सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 171

१७६ नामदेव की हिन्दी कविता
व्यावहारिक ज्ञान के लिए जगत् वास्तविक है। मनुष्य जब इसी में उलझ जाता
है और माया में फँसकर पारमार्थिक सत्य को भूल जाता है तथा अपने नित्य मुक्त, शुद्ध-
बुद्ध स्वभाव को बिसार देता है, तब यह जगत् दुःखमय है, असत्य ही है।
अपरा विद्या की दृष्टि से जीव और जड़ पदार्थ अनेक दिखाई पड़ते हैं। इनके
बिना संसार का चलना कठिन है। यही व्यावहारिक ज्ञान है। व्यावहारिक ज्ञान अथवा
जगत् व्यवहार के लिए जगत् वास्तविक है किन्तु इसे पारमार्थिक सत्ता नहीं मान सकते।
पारमार्थिक सत्य तो ब्रह्म ही है। जगत् परिवर्तनशील तथा विनाशशील है, इसका क्षय
हो जाता है अतः यह अबाधित तत्त्व नहीं और इसलिए सत्य नहीं कहा जा सकता।
यह सत्य दिखाई पड़ता है क्योंकि अध्यारोप के सहारे इन्द्रियाँ उसमें अपने
विषयों का आरोप कर लेती हैं और यह अत्यन्त आकर्षक प्रतीत होने लगता है। यद्यपि
तात्त्विक दृष्टि से यह असत् है, मिथ्या है।
नाम रूपात्मक जगत् का अधिष्ठान मूल तत्त्व ब्रह्म है। उसकी पारमार्थिक सत्ता
है। वह सर्वत्र व्याप्त है। नाम रूपात्मक जगत् का उत्पत्ति, स्थिति तथा लय सब
अन्यतम सत्यन्मय है। वह स्वयं ही जगत् में अभिव्यक्त हो रहा है, उसके अतिरिक्त जगत्
का कोई अस्तित्व नहीं। अतः पारमार्थिक दृष्टि से जगत् मिथ्या है। व्यावहारिक दृष्टि
से जगत् की वास्तविक एवं व्यावहारिक सत्ता है।
ब्रह्म-स्वरूप विश्व का वर्णन नामदेव इस प्रकार करते हैं—'माधव रूपी माली
सयाना है। वह आप ही बगीचा है तथा आप ही माली है। वह आप ही पानी है और
आप ही पवन है। वह आप अपने से प्रेम करता है। वह स्वयं ही चन्द्र तथा सूरज है।
आप ही धरती तथा आकाश है। जिस सृष्टिकर्त्ता ने इस प्रकार सृष्टि की रचना की,
नामदेव उसका दास है।'¹
'तरंग, फेन और बुदबुदा जैसे जल से भिन्न नहीं हैं, वैसे ही यह प्रपंच (संसार)
ब्रह्म की लीला है और उससे अभिन्न है। इस संसार में जीव के रूप में ईश्वर के अति-
१. माधो माली एक सयाना। अंतरिगत रहै लुकानां ॥ टेक ॥
आपै बाड़ी आपै माली, फलौ फलौ कर जोड़े।
आपै पवन आप ही पाणी आपै बरिये मेहा।
आपै पुरिष, नारि पुनि आपै, आपै नेहु सनेहा ॥
आपै चन्द सूर पुनि आपै, आपै धरनि अकासा।
रचनहार बिधि ऐसी रची है, भणवै नामदेव दासा ॥
—सं० ना० हि० प०, पद ११०।