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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 276 में से

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पृष्ठ 77

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३


[संस्कृत]

पूर्वोक्तमेव प्रश्नसमुदायपरि-
हाराणां सूत्रमुत्तरत्र प्रत्येकं प्रप-
ञ्चयिष्यते। तत्रायं प्रश्नसंग्रहः-किं
ब्रह्म कारणम् ? आहोस्वित्कालादि?
तथा किं कारणं ब्रह्माहोस्वित्कार्य-
कारणविलक्षणम् ? अथवा कारणं
वाऽकारणं वा ? कारणत्वेऽपि
किमुपादानमुत निमित्तम् ? अथ-
वोभयकारणं ब्रह्म किंलक्षणम् ?
अकारणं वा ब्रह्म किंलक्षणम् ? इति।
तत्रायं परिहारः—न कारणं
नाप्यकारणं न चोभयं नाप्यनु-
भयं न च निमित्तं न चोपादानं
न चोभयम् । एतदुक्तं भवति—
अद्वितीयस्य परमात्मनो न स्वतः
कारणत्वमुपादानत्वं निमित्तत्वं
च। यदुपाधिकमस्य कारणत्वादि
तदेव कारणं निमित्तमुपपाद्य
तदेव प्रयोजकं निष्कृष्य दर्श-


[हिन्दी भाष्यार्थ]

प्रश्नसमुदाय और उसके समा-
धानोंका जो सूत्र पहले कहा जा
चुका है उसीको अब आगे प्रत्येकका
विस्तार करके कहा जायगा । इनमें
प्रश्नसमुदाय तो इस प्रकार है—
क्या ब्रह्म जगत्का कारण है अथवा
कालादि? तथा ब्रह्म कारण है या कार्य-
कारणसे अतीत ? अथवा ब्रह्म कारण है
या नहीं ? यदि कारण है भी तो
उपादान कारण है या निमित्त
कारण ? अथवा दोनों प्रकारका कारण
होनेपर भी ब्रह्मका लक्षण क्या है ?
और यदि वह कारण नहीं है तो
भी उसका क्या लक्षण है ?
इस प्रश्नसमुदायका यह उत्तर
है—ब्रह्म न कारण है, न अकारण
है, न कारणाकारण उभयरूप है, न
इन दोनोंसे भिन्न है, न निमित्त
कारण है, न उपादान कारण है और
न दोनों प्रकारका कारण है। यहाँ
कहना यह है कि अद्वितीय परमात्मा-
का कारणत्व, उपादानत्व अथवा
निमित्तत्व स्वतः कुछ भी नहीं है।
जिस उपाधिके कारण इसका
कारणत्वादि है उसी कारण यानी
निमित्तका उपपादन कर और
उसीको प्रयोजक निश्चित करके