श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[संस्कृत-टीका]
प्राप्तिः । भूतान्याकाशादीनि वा
योनिः ? पुरुषो वा विज्ञानात्मा
योनिः ? इतीत्थमुक्तप्रकारेण किं
योनिरिति चिन्त्या चिन्त्यं
निरूपणीयम् । केचिद्योनिशब्दं
प्रकृतिं वर्णयन्ति । तस्मिन्यक्षे
किं कारणं ब्रह्मेति पूर्वोक्तं कारण-
पदमत्राप्यनुसंधेयम् ।
तत्र कालादीनामकारणत्वं
(पार्श्व-टिप्पणी: कालादीनाम् अकारणत्वोपपादनम्)
दर्शयति—संयोग
एषामित्यादिना ।
अयमर्थः—किं काला-
दीनि प्रत्येकं कारणमुत तेषां
समूहः । न च प्रत्येकं कालादीनां
कारणत्वं संभवति, दृष्टविरुद्ध-
त्वात् । देशकालनिमित्तानां संह-
तानामेव लोके कार्यकरत्वदर्श-
नात् । न चाप्येषां कालादीनां
संयोगः समूहः कारणम्,
समूहस्य संहतेः परार्थत्वेन
शेषत्वेन शेषिण आत्मनो विद्य-
[हिन्दी-अनुवाद]
आकस्मिक घटना अथवा आकाशादि
भूत कारण हैं ? या पुरुष यानी
विज्ञानात्मा जगत्का कारण है ? इस
प्रकार उपर्युक्त रीतिसे यह विचारना
यानी बतलाना चाहिये कि इसमें
कौन कारण है ? कोई 'योनिः'
शब्दका अर्थ प्रकृति बतलाते हैं ?
उस अवस्था में पूर्व मन्त्रमें 'किं कारणं
ब्रह्म' इस प्रश्नमें आये हुए कारण-
पदकी यहाँ भी अनुवृत्ति कर लेनी
चाहिये ।
इसपर श्रुति 'संयोग एषाम्' इत्यादि
वाक्यसे यह प्रदर्शित करती है कि
काल आदि कारण नहीं है । इसका
अभिप्राय यों समझना चाहिये—क्या
काल, स्वभाव आदिमेंसे प्रत्येक
ही कारण है अथवा उन सबका
समूह ? कालादिमेंसे प्रत्येक तो
कारण हो नहीं सकता, क्योंकि
ऐसा मानना प्रत्यक्ष विरुद्ध है । लोकमें
देश-कालादि निमित्तोंको परस्पर
मिलकर ही कार्य करते देखा गया
है । और इन कालादिका संयोग
यानी समूह भी कारण नहीं हो
सकता है; क्योंकि समूह यानी संहति
परार्थ अर्थात् शेष है और उसका शेषी
आत्मा विद्यमान है, अतः स्वतन्त्र न