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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१६८ नामदेव की हिन्दी कविता
भी देखो वही दिखाई देता है। माया के विचित्र चित्रों से संसार मुग्ध है, कोई विरला
ही उसे जान पाता है।¹
इधर भगवान है, उधर भगवान है, भगवान के बिना संसार में कुछ भी नही है।
नामदेव कहते हैं—'हे भगवन्। पृथ्वी के जल थल आदि सभी स्थानो में तुम
व्याप्त हो।''²
'हे वैकुंठनाथ तेरी लीला अगाध है। मैं जिधर जाता हूँ उधर तुझे ही देखता
हूँ। जल में, थल में, काष्ट में, पाषाण में तू ही है। आगम, निगम, वेद, पुराण तेरा ही
गुणगान करते हैं।'³
प्रत्येक जीव के हृदय में भगवान है। हाथी और चोटी एक ही मिट्टी के बने
हैं। ये सब उसी भगवान के अंश मात्र हैं। जड़-जंगम आदि सभी में ब्रह्म समान रूप से
व्यापक है।⁴
'जब न माँ थी, न पिता था, न कर्म था, न काया थी, न हम थे, न तुम थे।
तब इस चराचर की सृष्टि कैसे हो गई ? नामदेव ने स्पष्ट कहा है कि वह परमतत्त्व ही
ब्रह्म है जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई ।''⁵
'हे परमात्मा ! तुम्हारी भक्ति मुझसे नहीं होती। सकल जीवो की उत्पत्ति
१. एक अनेक विआपक पूरन जत देखउ तत सोई ।
माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझे कोई ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५० ।
२. ईभै बीठलु ऊभै बीठलु, बीठल बिनु संसारु नही ।
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिउ तूं सरब मही ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ३ ।
३. तू अगाध वैकुंठनाथा तेरे परनो मेरा भाषा ।
सरबे भूता नामा पेखूं । जत्र जाऊँ तत्र तूं ही देखूं ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १२ ।
४. एवल माटी कुंजर चोटी भाजन रे बहु नाना ।
थावर जंगम कीट पतंगा सब घटिराम समाना ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ६ ।
५. माइ न होती बापु न होता करमु न होती काइआ ।
नामा प्रणवै परम ततु है सतिपुरु होइ सखाइआ ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २०६ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६६
तुमसे हुई है। तुम घट-घट वासी हो।’¹
‘भगवान वैसे ही प्राणिमात्र में अन्तर्यामी है जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब दिख-
लाई पड़ता है। ब्रह्म घट घट वासी है। ज्ञान हो जाने पर उसका दिव्य प्रकाश छिपता
नहीं।’²
जीवात्मा (आत्म दर्शन)
आत्म परम्परा—मनुष्य के शरीर के भीतर एवं बाहर जिस सत्त्व का प्रकाश
है, उसे जानने का प्रयास सदा से होता आ रहा है। प्राचीन काल ही से मनुष्य की
चेष्टा रही है कि यह आत्मा क्या है, उसका स्वरूप क्या है? उसकी गति-प्रगति आदि
क्या है इसका परिचय प्राप्त करे।
जीवात्मा के स्वरूप का परिचय ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंत्र ‘द्वासुपर्णा’ में व्यक्त किया
गया है। इस मंत्र में कहा गया है—‘सदा साथ रहने वाले, परस्पर सख्य भाव रखने
वाले दो पक्षी एक ही वृक्ष का आश्रय लेकर रहते हैं। उनमें एक जीवात्मा उस वृक्ष के
फलों का उपभोग करता है किंतु दूसरा उनका उपभोग न करता हुआ साक्षी रूप में
केवल देखता रहता है।’³
उपनिषदों में आत्म तत्त्व की पूर्ण प्रतिष्ठा है। यहाँ ब्रह्म और आत्मा को
ही ध्वनित किया गया है। यह आत्मा ब्रह्म है।⁴ मैं ब्रह्म हूँ।⁵ यह पुरुष स्वयं ज्योति
है।⁶ यह आत्मा ब्रह्म है, सबका अनुभव करने वाला है।⁷
आत्म-ज्ञान को उपनिषदों में जीवन का चरम लक्ष्य माना गया है। बृहदारण्यक
१. जामै सकल जीव की उतपति। सकल जीव मै आपजी।
माया मोहु करि जगत भुलाया। घटि घटि व्यापक बापजी॥
—सं० ना० हि० प०, पद ४८।
२. ऐसो रामराइ अंतरजामी। जैसे दरपनमाहि बदन परवानी।
बसै घटाघट छीप न छीपै। बंधनमुकता जानु न दीसै॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ५८।
३. द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥
—ऋग्वेद १। १६४। २०।
४. अयमात्मा ब्रह्म। —बृहद० २। ५। १६।
५. अहं ब्रह्मास्मि। —बृहद० १ ४। १०।
६. अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः। —बृहद० ४। ३। ६।
७. अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः। —बृहद० २। ५। १६।

१७० नामदेव की हिन्दी कविता
उपनिषद् मे कहा गया है—इस आत्मा की खोज करनी चाहिए ।'१ तथा आत्मा है, इस
प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिए ।२ यहाँ आत्मा को परमार्थ सत्य एवं मूल तत्त्व
माना गया है ।
शांकर वेदांत के अनुसार जिस तत्त्व का व्यतिरेक अथवा बाध नही हो सकता,
वह अन्वयी तत्त्व ही सत्य एव नित्य है ।३ आचार्य शंकर कहते है कि कोई भी व्यक्ति
अपने अस्तित्व से इनकार नही कर सकता । मे हूँ, यह अनुभव सभी को होता है ।'४
वही ज्ञाता है और वही ज्ञेय है । उसे जानने के लिए किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं । वह
स्वयं सिद्ध है । आत्मा अकर्ता है, अभोक्ता है और सुख दुख से परे है । सुख दुख की
समस्त प्रतीतियाँ अंत करण, शरीर, इन्द्रियां आदि उपाधियों के संबंधो के कारण है, वे
आत्मा के निजी स्वरूप में नही है ।'५
स्वरूप लक्षण में आत्मा नित्य, मुक्त, अजन्मा, निराकार, अमर, अनन्त, सर्व-
व्यापी तथा चैतन्य-स्वरूप है ।
तटस्थ-लक्षण अथवा आत्मा की व्यावहारिक प्रतीति जीव होती है । अविद्या
जीव का अज्ञान है । यही आत्मा जब नाम-रूप की उपाधि से युक्त होता है, तब जीव
कहलाता है । जिसे व्यक्ति कहा जाता है वही जीव है । जब अन्त करण आत्मा को नाम
रूप की उपाधि से सीमित कर देता है तो इस चैतन्य को साक्षी कहा जाता है और
जब अन्त.करण व्यक्तित्व का निर्माण करता है तो इसे जीव कहा जाता है । जीव का
ही सम्बन्ध शुभ-अशुभ कर्मों के फल से होता है ।'६
जीव सम्बन्धी नामदेव के विचार
जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध—नामदेव जीव को ब्रह्म का अंश मानते हैं । वे
कहते हैं कि 'हे माधव ! तुम मुझसे बाजी क्यो नही लगाते हो ? (तुम बताओ कि
१. आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः । —बृहद० २ । ४ । ५ ।
२. आत्मेत्येवोपासीत । —बृहद्० ६ । ४ । ७ ।
३. एक रूपेण हि अवस्थितो योऽर्थः सह परमार्थः ।
—शांकर भाष्य २ । १ । २ ।
४. सर्वो ह्यात्मास्तित्वं प्रत्येति न नाहम् अस्मीति ।
—शांकर भाष्य १ । १ । १ ।
५. तस्माद् उपाधिधर्माध्यासे नैवात्मन कर्तृत्वम् न स्वाभाविकम् ॥
—शांकर भाष्य, २ । ३ । ४० ।
६. अन्त.करणविशिष्टो जीव अन्त.करणोपहिता साक्षी ।
—वेदान्त परिभाषा, पृ० १०२ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७१
तुममें और मुझमें क्या अन्तर है ? अर्थात् कोई अन्तर नही है), भगवान् से भवत और
भवत से भगवान् है । अद्वैत का यही खेल भक्त और भगवान् के बीच चल रहा है ।
तुम्हीं देवता हो, तुम्ही मंदिर हो और तुम्ही पुजारी हो—जल से ही लहरें और लहरों
से ही जल होता है, दोनों अभिन्न हैं—कहने-सुनने में दोनो भले ही अलग हों । 'हे
भगवान् ! तुम ही गाते हो, नाचते हो और वाद्य बजाते हो । नामदेव कहते हैं—हे
भगवान् ! तुम मेरे स्वामी हो । तुम्हारा भक्त अपूर्ण है, तुम पूर्ण हो ।'१
नामदेव के अनुसार सभी जीवों की उत्पत्ति ब्रह्म से होती है । वह सब जीवों
में समाया हुआ है । यह माया ही है जिसने सारे संसार को मोह लिया है । अन्यथा तुम
घट-घट वासी हो ।२ यहाँ पर नामदेव ने आत्मा का निरूपण बहुत कुछ गीता की शैली
पर किया है ।
अज्ञानी जीव को मोहिनी माया अपने पाश में अकड़ लेती है । ऐसे अज्ञानी
जीव को चेतावनी देते हुए नामदेव कहते हैं—'हे जड़ ! तू सचेत हो जा । तुझे यह
औघट घाट पार करना है ।'३
आत्म तत्त्व सारे संसार में व्याप्त है । उसी को लोग विश्वात्मा कहते है । आत्मा
और विश्वात्मा मूलतः एक ही है । यह माया है जो आत्मा को पंचतत्त्वमय शरीर से
आबद्ध कर के अपने वश में कर लेती है ।४ माया से आबद्ध आत्मा ही जीव के नाम
से प्रसिद्ध है ।
१. बदहु की न होइ माधऊ मोसिऊ ।
ठाकुर ते जनु जन ते ठाकुर खेलु परिउ है तोसिऊ ॥
जल ते तरंग तरंग ते है जल कहन सुनन कऊ दूजा ॥
—स० ना० हिं० प०, पद १६१ ।
२. जामै सकल जीव की उतपति । सकल जीव मै आप जी ॥
माया मोहु करि जगतु भुलाया । घटि घटि व्यापक बाप जी ॥
—स० ना० हिं० प०, पद ४८ ।
३. जागि रे जीव कहा भुलाना ।
आगे पीछे जाना ही जाना ॥ टेक ॥
भणत नामदेव चेति अयाना ।
ओघट घाट अरन दूरि पयाना ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १२२ ।
४. बीही बीही तरी सबल माया ।
आगे दूति अनेक भरमाया ॥ टेक ॥

१७२ नामदेव की हिन्दी कविता
जीव की एकता और अद्वैतता
हम माया के कारण आत्मा और ब्रह्म की अद्वैतता पहचान नही पाते । नामदेव
भी आत्मा और ब्रह्म में भेद नहीं मानते । वे कहते हैं—'हे परमात्मा ! तुम्हारा वियोग
मुझे असह्य है । तुम्हारे बिना मैं घडी भर भी नहीं रह सकता । यदि तुम गिरिवर हो
तो मैं मोर हूँ । यदि तुम चंद्रमा हो तो मैं चकोर हूँ । तुम तरुवर हो तो मैं पक्षी ।
तुम यदि सरोवर हो तो मैं उसमें रहने वाली मछली हूँ ।'१ इस प्रकार जीव और ब्रह्म
की एकता एव अद्वैतता को नामदेव ने स्पष्टतया घोषित किया है ।
'हे जीव ! तेरी गति तू जानता है । मैं उसका क्या वर्णन करूँ ? जैसे लवण
(नमक) पानी में द्रवित होने पर अलग नही किया जा सकता उसी प्रकार का मेरा
और मेरे स्वामी का संबंध है । सत्संग से मुझे उसकी प्राप्ति हुई । मैं प्रेमातिशय से
उसकी वंदना करता हूँ । २
माया
मायावाद की परंपरा—मायावाद भारतीय दर्शन में अपना विशिष्ट स्थान
रखता है । ऋग्वेद में उल्लेख है कि इन्द्र अपनी शक्ति से अनेक प्रकार के रूप धारण
कर लेता है ।३ वेदों में रूप बदलने की क्रिया को माया कहा गया है ।
उपनिषदों में नाम रूप के अर्थ में माया शब्द का प्रयोग हुआ है । कठोप
माया अंतर ब्रह्म न दीसै ।
ब्रह्म के अंतर माया नहीं दीसै ॥ १ ॥
— स० ना० हिं० प०, पद ३६ ।
१ तुम बिनु धरि येक, रहूँ नहिं न्यारा ।
सुन यहु केसव नियम हमारा ॥
जहाँ तुम गिरीवर तहाँ हम मोरा ।
जहाँ तुम चंदा तहाँ मैं चकोरा ॥ १ ॥
—स० ना० हिं० प०, पद १६१ ।
२ तेरी गति तू ही जाने । अल्प जीव गति कहा बपाने । टेक ।
जैसा तू कहिये तैसा तूं नाही । जैसा तू है तैसा आद्धि गुसाई ॥ १ ॥
लून नीर घे नाहिं न्यारा । ठाकुर साहिब प्राण हमारा ॥ २ ॥
साध की संगति संत सू भेटा । प्रणवत नामा राम सहेटा ॥ ३ ॥
—स० ना० हिं० प०, पद १४ ।
३. इन्द्रो मायाभि पुरुरूप ईयते । ऋग्वेद ६ । ४७ । १८ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७३
निषद् में लिखा है—‘आत्मा-स्वरूप परम पुरुष सब प्राणियों में रहता हुआ भी माया
के पर्दे में छिपा हुआ रहने के कारण सबको प्रत्यक्ष नहीं दीखता। केवल सूक्ष्म तत्वों
को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही सूक्ष्म तथा तीक्ष्ण बुद्धि से देखा जाता है।’¹
श्वेताश्वेतर उपनिषद् में माया का उपयुक्त वर्णन है जो इस प्रकार है—
‘माया तो प्रकृति को समझना चाहिए और महेश्वर को मायापति। उसी के अंगभूत
कारण-कार्य-समुदाय से यह संपूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है।² यहीं पर लिखा है कि—
संपूर्ण जगत् को माया का अधिपति परमेश्वर पंच महाभूतादि से रचता है तथा दूसरा
जीवात्मा उस प्रपंच में माया के द्वारा भली भाँति बँधा हुआ है।’³
इस प्रकार उपनिषदों में नामरूपात्मक जगत् को, अविद्या को, भ्रम को तथा
प्रकृति को माया कहा गया है।
गीता में माया को कृष्ण की शक्ति कहा गया है। गीता का कथन है—‘मेरी
यह गुणमयी और दिव्य माया दुस्तर है। इस माया को वे ही पार कर पाते हैं, जो
मेरी शरण में आते हैं।’⁴ और भी कहा है—‘माया ने जिनका ज्ञान नष्ट कर
दिया है ऐसे मूढ और दुष्कर्मी नराधम आसुरी बुद्धि में पड़कर मेरी शरण में नहीं
आते।’⁵
गीता में माया को अविद्या, भ्रम तथा प्रकृति रूप में कहा है।
शास्त्रीय ढंग से माया का विवेचन आचार्य शंकर ने किया। कालान्तर में माया-
वाद मध्यकालीन दार्शनिकों के लिए एक आवश्यक तत्त्व हो गया।
१. एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ कठोप. १ । ३ । १२ ।
२. मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥
श्वेताश्वतर उपनिषद् ४ । १० ।
३. अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ।
—श्वेताश्वतर उपनिषद् ४ । ९ ।
४. दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।
—गीता ७ । १४ ।
५. न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
—गीता ७ । १५ ।

१७४ नामदेव की हिन्दी कविता
माया का अर्थ है ईश्वर की विचित्रार्थ-सर्गंकरी (अद्भुत विषयों की सृष्टि
करने वाली) शक्ति ।'
द्वैताद्वैत, द्वैत तथा शुद्धाद्वैत आदि सभी दर्शनों ने मायावाद को स्वीकार किया
है। इसे ब्रह्म की शक्ति भी बताया गया है।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि मायावाद की परंपरा प्राचीन काल
में वेदों से प्रारंभ हुई और सभी भारतीय दार्शनिकों पर उसका प्रभाव पड़ा। विचारकों
ने अपने अपने विचारों के अनुकूल उसका वर्णन किया । माया, अविद्या, भ्रम, अज्ञान,
मिथ्या ज्ञान, नामरूपात्मक जगत् आदि शब्दों का प्रयोग माया के अर्थ में होता
रहता है ।
नामदेव का माया वर्णन
नामदेव ने भी अपनी रचनाओं में माया का वर्णन किया है । उनके अनुसार
माया ही जीव को ब्रह्म से विमुख करती है । कोई विरला ही व्यक्ति गुरु उपदेश द्वारा
माया के प्रभाव से बचकर ब्रह्म तक पहुँच सकता है ।
माया के दो रूप हैं—एक अविद्या माया तथा दूसरी विद्या माया । अविद्या
माया के वशीभूत होकर जीव संसार के मोहजाल में फँस जाता है । विद्या माया, सब
गुण जिसके वश में हैं और जो ईश्वर की प्रेरणा से संसार की रचना करती है, जीव
को संसार के मोहनाल से छुड़ा कर ब्रह्म की भक्ति की ओर ले जाती है ।
नामदेव कहते हैं—'हे विट्ठल ! तेरी माया बहुत ही प्रबल है । पहले ही से
वह भक्तों को भरमाती आई है । तथ्य यह है कि माया के प्रबल हो जाने पर ब्रह्म तथा
ब्रह्म के प्रबल हो जाने पर माया दृष्टिगोचर नहीं होती ।'२
'हे माधव ! यह माया तुम्हारी भक्ति में बाधक होती है । यह भक्तों को तुमसे
मिलने नहीं देती ।'३
'जीव का गर्भयोनि में आना ही माया है, यदि वह छूट सके तो दर्शन हो
१. भारतीय दर्शन : सतीशचंद्र चट्टोपाध्याय
—गीता, पृ० २७० ।
२. बीहौ बीहौ तेरी सबल माया । आगे इनि अनेक भरमाया ॥ टेक ॥
माया अंतर ब्रह्म न दीसै । ब्रह्म के अंतर माया नहीं दीसै ॥ १ ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ३६ ।
३. माधौ त्री माया मिलन न देई । जन जीवै तो करै सनेही ॥ टेक ॥
सं० ना० हिं० प०, पद १०६ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७५
सकते हैं। आगे चल कर कहते हैं कि अब माया मुझसे नहीं लिपटेगी, मैं इस संसार से
मुक्त हो जाऊँगा ।'१ भगवत्कृपा होने पर ही परब्रह्म परमेश्वर को जाना जा सकता है,
अन्यथा नहीं।
'इस संसार में उत्पन्न प्राणी माया-पाश के कारण अपने को भूल गये हैं। हे
भगवन् ! जिस व्यक्ति को तुम ज्ञान देते हो केवल वही तुमको जान पाता है।'२
'माया वस्तुतः जीव मात्र को मुग्ध कर लेती है। इससे उसका रहस्य जान
सकना कठिन है। इसी से माया अनिर्वचनीय कही जाती है।'३
'हे मन रूपी पंछी ! तू संसार रूपी जाल को स्पर्श न कर। माया दिन में तीन
फेरे लगाती है। काल तुझ पर झपट रहा है।'४
अभिमानी मनुष्य को चेतावनी देते हुए नामदेव कहते हैं—'यह संसार धोखे
की टट्टी है, मायाजाल है। धन, यौवन, पुत्र तथा स्त्री को तू अपना न समझ । ये बालू
के मंदिर के समान नष्ट हो जायेंगे।'५
जगत्
जड़ जगत् का भौतिक स्वरूप .—सभी प्रकार की प्रतीतियों का नाम जगत् या
संसार है। समस्त जगत् या इसके प्रत्येक विषय को एक-सा अन्त-तम सत्य या पार-
मार्थिक सत्य नहीं कह सकते। जगत् जब नामरूपात्मक हो लिया जाता है तब वह केवल
व्यावहारिक दृष्टि से सत्य है या यों कहें कि प्रातिभासिक सत्ता की अपेक्षा अधिक सत्य है
और पारमार्थिक सत्ता की अपेक्षा कम सत्य ।
१. इहु संसार ते तब ही छूटउ जउ माइया नह लपटावउ ।
माइआ नामु गरभ जोनि का तिह तजि दरसन पावउ ॥
—ग्रन्थ साहब, रागु धनासरी २ ।
२. सभ ते उपाई भरम भुलाई । जिस तू देहि तिहहि बुझाई ॥
—ग्रन्थ साहब, रागु आसा—१ ।
३. माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझै कोई ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५० ।
४. रे मन पंछीया न परसि पिंजरै । संसार माया जाल रे ।
येक दिन मे तीन फेरा । तोहि सदा झपै काल रे ॥ टेक ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ७५ ।
५. यहु ममिता अपनी जिनि जानौ । धन जोवन सुत दारा ।
बालू के मंदिर बिनसि जाँहिगे । झूठे करहु पसारा रे नर ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ६२ ।

१७६ नामदेव की हिन्दी कविता
व्यावहारिक ज्ञान के लिए जगत् वास्तविक है। मनुष्य जब इसी में उलझ जाता
है और माया में फँसकर पारमार्थिक सत्य को भूल जाता है तथा अपने नित्य मुक्त, शुद्ध-
बुद्ध स्वभाव को बिसार देता है, तब यह जगत् दुःखमय है, असत्य ही है।
अपरा विद्या की दृष्टि से जीव और जड़ पदार्थ अनेक दिखाई पड़ते हैं। इनके
बिना संसार का चलना कठिन है। यही व्यावहारिक ज्ञान है। व्यावहारिक ज्ञान अथवा
जगत् व्यवहार के लिए जगत् वास्तविक है किन्तु इसे पारमार्थिक सत्ता नहीं मान सकते।
पारमार्थिक सत्य तो ब्रह्म ही है। जगत् परिवर्तनशील तथा विनाशशील है, इसका क्षय
हो जाता है अतः यह अबाधित तत्त्व नहीं और इसलिए सत्य नहीं कहा जा सकता।
यह सत्य दिखाई पड़ता है क्योंकि अध्यारोप के सहारे इन्द्रियाँ उसमें अपने
विषयों का आरोप कर लेती हैं और यह अत्यन्त आकर्षक प्रतीत होने लगता है। यद्यपि
तात्त्विक दृष्टि से यह असत् है, मिथ्या है।
नाम रूपात्मक जगत् का अधिष्ठान मूल तत्त्व ब्रह्म है। उसकी पारमार्थिक सत्ता
है। वह सर्वत्र व्याप्त है। नाम रूपात्मक जगत् का उत्पत्ति, स्थिति तथा लय सब
अन्यतम सत्यन्मय है। वह स्वयं ही जगत् में अभिव्यक्त हो रहा है, उसके अतिरिक्त जगत्
का कोई अस्तित्व नहीं। अतः पारमार्थिक दृष्टि से जगत् मिथ्या है। व्यावहारिक दृष्टि
से जगत् की वास्तविक एवं व्यावहारिक सत्ता है।
ब्रह्म-स्वरूप विश्व का वर्णन नामदेव इस प्रकार करते हैं—'माधव रूपी माली
सयाना है। वह आप ही बगीचा है तथा आप ही माली है। वह आप ही पानी है और
आप ही पवन है। वह आप अपने से प्रेम करता है। वह स्वयं ही चन्द्र तथा सूरज है।
आप ही धरती तथा आकाश है। जिस सृष्टिकर्त्ता ने इस प्रकार सृष्टि की रचना की,
नामदेव उसका दास है।'¹
'तरंग, फेन और बुदबुदा जैसे जल से भिन्न नहीं हैं, वैसे ही यह प्रपंच (संसार)
ब्रह्म की लीला है और उससे अभिन्न है। इस संसार में जीव के रूप में ईश्वर के अति-
१. माधो माली एक सयाना। अंतरिगत रहै लुकानां ॥ टेक ॥
आपै बाड़ी आपै माली, फलौ फलौ कर जोड़े।
आपै पवन आप ही पाणी आपै बरिये मेहा।
आपै पुरिष, नारि पुनि आपै, आपै नेहु सनेहा ॥
आपै चन्द सूर पुनि आपै, आपै धरनि अकासा।
रचनहार बिधि ऐसी रची है, भणवै नामदेव दासा ॥
—सं० ना० हि० प०, पद ११०।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७७
रिक्त कोई अन्य विचरण नहो करता है ।'१
नामदेव अपने मन को चेतावनी देते हुए कहते है—'रे मन ! तू विषय रूपो
संसार सागर को कैसे पार कर सकेगा ? तू तो झूठी माया को देखकर ही अपने को भूल
गया ।'२
मराठी रचनाओं से उदाहरण
नामदेव कहते है—'यह संसार असार है, माया है, मृगजलबत् है। इसको प्राप्ति
के प्रयत्नों मे अंत में निराश ही होना पड़ेगा अतः परमात्मा की शरण में जाओ ।
निष्काम भाव से भक्ति करो तो तुम्हारा उद्धार होगा ।'३
संसार दुःख पूर्ण होते हुए भी नामदेव कही भी उसका त्याग करने के लिये नही
कहते । उनके अनुसार प्रत्येक भक्त को उत्पादक धम करना चाहिए । प्रत्येक मानव को
अपनी जीविका का काम करते समय हरि-भजन या नाम-स्मरण भी करते रहना
चाहिए । नामदेव ने जीवन पर्यंत अपना पेशेवर कार्य-कपड़े सीने का अर्थात् दर्जी का
काम किया ।४
भक्ति का मार्ग प्रवृत्ति मार्ग है । अत, नामदेव ने भक्ति को अधिक महत्त्व
दिया । उन्होने मुक्ति का निरादर किया और मुक्ति को मुक्ति से उच्चतर मूल्य माना ।
१. जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जल ते भिन्न न कोई ॥
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला विचरत आन न होई ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५० ।
२. कैसे मन तरहिगा रे संसार सागरु बिखै को बना ।
झूठो माइआ देखि के भूला रे मना ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५१ ।
३. मृगजल डोहो का उपससी वाया । बेगी लवलाह्या शरण रिघें ।
भजे तू विठ्ठला सर्वांभूती भावें । न लगति नावें आणिकाची ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १६८२ ।
४. का करौ जाती का करौ पांती । राजाराम सेऊँ दिन राती । टेक ।
मन मेरा गज जिभ्या मेरी काती । रामरमे काटौं जम की फासी ॥ १ ॥
अनंत नाम का सीऊँ बागा । जा सीजत जम का डर भागा ॥ २ ॥
सीवना सीऊँ हौंसीऊँ ईव सीऊँ । राम बिना हूँ कैसे जीऊँ ॥ ३ ॥
सुरति की सुई प्रेम का धागा । नामा का मन हरि सूँ लागा ॥ ४ ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १८ ।
१२

१७८ नामदेव की हिन्दी कविता
इसी से निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत निकलता है। भाव भक्ति को ही कर्म-दृष्टि से
निष्काम कर्मयोग कहा जाता है।
नामदेव का ऐहिक तत्व विचार
नामदेव का लौकिक जीवन विषयक दृष्टिकोण —व्यक्ति अपना ऐहिक जीवन
किस प्रकार व्यतीत करे इस विषय में नामदेव ने जो विचार व्यक्त किये हैं उन्हें एक
पारमार्थिक का प्रकट चिंतन समझना समीचीन होगा। भौतिक जीवन या केवल सुखोप-
भोग का पक्ष ही उसमें व्यक्त नहीं हुआ है। नामदेव का यह ऐहिक तत्त्व विचार अँधेरे
में टटोलने वाले साधकों के लिए मानो उनका लगाया ज्ञान दीप है। अतः नामदेव के
ऐहिक तत्त्व-चिंतन में अंतर्भूत उपदेशों का विशेष महत्त्व है।
जगत्, मानवी जीवन, नर देह तथा कुल की मर्यादा संबंधी प्रदर्शित विचारों से
उनका लौकिक जीवन विषयक दृष्टिकोण स्पष्ट होता है।
नामदेव कहते हैं—'जन्म जन्मांतर के बाद नर-देह मिला है। दुर्लभ मनुष्य जन्म
पाकर भी यदि तूने ईश-भक्ति नहीं की तो तुझे पुनः आवागोन के फेर में पड़ना होगा।
अतः सुखोपभोग के विषयों का त्याग कर आत्मा राम से लौ लगाओ। घर गृहस्थी को
संभालते हुए भी हम उसके प्रति आसक्त न हो और निरन्तर नाम-स्मरण करते रहे।'१
'टूटे फूटे बर्तन चुराये जाने की आशंका नहीं रहती। स्वप्न में हम जिस सुख
का, ऐश्वर्य का उपभोग लेते हैं जागृतावस्था में वह हमारे लिए अनुपयुक्त होता है।
उसी प्रकार भाग्य वश पारिवारिक सुख प्राप्त होता है। नामदेव कहते हैं कि यह संसार
नाशवान् है।'२
यह जगत् (संसार) मदारी के खेल अथवा इंद्रजाल के समान है।३
१. शेवटली पाली तेह्वां मनुष्य जन्म। चुक लिया धर्म फेरा पड़े ॥
एक जन्मी ओलखी करा आत्माराम। संसार सुख भोगूं नका ॥
संसारी असावे असोनि नसावे। कीर्तन करावे वेळोवेळा ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १६७७ ।
२. फुटल्या घड्याचे नाही नागवणे ।
संसार भोगणे तेणे न्याये ॥
—सकल संत गाथा, १६६२ ।
३. गारड्याचा खेळ दिसे क्षण भर।
तैसा हा संसार दिसे खरा ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १६५७ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७६
भवसागर को पार करना दुस्तर है । नामदेव कहते हैं कि संसार से मेरा जी
ऊब गया । काल (यम) मेरे समक्ष उपस्थित है और वह मुझे अपना ग्रास (निवाला)
बनाना चाहता है । १
ऐसे दुःखपूर्ण संसार से ऊबकर नामदेव कहते हैं कि 'हे विठ्ठल ! तूने मुझे भव-
सागर में ढकेल दिया । वे आर्त स्वर से विनय करते हैं कि जन्म-मृत्यु के बीज अज्ञान को
जड़ से नष्ट कर दे ।' २
अभेद भक्ति
ज्ञानेश्वर 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस उपनिषत्प्रणीत अद्वैत सिद्धात के पुरस्कर्ता थे ।
उनका विश्वास था कि अद्वैत की एकता का संदेश घर-घर पहुँचाने के लिए 'गीता' एक
उत्कृष्ट साधन है । इस प्रकार संत ज्ञानेश्वर के अनुसार भगवद गीता भागवत धर्म का
आद्य तथा प्रमुख अद्वैत प्रतिपादक ग्रन्थ है ।
पंढरपुर का भक्ति संप्रदाय भी अद्वैती है । अतः ज्ञानेश्वर के समान नामदेव भी
अद्वैती है । ज्ञानेश्वर के अनुसार अद्वैत में भक्ति है यह बात न तो सिद्ध करने की है
और न उसका वर्णन ही किया जा सकता है, यह स्वय केवल अपने अनुभव से संबंध
रखता है । अपने 'अमृतानुभव' में वे इसके लिए एक दृष्टांत भी देते हैं—'जैसे एक ही
चट्टान में गुफा, मंदिर, मूर्ति एवं भक्त के भी आकार खुदवाये जाते हैं वैसे ही हमें अभेद
भक्ति का व्यवहार भी समझ लेना चाहिये तथा विश्व एवं विश्वात्मक देव को अभिन्न
मानकर अभेद-भक्ति करनी चाहिए ।' ३
इस प्रकार महाराष्ट्र के संतो की वास्तविक साधना निर्गुण भक्ति ही प्रतीत
होती है और उनकी रचनाओं में जो कुछ उदाहरण सगुण भक्ति के मिलते हैं वे उसके
लिये किये गये प्रारंभिक प्रयोगों जैसे जान पडते है तथा केवल उसी दृष्टि से उनका
कोई महत्त्व भी हो सकता है ।
१. नामा म्हणे थोर उवगलो संसारा ।
काल वैरी पुढ़ारा ग्रासू पाहे ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १४२४ ।
२. नामा म्हणे नको पाहो माझी लाज ।
संसाराचे बीज मूल खुड़ी ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १६५६ ।
३. देव देऊल परिवारु । कीजे कोरूनि डोंगरु ।
तैसा भक्तीचा वेव्हारु । कां न व्हावा ?
—हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास (चतुर्थ भाग) में उद्धृत, पृ० ८ ।

१८० नामदेव की हिन्दी कविता
संत ज्ञानेश्वर के समकालीन एवं सहयोगी संत नामदेव अपनी विचारधारा के
अनुसार वस्तुत निर्गुंणोपासक थे किन्तु सगुणोपासना को भी उन्होंने अपनाया था ।
परमात्मा ही एक मात्र सब कुछ है वही सबके बाहर तथा भीतर सर्वत्र व्याप्त है और
उसी के प्रति एकातनिष्ठ होकर रहना चाहिये इसको वे अपना परमार्थ मानते थे ।
अद्वैत-परक भक्ति कल्पना
महाराष्ट्रीय संतों की यह विशेषता है कि ये द्वैतभाव को मानते न थे। वे
अद्वैत भाव की भक्ति में मग्न रहने वाले जीव थे । आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार
अद्वैत मत का प्रभाव सभी वैष्णव संप्रदायों में वारकरी संप्रदाय पर अधिक पड़ा है।१
अपने 'अमृतानुभव' में एक स्थल पर ज्ञानेश्वर ने अभेद-भक्ति का आदर्श प्रस्तुत
किया है :
'जिस प्रकार दीप और उसकी प्रभा एक दूसरे से भिन्न नहीं है उसी प्रकार मैं
और मेरे भक्त एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं। दीप की प्रभा उसका स्वरूप है उसी प्रकार
मेरे भक्त मेरे स्वरूप हैं । प्रभा का अधिष्ठान जैसे दीप है वैसे मैं भक्तों का अधिष्ठान
हूँ।' इन शब्दों में नामदेव ने अद्वय विचार हमारे सामने रखा है ।२
मूलत. सगुणोपासक नामदेव को अद्वैत की अनिर्वचनीय प्रतीति होने पर 'आप-
पर भाव' ( मैं-तू का भाव ) जाता रहा । अपनी इस अनुभूति का वर्णन नामदेव इस
प्रकार करते हैं—'यदि तू लिंग है तो मैं सालुंका हूँ। यदि तू तुलसी है तो मैं मंजिरी
हूँ। वास्तव में 'स्वयें दोन्ही' तू और मैं ( इष्ट देव और भक्त ) दोनों में तू ही है ।३
१. ईश्वराद्वयवाद की इस अपूर्व अद्वैतपरक भक्ति का ही प्रभाव कदाचित् उस वैष्णव
संप्रदाय पर भी किसी न किसी प्रकार पड़ा था जो पंढरपुर नामक स्थान के आस
पास विक्रम की १३ वीं शताब्दी में प्रचलित हुआ था जिसके प्रवर्तक ज्ञानेश्वर
माने जाते हैं और जो आज तक 'वारकरी संप्रदाय' के नाम से प्रसिद्ध है ।
—उत्तरी भारत की संत परंपरा, पृ० ८८ ।
२. मी तो भक्त रूप भक्त माझे स्वरूप ।
प्रभा आणि दीप जया परी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ६१६।
३. तू अवकाश मी भूमिका । तू लिंग मी साळुंका ॥
तू समुद्र मी द्वारका । स्वयें दोन्ही ॥ १ ॥
तू वृंदावन मी चिरी । तूं तुलसी मी मंजिरी ।
तूं पावा मी मोहरी । स्वयें दोन्ही ॥ २ ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १५२६।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८१
महाराष्ट्रीय संतों को अद्वैत बोध की श्रेष्ठता, उपयुक्तता कितनी ही क्यों न
प्रतीत हुई हो तथापि उनके मन की अशांतता नाम रूपात्मक ईश्वर की भक्ति ही से दूर
हुई है। विट्ठल भक्त नामदेव तो सगुणोपासकों के अग्रणी थे। उनके मराठी गाथा के
आधे से अधिक अभंग सगुण भक्ति-परक हैं। नामदेव को अपने गुरु विसोबा खेचर से
अद्वैत बोध होने पर 'सर्व नारायण हरो दिसे' की प्रतीति क्षण क्षण को होने लगी।
इस अनुभूति के बल पर वे 'अद्वैतनिष्ठ भक्ति योग' का सांगोपांग आविष्कार अपने
अभंगों में कर सके।
नामदेव ने अपने अभंग में कहा है कि 'भक्ति के बहाने निर्गुण ने विट्ठल के
रूप में सगुण रूप धारण कर लिया। विट्ठल का यह रूप 'नामरूपातीत' है। यह ब्रह्म
ज्ञानरूप है, सगुण तथा निर्गुण दोनों से परे है। उसका वर्णन करते हुए वेद मौन हो
जाते हैं, जो श्रुतियों के लिए भी दुर्बोध है, पुराणों से भी इसका वर्णन नहीं हो सकता।'¹
विसोबा खेचर ने नामदेव को निर्गुण की अनुभूति दिलाकर निर्गुण परब्रह्म ही
के विश्व रूप में सगुण होने का 'अन्वयात्मक' ज्ञान दिया। उन्होंने नामदेव से कहा—
'अन्वयात्मक विचार से तू ऐसे स्थान पर मेरे पैर रख जहाँ परमात्मा नहीं है।'²
यह अन्वयात्मक ज्ञान होने पर नामदेव को अनुभूति हुई कि 'कोई स्थान पर-
मात्मा से रिक्त नहीं है। वह सारे संसार में समाया हुआ है।'³
नामदेव एक ही परमात्मा के सगुण स्वरूप का यह अन्वयात्मक विचार निर्गुण
के अद्वैत का व्यतिरेकात्मक वर्णन कर, प्रस्तुत करते हैं। यह विश्व निर्गुण ब्रह्म का
सगुण रूप है। इसका अर्थ यह उससे भिन्न है, विश्व नाम का उससे भिन्न अस्तित्व
रखने वाला कोई पदार्थ है ऐसा नहीं। यह भासमान विश्व उसकी माया है।
१. निर्गुणीचे वैभव आले भक्ति मिषे । तें हें विठ्ठल वेषे ठसावले ।
चोविसा वेगळे सहस्रा आगळे । निर्गुणा निराळे शुद्ध बुद्ध ।
वेदा पडे मोन श्रुतीतो कानडे । वर्णिता कुवाडे पुराणासी ।
भावाचे आलुक भुजले भक्ति सुखें । दिधले पुंडलीके साचूनिया ।
नामा म्हणे आम्हा अनाथा लागुनि । निडारले नयनी वाट पाहे ।
—सकल संत गाथा, अभंग ३२१ ।
२. जेथे देव नसे तेथे माझे पाय । ठेवी पा 'अन्वय' विचारोनी ।
३. नामा पाहे अवघा जिकडे तिकडे देव ।
कोठे रिता ठाव न दिसेचि ॥
श्रीनामदेव गाथा, अभंग १३४६ ।
( महाराष्ट्र शासन प्रकाशन )

१६२ नामदेव की हिन्दी कविता
निर्गुण सगुण की एकता
निर्गुण सगुण की एकता नामदेव सुवर्ण तथा सुवर्ण से बनी अशरफी के दृष्टांत
द्वारा प्रमाणित करते हैं—'जो सगुण तथा निर्गुण दोनो से परे है, जिसका कोई आकार
नही, वही साकार होकर उपलब्ध हुआ । जल से जैसे बर्फ बनती है उसी प्रकार निरा-
कार पाडुरंग (ब्रह्म) साकार हुआ । जिस प्रकार सुवर्ण तथा उससे बनी अशरफी अभिन्न
होते हैं उसी प्रकार निर्गुण तथा सगुण एक ही ब्रह्म के दो रूप है । पाडुरंग ही संसार
है, संसार ही पाडुरङ्ग है ।'१
आकार के कारण मूल वस्तु से भिन्न कोई अन्य वस्तु निर्मित हुई है ऐसा भास
होता है । वह दूर करने के लिए नामदेव विवर्तवाद का दृष्टांत देते हुए कहते हैं—'एक
ही तत्व एकाकार रूप से सारे संसार में व्याप्त है । वही सारे संसार का संचालन करता
है । इस एकमेव ब्रह्म की प्रतीति हम प्राप्त करें । उससे भिन्न भासमान होने वाला विश्व
मायिक है अतः मिथ्या है ।'२ यहाँ ज्ञानेश्वर के चिद्विलासवाद का प्रभाव स्पष्ट रूप
से दिखाई देता है ।
वेदो का भी यही निष्कर्ष है कि द्वैत तथा अद्वैत से परे सर्वत्र अन्य निरपेक्ष
एकमेव ब्रह्म है—
(१) एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ।
(२) सर्वं खल्विदं ब्रह्म ।
(३) नेह नानास्ति किंचन ।
नामदेव ने अद्वैत सम्बन्धी इन वैदिक सिद्धान्तों का ही उद्घाटन किया है ।
अपने अभिमत अद्वैत सिद्धांत को मृगजल के दृष्टांत द्वारा पुष्ट करते हुए नामदेव
१. निर्गुण सगुण नाही ज्या आकार । होऊनी साकार तोचि ठेला ।
जली जलगार दिसे जैसा परी । तैसा निराकारी साकार हा ॥
सुवर्ण ची घन, घन ची सुवर्ण । निर्गुणी सगुण यथापरी ॥
पाडुरंगी अंगे सर्व झाले जग । निववी सर्वांग नामा म्हणे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३३० ।
२. एक तत्व एकाकार सर्व देशी । एक तो देखेसी सकल जनीं ।
ऐसे ब्रह्म पहा आहे सर्व एक । न लगे विवेक करतों कांहीं ।
मिथ्या हे डंबर माया मथितार्थ । हरि हाचि स्वार्थं वेगी करी ।
नामा म्हणे समर्थ बोलिला तो वेद । नाही भेदाभेद ब्रह्मरूपी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३३२ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८३
कहते हैं—'ब्रह्म में ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। चिन्मय परमात्मा से भिन्न
भासमान होने वाला विश्व मायिक है। मृगजल का जैसे वास्तव में अस्तित्व नहीं होता
उसी प्रकार जड़ विश्व का भी वास्तव में अस्तित्व नहीं है। यहाँ सच्चा अद्वैत की बात
श्रवण करो और उसी आत्म स्वरूप में तल्लीन हो जाओ।'
ज्ञानेश्वर ने 'ज्ञानेश्वरी' में अपने जिस अद्वैत सिद्धांत का सविस्तार प्रतिपादन
किया उसको नामदेव ने संक्षेप में केवल तीन अभंगों में समझाया है। मानो वेदान्त का
सार (निचोड़) ही उन्होंने संक्षेप में परस्पर पूरक दृष्टांतों द्वारा प्रस्तुत किया है।
कुछ विद्वानों की यह धारणा कि नामदेव केवल सगुण भक्त थे, दर्शन से उनका
दूर का भी वास्ता नहीं था, वे ज्ञानी नहीं थे, समीचीन नहीं जान पड़ती। डॉ० पेंडसे
ऐसे विद्वानों की धारणा का खण्डन करते हुए कहते हैं—
'अपनी इस धारणा के अनुसार पांगारकर, रानडे, आजगावकर और विनोबा
भावे द्वारा संकलित नामदेव के अभंगों में, जिनमें उनके दार्शनिक विचार व्यक्त हुए हैं,
ऐसे अभंग नहीं हैं। इसी प्रकार विट्ठल को निर्गुण परब्रह्म के सगुण प्रतीक के रूप में
वर्णन करने वाले अभंगों को उन्होंने प्रधानता नहीं दी। ज्ञानदेव केवल योगी और
ज्ञानी थे तथा नामदेव केवल सगुण भक्त थे। ज्ञान और भक्ति का इन दोनों में जो
बटवारा किया गया है वह भी ठीक नहीं जान पड़ता। निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव तथा
नामदेव को निर्गुणानुभूति हुई थी। तीनों ज्ञानी भक्त थे। अन्तर इतना ही था कि
ज्ञानेश्वर का यदि ज्ञान मार्ग पर अधिक विश्वास था तो नामदेव का सर्वजन सुलभ
सगुण भक्ति पर। ज्ञानेश्वर की अपील यदि बुद्धि को थी तो नामदेव की भावना को।
इसीलिए एक ज्ञान राज (ज्ञानियों का राजा) हुआ तो दूसरा भक्त-राज अथवा भक्त
शिरोमणि।'
महाराष्ट्रीय संतों ने ज्ञान और भक्ति का अलग-अलग बटवारा नहीं किया जैसा
कि उत्तरी भारत की संत परंपरा में परिलक्षित होता है।
ब्रह्म चाहे निर्गुण हो अथवा सगुण नाम स्मरण के लिए उसे नाम के बंधन में
बंधना ही पड़ता है। नामदेव कहते हैं—'निर्गुण निराकार ब्रह्म जब सगुण रूप धारण
करता है तब उसको नाम और रूप के बंधन में फँसना पड़ता है। अतः उन्होंने 'नाम
वेद' की स्थापना की।'२
१. ज्ञानदेव आणि नामदेवः डॉ० शं० दा० पेंडसे—पृ० ३०१।
२. नाम तेंचि रूप , रूप तेंचि नाम । नामरूपा भिन्न नाही नाही ॥१॥
आकारला देव नामरूपा आला । म्हणोनी स्थापिला नामवेदी ।२।
—सकल संत गाथा अभङ्ग ६६०।

१८४ नामदेव की हिन्दी कविता
भक्तो में ज्ञानी भक्त श्रेष्ठ होता है। नामदेव भक्त शिरोमणि हुए। यदि वे
केवल आर्त भक्त होते तो उनको यह उपाधि न मिलती। विट्ठल के सगुण रूप को भक्ति
करते हुए, उसके मूल निर्गुण स्वरूप से उनका मन यत्किंचित भी विचलित नहीं हुआ।
पंढरपुर में पांडुरंग की मूर्ति की यह विशेषता है कि वह परात्पर निर्गुण परब्रह्म की
प्रतीक है, किसी एक साम्प्रदायिक देवता की नहीं।
अपनी एक मराठी रचना में नामदेव कहते हैं—'निर्गुण ब्रह्म विट्ठल के रूप में
सगुण रूप में व्यक्त हुआ। यह निर्गुण ब्रह्म संध्या वन्दनादि करते समय जो चौबीस
नाम लिए जाते हैं उनसे भिन्न है। 'विष्णुसहस्रनाम' में जिन सहस्र नामों का उल्लेख
आता है उससे अनोखा है, निराला है। इसका वर्णन करते हुए वेद मौन हो जाते हैं।
यह श्रुतियों के लिए भी अगम्य है पुराणों के लिए भी अवर्णनीय है। यह ब्रह्म भक्ति के
वश में है। यह भाव-भक्ति का भूखा है। भक्तवर पुण्डलीक ने यह परब्रह्म विट्ठल की
मूर्ति के रूप में हमारे लिए उपलब्ध कर दिया। यह विट्ठल मूर्ति अनिमेष नेत्रों से हमारी
ओर देख रही है।'१
यह निर्गुण ब्रह्म ही ज्ञानियों का 'ज्ञेय' है।२
ज्ञानोत्तर भक्ति
'ज्ञानी सबके आत्म स्वरूप निर्गुण परब्रह्म का साक्षात्कार होने पर भी भावुकता-
पूर्ण अंतःकरण से तथा निष्काम बुद्धि से ईश्वर के सगुण रूप की भक्ति करते हैं।'३
नामदेव ने आमरण यह ज्ञानोत्तर भक्ति का तथा उसका प्रचार भी किया।
उनके दीक्षा गुरु विसोबा खेचर ने उनको यही उपदेश दिया था। वे कहते हैं—'पंढर-
१ निर्गुणीचे वैष्णव आलें भक्ति मिषें । ते हे विट्ठल वेषें ठसावले ॥
चोविसा वेगळे सहस्रा आगळे । निर्गुणा निराळे शुद्ध बुद्ध ॥
वेदां पडे मौन श्रुतीसी पानडे । वर्णिता कुंठाडे पुराणांसी ॥
भावाचें आसुक भुललें भक्ति सुखें । दिधलें पुंडलीके साधूनिया ॥
नामा म्हणे आम्हां अनाथा लागुनि । निहारले नयनी वाट पाहे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३२१ ।
२. ज्ञानियांचे ज्ञेय ध्यानियांचे ध्येय । पुण्डलीकाचे प्रिय सुख वस्तु ॥
ते हे समचरण उभें विटेवरी । पहा भीमातीरी विट्ठल रूप ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३२४ ।
३. ज्ञानिनस्त्वात्मभूतं मां साक्षात्कृत्यापि निर्गुणम् ।
निर्निमित्तं भजन्त्येव सगुणं द्रुत चेतस ॥

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८५
पुर ही मेरा तीर्थस्थान है क्योंकि यहाँ अदृश्य, अव्यक्त निर्गुण परब्रह्म का निधान
विट्ठल के रूप में सदैव सामने रहता है। पहले भी महान् भक्तों ने यह निधान प्राप्त
किया था। खेचरजी ने नामदेव को निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति कराई ।१ निर्गुण की
अनुभूति होने पर विसोबा खेचर ने नामदेव से सगुण रूप विट्ठल की भक्ति करने के लिए
कहा । इसका कारण यही है कि विट्ठल परब्रह्म के प्रतीक हैं।
परमार्थ ज्ञान की प्राप्ति के कारण मुक्ति तो उनको मिल ही गई थी परन्तु
'ज्ञानादेवतु कैवल्यम् ।' अर्थात् केवल ज्ञान के कारण प्राप्त होने वाली (केवल परब्रह्म
रूप होकर रहने की) कैवल्य मुक्ति नामदेव नहीं चाहते थे। मुक्ति प्राप्त होने पर भी
वे भक्ति-सरिता में अवगाहन करना चाहते थे।
नामदेव ने मुक्ति-सहित भक्ति के निम्नलिखित लक्षण बताये हैं-
(१) परमात्मा के निर्गुण तथा सगुण दोनों रूपों के प्रति समान आकर्षण ।
(२) वृत्ति-सहित मन से चिदाकाश में डुबकी लगाना ।
(३) देह की सुध-बुध भूल जाना ।
(४) ब्रह्मानन्द सहोदर आनन्द की इस अवस्था में कीर्तन करते हुए भावावेश
में आकर गाना तथा नाचना ।२
नामदेव ने अपने अनेक अभंगों में परमात्मा के निर्गुण-परक ज्ञान से मुक्ति का
तथा उसी के सगुण-स्वरूप की भक्ति का वरदान माँगा है-'अन्तःकरण में तेरा त्रिगुण,
निराकार तथा अव्यक्त रूप और बाहर तेरा सगुण, साकार, व्यक्त रूप देखकर मेरा
मन उन्मन हुआ। सन्तों की कृपा से तेरी अंतर्बाह्य व्यापकता मुझे प्रतीत हुई और मुझ
में परिवर्तन हुआ। नामदेव याचना करते हैं कि हे परमात्मा ! तुझमें और मुझमें
१. माझे तीर्थ क्षेत्र पंढरी पे जाण । उघडे निधान दृष्टीपुढे ।
मागे थोर थोरी हेचि पै साधिले । नामयासि दिधले खेचर याने ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १८०७ ।
२. आम्हां वैष्णवांचा कुलधर्म कुळीचा । विश्वास नामाचा सर्व भावें ॥
तरी त्याचे दास म्हणतां लाघिजे । निर्वासना कीजे चित्त आधी ॥
गाऊँ नाचूँ आम्ही आनंदे कीर्तनीं । भक्ति मुक्ति दोन्ही मागूँ देवा ॥
वृत्ति-सहित मन बुडे प्रेम डोही । नाठवती देही देहभाव ॥
सगुणो निर्गुणो एकच आवडी । मनें दिली बुडी चिदाकाशी ॥
नामा म्हणे देवा ऐसी मज सेवा । द्यावी जी केशवा जन्मोजन्मी ॥
—सन्त वचनामृत; रा० द० रानडे, पृ० १०४ ।

१८६ नामदेव की हिन्दी कविता
स्वामी-सेवक भाव हो।१'
नामदेव कहते हैं—'मैंने मोक्ष की कथा सुनी है। उससे मुझे भय लगता है।
मैं केवल मोक्ष, समाधि अथवा स्वर्ग सुख नही चाहता। हे पांडुरंग। अभयदान देकर
मुझे अपने प्रेम की निशानी दो।
'मैं उस मुक्ति को लेकर क्या करूँ जिससे तेरा वियोग हो। वासना-रहित मन
से तेरा स्मरण किया तो तू मुझे सायुज्य मुक्ति देगा। फिर हे वैकुठनायक ! भक्ति का
आनंद मुझे कैसे प्राप्त होगा ?'२
'हे परमात्मा ! पंचेंद्रियों के विषयों के कारण चित्त में जो खलबली मचती है
उसको शांत कर अपने प्रेम-रस के लिए मेरे मन में रुचि निर्माण कर।३
'हे विट्ठल ! तुम कहोगे कि नामदेव इस भक्ति सुख के प्रेम को लेकर क्या बैठे
हो ? 'तत्वमसि' इस महावाक्य के अनुसार तुझे अनुभूति होगी कि तू शुद्ध बुद्ध चैतन्य
है, तू सर्वगत है, सर्वव्यापी है। इस अद्वैत अवस्था में क्रिया, कर्म, कर्ता, भक्त, भजन,
पूजिता, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, ध्याता, ध्यान, ध्येय आदि जो भेद-मूलक त्रिपुटियाँ हैं, वे
मिथ्या हैं। तेरे लिए ये साधन अनावश्यक हैं। नामदेव कहते हैं—हे पांडुरंग। मैं
केवल्य मुक्ति नही चाहता। वर दे कि जन्म-जन्मांतर में मैं तेरी सेवा करूँ। अपनी
१. बाहेरी भीतरी तुजचि मी देखे। चित तेणे सुखे बेहावले।
सन्त संगे मज पालट हा झाला। पाहता विट्ठला रूप तुझे।
मी-पणा सहित आनन्दी बुडाले। न निघो काही केले चित माझे।
नामा म्हणे एक उरली से वासना। स्वामी सेवकपणा देई देवा॥
—सकल सन्त गाथा, अभंग १६६८।
२. ऐके मोक्षाची मी कथा। तेणे भय वाटे चित्ता।
नामा म्हणे अभयदान। देऊनि सांगे प्रेम खूण॥
—अभंग १७२०।
३. मुक्ति पद भो गा नभिलाषी न चित्ती।
भणी अंतरती पाय तुझे ॥
—अभंग १७३७।
४. इंद्रियाचे व्यापार अवघेचि तोडी।
प्रेम रस गोडी देई मातें ॥
—अभंग १७२१।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८७
भक्ति का मुझे वर दे।"
सगुणोपासक नामदेव में एक महान् परिवर्तन हुआ। अद्वैत का यह उपदेश कि
ईश्वर तथा भक्त, पूज्य तथा पूजिता, गुरु तथा शिष्य सब तू ही है, नामदेव ने ग्रहण
किया। तदनंतर की अद्वैतानुभूति का वर्णन वे इस प्रकार करते हैं—'मैं अब उस
अवस्था को पहुँच गया हूँ कि जहाँ पहुँचकर मैं ही अपनी भक्ति का आलंबन पंढरीनाथ
हुआ हूँ। मैं ही अपना भक्त हो गया हूँ। बंध और मोक्ष केवल माया-जन्य कल्पनाएँ
हैं। विट्ठलराय की कृपा से मुझे इस सत्य का साक्षात्कार हुआ। अब मे हरि का दास
हो गया हूँ।'२
'हरि का दास होना' का अभिप्राय है अपना व्यक्तित्व हरि के व्यक्तित्व में
विलीन कर देना। इस अवस्था में ईश्वर और भक्त का द्वैत नहीं रहता। यही ज्ञानोत्तर
भक्ति है।
भक्तों में ज्ञानी भक्त सर्वश्रेष्ठ होता है। वह अपने व्यक्तित्व के साथ अपना
सर्वस्व परमात्मा को समर्पण करने के कारण ईश्वर-रूप हो जाता है। उससे भिन्न नहीं
रहता। भक्ति की यह चरम सीमा है। एकरूपता का यह आनन्द अनुभूति से सम्बन्ध
रखता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
नामदेव कहते हैं—केशव के अर्थात् भगवंत के हृदय में अपने भक्तों के लिए
कितना प्रेम है यह नामदेव ही जानते हैं। उसी प्रकार नामदेव के अंतःकरण में
भगवद्विषयक कितना प्रेम है यह केशवराय (पांडुरंग) जानते हैं। नामदेव ही केशव हैं
१. घेऊनिया नाम्या बैससील किती । पहाशील स्थिति अंतरीची ॥
काहीच न होशी विचारी मानसी । चैतन्य तत्त्वमसि शुद्ध बुद्ध ॥
क्रिया कर्म कर्ता नव्हेसी सर्वथा । आहे सर्वगता रूप तुझे ॥
भजता भजन पूजिताशी पूज्य । हेही काय तुज अति विंथा ॥
ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय, ध्याता ध्यान ध्येय । साधिले उपाय नाही तुज ॥
नामा म्हणे मज नकलेचि देवा । मज देई सेवा जन्मोजन्मो ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १७६८ ।
२. मोच माझा देव मोच माझा भक्त । मी माझा कृतार्थ सहज असे ॥
बंध आणि मोक्ष मायेची कल्पना । पडली होती मना कैसी भ्रांती ॥
विठ्ठले विचारे दाखविले सुख । होतें जें असंख्य हारपलें ॥
नामा म्हणे सोय सापडली निकी । झालो एकाएकी हरिचा दास ।
—सकल संत गाथा, अभंग १७६५ ।