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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 332 में से

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पृष्ठ 163

१६८ नामदेव की हिन्दी कविता
भी देखो वही दिखाई देता है। माया के विचित्र चित्रों से संसार मुग्ध है, कोई विरला
ही उसे जान पाता है।¹
इधर भगवान है, उधर भगवान है, भगवान के बिना संसार में कुछ भी नही है।
नामदेव कहते हैं—'हे भगवन्। पृथ्वी के जल थल आदि सभी स्थानो में तुम
व्याप्त हो।''²
'हे वैकुंठनाथ तेरी लीला अगाध है। मैं जिधर जाता हूँ उधर तुझे ही देखता
हूँ। जल में, थल में, काष्ट में, पाषाण में तू ही है। आगम, निगम, वेद, पुराण तेरा ही
गुणगान करते हैं।'³
प्रत्येक जीव के हृदय में भगवान है। हाथी और चोटी एक ही मिट्टी के बने
हैं। ये सब उसी भगवान के अंश मात्र हैं। जड़-जंगम आदि सभी में ब्रह्म समान रूप से
व्यापक है।⁴
'जब न माँ थी, न पिता था, न कर्म था, न काया थी, न हम थे, न तुम थे।
तब इस चराचर की सृष्टि कैसे हो गई ? नामदेव ने स्पष्ट कहा है कि वह परमतत्त्व ही
ब्रह्म है जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई ।''⁵
'हे परमात्मा ! तुम्हारी भक्ति मुझसे नहीं होती। सकल जीवो की उत्पत्ति
१. एक अनेक विआपक पूरन जत देखउ तत सोई ।
माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझे कोई ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५० ।
२. ईभै बीठलु ऊभै बीठलु, बीठल बिनु संसारु नही ।
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिउ तूं सरब मही ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ३ ।
३. तू अगाध वैकुंठनाथा तेरे परनो मेरा भाषा ।
सरबे भूता नामा पेखूं । जत्र जाऊँ तत्र तूं ही देखूं ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १२ ।
४. एवल माटी कुंजर चोटी भाजन रे बहु नाना ।
थावर जंगम कीट पतंगा सब घटिराम समाना ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ६ ।
५. माइ न होती बापु न होता करमु न होती काइआ ।
नामा प्रणवै परम ततु है सतिपुरु होइ सखाइआ ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २०६ ।