “समस्त भूतोंमें छिपा हुआ एक
मनुप्रविष्टम्” (क० उ० १ । २ । | देव है” इत्यादि वाक्यसे श्रुति
१२) । “यो वेद निहितं | आगे दिखावेगी । तथा इसी अर्थमें
गुहायाम्” (तै० उ० २ । १ । १)। | “उस कठिनतासे दीखनेवाले प्रच्छन्न-
“इहैव सन्तं न विजानन्ति | रूपसे अनुप्रविष्टको” “जो बुद्धिरूप
देवाः” इति श्रुत्यन्तरम् । यः | गुहामें छिपे हुए उस देवको जानता
कारणानीति पूर्ववत् । | है”, “इसी देहके भीतर विद्यमान
| रहते हुए भी इन्द्रियाँ उसे नहीं
| जानतीं” इत्यादि अन्य श्रुतियाँ भी
| हैं । ‘यः कारणानि’ इत्यादि वाक्य-
| का अर्थ पूर्ववत् है ।
अथवा देवात्मनो द्योतना- | अथवा देवात्मा—द्योतनात्मक—
त्मनः प्रकाशस्वरूपस्य ज्योतिषां | प्रकाशस्वरूप अर्थात् समस्त तेजोंके
ज्योतीरूपस्य प्रज्ञानघनस्वरूपस्य | तेज प्रज्ञानघनमूर्ति परमात्माकी
परमात्मनो जगदुदयस्थितिलयं- | जगत्का सृजन, पालन, संहार और
नियमनविषयां शक्तिं सामर्थ्य- | नियन्त्रण करनेवाली शक्ति अर्थात्
मपश्यन्निति स्वगुणैः स्वव्यष्टिभू- | सामर्थ्यको देखा, जो स्वगुणैः—
तैः सर्वज्ञसर्वेशितृत्वादिभिर्निगूढां | सर्वज्ञ-सर्वेशितृत्वादि अपने ही
| अंशभूत गुणोंसे आच्छादित
७० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
७० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
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तत्तद्विशेषरूपेणावस्थितत्वात्स्व- | होनेके कारण उन-उन विशेषरूपोंसे
रूपेण शक्तिमात्रेणानुपलभ्यमा- | स्थित रहनेके कारण अपने शक्ति-
नाम् । तथा च मानान्तरवेद्यां | मात्र शुद्धरूपसे उपलब्ध नहीं हो
शक्तिं दर्शयिष्यति— | सकती । इसी प्रकार आगे चलकर
“न तस्य कार्यं करणं च विद्यते | श्रुति उस शक्तिको अन्य किन्हीं
न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । | प्रमाणोंसे अज्ञेय ही प्रदर्शित करेगी ।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते | “उस परमात्माका कोई कार्य
स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥” | ( देह ) या करण ( इन्द्रिय ) नहीं
(श्वेता० उ० ६ । ८) | है; उसके समान या उससे अधिक
इति । समानमन्यत् । | भी कोई नहीं है । उसकी नाना
कारणं देवात्मशक्तिमिति | प्रकारकी पराशक्ति और स्वाभाविक
प्रश्ने परिहारे च ये ये पक्षभेदाः | ज्ञानके प्रभावसे होनेवाली क्रिया सुनी
प्रदर्शितास्ते सर्वे संगृहीताः । | जाती है ।” शेष अर्थ पूर्ववत् है ।
उत्तरत्र सर्वेषां प्रपञ्चनादप्रस्तुतस्य | ‘किं कारणम्’ और ‘देवात्म-
प्रपञ्चनायोगात्प्रश्नोत्तरदर्शनाच्च । | शक्तिम्’ इस प्रश्न और उत्तरमें
समासव्यासधारणस्य च विदुषा- | जो-जो पक्षभेद दिखाये गये हैं
| उन सबका यहाँ श्रुतिमें संक्षेपसे
| संग्रह किया हुआ है; क्योंकि
| आगे इन सबका विस्तारसे निरूपण
| किया गया है । तथा अप्रस्तुत विषय-
| का विस्तार करना उचित नहीं होता
| और [इनके विषयमें तो] प्रश्नोत्तर भी
| देखे गये हैं ।* इनका संक्षेप और
| विस्तारसे जो वर्णन किया गया है
* इससे भी सिद्ध होता है कि पूर्वोक्त पक्ष श्रुतिसम्मत ही है, क्योंकि यहाँ
जितने पक्षान्तर दिखाये गये हैं उन सबमें प्रमाणपूर्वक श्रुतिकी भी सहमति दिखायी
ही गयी है।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७१
मिष्टत्वात् । तथा चोक्तम्—"इष्टं | वह तो विद्वानोंको इष्ट होनेके कारण
हि विदुषां लोके समासव्यास- | है । ऐसा ही कहा भी है—
| “लोकमें संक्षेप और विस्तारपूर्वक
धारणम्” इति। तथा च श्रुत्यन्तरे | विषयको अवधारण करना विद्वानोंको
| इष्ट ही है” इसी प्रकार एक दूसरी
सकृच्छ्रुतस्य गोपामितिपदस्य | श्रुतिमें एक बार आये हुए 'गोपाम्'
| इस पदकी व्याख्याका भेद स्वयं
व्याख्याभेदः श्रुत्यैव प्रदर्शितः— | श्रुतिने ही दिखाया है । वहाँ
'अपश्यं गोपामित्याह प्राणा वै | 'अपश्यं गोपामित्याह प्राणा वै
गोपाः' इति। 'अपश्यं गोपामित्याह | गोपाः' ऐसा कहा है, और फिर
| दुबारा 'अपश्यं गोपामित्याह
असौ वा आदित्यो गोपाः' इति । | असौ वा आदित्यो गोपाः' ऐसा
| कहा है । इसी प्रकार 'यह
'अथ कस्मादुच्यते ब्रह्म' इत्यारभ्य | ब्रह्म क्यों कहा जाता है' ऐसा
'बृंहति बृंहयति तस्मादुच्यते | कहकर 'बढ़ा हुआ है और बढ़ाता
| है इसलिये यह परब्रह्म कहा जाता
परं ब्रह्म' इति सकृच्छ्रुतस्य ब्रह्म- | है' ऐसा कहकर श्रुतिमें एक बार
| आये हुए 'ब्रह्म' पदका स्वयं श्रुतिने
पदस्य निमित्तोपादानरूपेणार्थ- | ही निमित्त और उपादानभेदसे अर्थ-
भेदः श्रुत्यैव दर्शितः ॥३॥ | भेद दिखलाया है ॥३॥
एवं तावद् 'देवात्मशक्तिं' 'यः | इस प्रकार यहाँतक 'परमात्मा-
| की शक्तिको देखा' और 'जो
१. मैंने गोपा ( पालन करनेवाले ) का दर्शन किया, प्राण ही गोपा हैं ।
२. मैंने गोपाका दर्शन किया वह सूर्य ही गोपा हैं ।
७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
७२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[बायाँ स्तम्भ]
कारणानि निखिलानि काला-
त्मना युक्तान्यधितिष्ठत्येकः' इत्ये-
कस्याद्वितीयस्य परमात्मनः स्व-
रूपेण शक्तिरूपेण च निमित्त-
कारणोपादानकारणत्वं मायित्वे-
नेश्वररूपत्वं देवतात्मत्वसर्वज्ञ-
त्वादिरूपत्वममायित्वेन सत्य-
ज्ञानानन्दाद्वितीय रूपत्वं च समा-
सेन श्रुत्यर्थाभ्यामभिहितम् ।
इदानीं तमेव सर्वात्मानं दर्शयति
कार्यकारणयोरनन्यत्वप्रतिपादनेन ।
“वाचारम्भणं विकारो नाम-
धेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” (छा०
उ० ६।१।४) इति निदर्श-
नेनाद्वितीयापूर्वानपरनेतिनेत्या-
त्मकवागगोचराशनायाद्यसंस्पृष्ट-
प्रत्यस्तमितभेदचित्सदानन्दब्रह्मा-
त्मत्वं प्रदर्शयितुमनाः प्रकृत्यैव
प्रपञ्चभ्रान्तामवस्थां प्राप्तस्य पर-
ब्रह्मण ईश्वरारत्मना सर्वज्ञत्वाप-
हतपाप्मादिरूपेण देवतात्मना
[दायाँ स्तम्भ]
अकेले ही काल और आत्माके सहित
सबका अधिष्ठान है' इन दो श्रुतिके
अर्थोंसे एक ही परमात्माके स्वरूप
और शक्तिरूपसे निमित्त और
उपादान कारण होनेका, मायावी-
रूपसे ईश्वर, देवता और सर्वज्ञादि
होनेका और अमायिकरूप-
से सत्यज्ञानानन्दस्वरूप एवं
अद्वितीय होनेका संक्षेपमें वर्णन
किया गया । अब कार्य
और कारणकी अभिन्नताका
प्रतिपादन करती हुई श्रुति उसीको
सर्वरूप दिखलाती है। तथा “विकार
वाणीसे आरम्भ होनेवाला नाममात्र
है, केवल मृत्तिका ही सत्य है”
इस दृष्टान्तके द्वारा समर्थित जो
अद्वितीय, कार्यकारणभावशून्य,
नेति-नेतिस्वरूप, वाणीका अविषय,
क्षुधादि विकारोंसे असंस्पृष्ट, सर्वभेद-
रहित, सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्मतत्त्व
है उसे प्रदर्शित करनेकी इच्छासे
स्वभावसे ही प्रपञ्चरूप भ्रान्ति-
मयी अवस्थाको प्राप्त हुए परब्रह्म-
की जो सर्वज्ञत्व और पापशून्यत्वादि-
रूप ईश्वरभावसे, ब्रह्मादिरूप
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७३
[वाम भाग / संस्कृत मूल]
ब्रह्मादिरूपेण कार्यादिरूपेण
वैश्वानरादिरूपेण च मोक्षापे-
क्षितशुद्ध्यर्थम् "स यदि पितृ-
लोककामः" (छा० उ० ८।
२। १) इति विश्वैश्वर्यार्थाम् "मां
वा नित्यं शङ्करं वा प्रयाति"
इत्यादिदेवतासायुज्यप्राप्त्यर्थां
वैश्वानरादिप्राप्त्यर्थां चोपासना-
मशेषलौकिकवैदिककर्मप्रसिद्धिं
च दर्शयति । यदि कार्यकारण-
रूपेण स्वरूपेण चित्सदानन्दा-
द्वितीयब्रह्मात्मना च व्यवस्थितं
न स्यात्तदा भोग्यभोक्तृनियन्त्र-
भावे संसारमोक्षयोरभाव एव
स्यात् । अधिकारिणोऽभावेन
साधनभूतस्य प्रपञ्चस्याभावात् ।
तत्फलदातुश्चेश्वरस्याभावात् ।
तथा संसारादिहेतुभूतमीश्वरं
दर्शयति-"संसारमोक्षस्थितिबन्ध-
हेतुः" इति । तथा च संसारमोक्ष-
[दक्षिण भाग / हिन्दी अनुवाद]
देवभावसे, [ आकाशादिरूप ] कार्य-
भावसे और वैश्वानरादिरूपसे
मोक्षापेक्षित चित्तशुद्धि तथा
"यदि वह पितृलोककी कामनावाला
होता है" इत्यादि श्रुतिके अनुसार
सम्पूर्ण ऐश्वर्यप्राप्ति, "वह सर्वदा
मुझे या शंकरको प्राप्त होता है"
इत्यादि प्रमाणके अनुसार इष्टदेवसे
सायुज्यप्राप्ति एवं वैश्वानरादि भावोंकी
प्राप्तिके लिये उपासना है उसको
तथा सम्पूर्ण लौकिक-वैदिक कर्म-
परम्पराको प्रदर्शित करती है। यदि
परमात्मा कार्य-कारणरूपसे और
स्वरूपतः सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूप-
से स्थित न होता तो भोक्ता, भोग्य और
नियन्ताका अभाव हो जानेसे संसार
और मोक्षका भी अभाव हो जाता;
क्योंकि अधिकारीके न रहनेसे न तो
उसका साधनभूत प्रपञ्च रहता है और
न उसे साधनका फल देनेवाला ईश्वर
ही। तथा "[ ईश्वर ही ] संसार,
मोक्ष, स्थिति और बन्धनका हेतु है"
यह शास्त्रवाक्य संसारादिके हेतुभूत
ईश्वरको सिद्ध करता है । और
७४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
७४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
योरभाव एव स्यात् । तत्सिद्धयर्थं | ईश्वरके न रहनेपर तो संसार और
प्रपञ्चाद्यवस्थानं दर्शयति— | मोक्षका अभाव ही हो जाना चाहिये
"एकं पादं नोत्क्षिपति | था । अतः उसको सिद्धिके लिये
सलिलाद्धंस उच्चरन् । | सनत्सुजातजी भी "एकं पादं
स चेदविन्ददानन्दं | नोत्क्षिपति" इत्यादि वाक्यसे यह
न सत्यं नानृतं भवेत् " | बतलाते हुए कि "हंस (परमात्मा)
इति सनत्सुजातोऽप्येकं पादं | जल ( संसार ) से ऊपर रहते हुए
नोत्क्षिपतीत्यादि । तथा च | भी अपना एक पाद नहीं निकालता ।
श्रुतिः—"पादोऽस्य विश्वा भू- | यदि वह [ स्वरूपभूत ] आनन्दका
तानि त्रिपादस्यामृतं दिवि" (छा० | अनुभव करने लगे तो न सत्य
उ० ३।१२।६) इति । तत्र प्रथमेन | ( मोक्ष ) ही रहे और न मिथ्या
मन्त्रेण सर्वात्मानं ब्रह्म चक्रं | ( संसार ) ही" ईश्वरकी सिद्धिके
दर्शयति द्वितीयेन नदीरूपेण— | लिये प्रपञ्चादिकी स्थिति दिखलाते
| हैं। ऐसा ही "सम्पूर्ण भूत परमात्मा-
| के एक पाद हैं और उसके अमृत-
| मय तीन पाद द्युलोकमें हैं"
| यह श्रुति भी बतलाती है । यहाँ
| श्रुति पहले मन्त्रसे सर्वात्मा ब्रह्मको
| चक्ररूपसे और दूसरे मन्त्रसे नदी-
| रूपसे प्रदर्शित करती है—
कारण-ब्रह्मका चक्ररूपसे वर्णन
तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तं
शतार्धारं विंशतिप्रत्यराभिः ।
अष्टकैः षड्भिर्विश्वरूपैकपाशं
त्रिमार्गभेदं द्विनिमित्तैकमोहम् ॥ ४ ॥
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५
उस एक नेमि, तीन वृत, सोलह अन्त, पचास अरों, बीस प्रत्यरों,
छः अष्टकों, विश्वरूप एकपाश, तीन मार्गों, तथा [ पाप-पुण्य ] दोनोंके
निमित्तभूत एक मोहवाले कारणको [ उन्होंने देखा* ] ॥ ४ ॥
तमेकेति । य एकः कारणानि | ‘तमेकनेमिम्····’ इत्यादि । जो
निखिलान्यधितिष्ठति तमेकनेमिं | अकेला ही समस्त कारणोंमें अधिष्ठित
| है, उस एक नेमिवालेको [ उन्होंने
योनिः कारणमव्याकृतमाकाशं | देखा । ] जो योनि, कारण, अव्याकृत,
परमव्योम माया प्रकृतिः शक्ति- | आकाश, परव्योम, माया, प्रकृति,
| शक्ति, तम, अविद्या, छाया, अज्ञान,
स्तमोऽविद्या छायाज्ञानमनृतम- | अनृत और अव्यक्त इत्यादि शब्दोंसे
व्यक्तमित्येवमादिशब्दैरभिलप्य- | कही जाती है वह एक कारणावस्था
| ही जिस अधिष्ठाता अद्वितीय पर-
मानैका कारणावस्था नेमिरिव | मात्माकी नेमिके समान नेमि अर्थात्
नेमिः सर्वाधारो यस्याधिष्ठातुरद्वि- | सम्पूर्ण कार्यवर्गका आधार है
तीयस्य परमात्मनस्तमेकनेमिम् । | ऐसे उस एक नेमिवाले और
| ‘त्रिवृतम्’—सत्त्व, रज, तमरूप
त्रिवृतं त्रिभिः सत्त्वरजस्तमोभिः | प्रकृतिके तीन गुणोंसे वृत (घिरे
प्रकृतिगुणैर्वृतम् । | हुए ) परमात्माको [ कारणरूपसे
| देखा ] ।
षोडशको विकारः पञ्च भूता- | तथा सोलह विकार अर्थात् पाँच
न्येकादशेन्द्रियाण्यन्तोऽवसानं | भूत और ग्यारह इन्द्रियाँ—ये जिस
| आत्माके अन्त–अवसान यानी
विस्तारसमाप्तिर्यस्यात्मनस्तं षोड- | विस्तारकी समाप्ति हैं उस सोलह
- अथवा अगले मन्त्रके क्रियापद ‘अधीमः’ का अध्याहार करके ‘हम जानते
हैं’ ऐसा अर्थ करना चाहिये ।
७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
शान्तम् । अथवा प्रश्नोपनिषदि | अन्तोंवाले; अथवा प्रश्नोपनिषद्में
"यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभव- | “यस्मिन्नेताः षोडशकलाः प्रभवन्ति” यहाँसे लेकर “स प्राणमसृजत्
न्ति” (६।२) इत्यारभ्य | प्राणाच्छ्रद्धाम्” इत्यादि मन्त्रसे कही
"स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धाम्” | हुई जो [ प्राणसे लेकर ] नामपर्यन्त सोलह कलाएँ हैं वे ही जिसका
(६।४) इत्यादिना प्रोक्ता | अवसान हैं, [ उस आत्माको कारण-
नामान्ताः षोडशकला अवसानं | रूपसे देखा ]। अथवा 'एकनेमिम्' इस
यस्येति । अथवैकनेमिमिति का- | पदसे कारणभूता अव्याकृतावस्थाका वर्णन किया गया है, उसके समष्टि-
रणभूताव्याकृतावस्थाभिहिता । | कार्यभूत विराट् और सूत्रात्मा ये दो
तत्कार्यसमष्टिभूतविराट्सूत्रद्वयं | और व्यष्टिकार्यभूत भूः आदि
तद्व्यष्टिभूतभूरादिचतुर्दश भुव- | चौदह भुवन ये सोलह जिस प्रपञ्च- रूपसे स्थित परमात्माके अन्त हैं
नान्यन्तोऽवसानं यस्य प्रपञ्चात्म- | उस षोडशान्तको [ कारणरूपसे
नावस्थितस्य तं षोडशान्तम् । | देखा ] ।
शतार्धारम् । पञ्चाशत्प्रत्यय- | पचास अरोंवाले—विपर्यय,
भेदा विपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्या- | अशक्ति, तुष्टि और सिद्धि नामक
ख्या अरा इव यस्य तं शता- | पचास प्रत्ययभेद जिसके अरोंके समान हैं उस पचास अरोंवालेको
र्धारम् । पञ्च विपर्ययभेदाः- | [ देखा ] । तम, मोह, महामोह,
तमो मोहो महामोहस्तामिस्रो | तामिस्र और अन्धतामिस्र ये पाँच
ह्यन्धतामिस्र इति । अशक्तिरष्टा- | विपर्ययके भेद हैं । अशक्ति अट्ठाईस
१. प्रश्नोपनिषद्के षष्ठ प्रश्नमें निम्नलिखित सोलह कलाएँ बतलायी हैं—
प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप,
मन्त्र, कर्म, लोक और नाम। यहाँ 'कला' शब्दका अर्थ इस प्रकार है—कं ब्रह्म
लीयते आच्छाद्यते यया, सा कला। अर्थात् जिसके द्वारा क (ब्रह्म) लीन
(ढका हुआ) है उसे कला कहते हैं। इन्होंने ब्रह्मके पारमार्थिक स्वरूपको ढक
रखा है, इसलिये ये कलाएँ हैं।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७७
विंशतिधा । तुष्टिर्नवधा । अष्टधा | प्रकारकी है, तुष्टि नौ प्रकारकी
सिद्धिः । एते पञ्चाशत्प्रत्यय | और सिद्धि आठ प्रकारकी । ये ही
भेदाः । तत्र तमसो भेदोऽष्ट- | पचास प्रत्ययभेद हैं । इनमें तमके
विधः । अष्टसु प्रकृतिष्वनात्म- | आठ भेद हैं—अनात्मभूत आठ
स्वात्मप्रतिपत्तिविषयभेदेनाष्टविध- | प्रकृतियोंमें आत्मभाव होना यही
त्वप्रतिपत्तेः । मोहस्य चाष्ट- | भावोंके विषयभेदके अनुसार आठ
विधो भेदः । अणिमादिशक्ति- | प्रकारका तम है । मोहका आठ
र्मोहः । दशविधो महामोहः । | प्रकारका भेद है, अणिमादि आठ
दृष्टानुश्रविकशब्दादिविषयेषु प- | शक्तियाँ ही मोह हैं । महामोह दश
ञ्चसु पञ्चस्वभिनिवेशो महामोहः। | प्रकारका है; दृष्ट ( लौकिक ) और
दृष्टानुश्रविकभेदेन तेषां दशवि- | श्रुत ( पारलौकिक ) शब्दादि पाँच-
धत्वम् । तामिस्रोऽष्टादशविधः । | पाँच विषयोंमें जो सत्यत्वबुद्धि है
दृष्टानुश्रविकेषु दशसु विषयेष्वष्ट- | वही महामोह है, दृष्ट और आनु-
विधैरैश्वर्यैः प्रयतमानस्य तदसिद्धौ | श्रविक भेदसे वे दश प्रकारके हैं ।
यः क्रोधः स तामिस्रोऽभिधीयते । | तामिस्र अठारह प्रकारका है । आठ
अन्धतामिस्रोऽप्यष्टादशविधः । | प्रकारके ऐश्वर्योंद्वारा दश प्रकारके
अष्टविधैश्वर्ये दशसु विषयेषु | दृष्ट और आनुश्रविक विषयोंके लिये
भोग्यत्वेनोपस्थितेष्वर्धभुक्तेषु मृ- | प्रयत्न करते हुए उनकी प्राप्ति न
त्युना हियमाणस्य यः शोको | होनेपर जो क्रोध होता है वह तामिस्र
| कहलाता है । अन्धतामिस्र भी
| अठारह प्रकारका है । आठ प्रकारके
| ऐश्वर्य और दशों प्रकारके विषय
| भोग्यरूपसे उपस्थित रहनेपर उन्हें
| आधे भोगनेपर ही मृत्युके द्वारा
| उनसे छुड़ा दिये जानेपर जो ऐसा
१. सांख्यशास्त्रानुसार प्रधान, महत्तत्त्व, अहंकार और पञ्चतन्मात्रा—ये आठ
प्रकृतियाँ हैं—इनमें भी प्रधान केवल प्रकृति है और महदादि सात प्रकृति-विकृति
हैं । तथा श्रीमद्भगवद्गीतामें पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और
अहंकारको भगवान्की अष्टधा प्रकृति कहा है । किन्तु आगे ये प्रकृतियाँ प्रकृत्यष्टकमें
ली हैं, इसलिये यहाँ पूर्वोक्त सांख्यसम्मत प्रकृतियाँ ही समझनी चाहिये ।