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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 332 में से

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पृष्ठ 176

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८१
महाराष्ट्रीय संतों को अद्वैत बोध की श्रेष्ठता, उपयुक्तता कितनी ही क्यों न
प्रतीत हुई हो तथापि उनके मन की अशांतता नाम रूपात्मक ईश्वर की भक्ति ही से दूर
हुई है। विट्ठल भक्त नामदेव तो सगुणोपासकों के अग्रणी थे। उनके मराठी गाथा के
आधे से अधिक अभंग सगुण भक्ति-परक हैं। नामदेव को अपने गुरु विसोबा खेचर से
अद्वैत बोध होने पर 'सर्व नारायण हरो दिसे' की प्रतीति क्षण क्षण को होने लगी।
इस अनुभूति के बल पर वे 'अद्वैतनिष्ठ भक्ति योग' का सांगोपांग आविष्कार अपने
अभंगों में कर सके।
नामदेव ने अपने अभंग में कहा है कि 'भक्ति के बहाने निर्गुण ने विट्ठल के
रूप में सगुण रूप धारण कर लिया। विट्ठल का यह रूप 'नामरूपातीत' है। यह ब्रह्म
ज्ञानरूप है, सगुण तथा निर्गुण दोनों से परे है। उसका वर्णन करते हुए वेद मौन हो
जाते हैं, जो श्रुतियों के लिए भी दुर्बोध है, पुराणों से भी इसका वर्णन नहीं हो सकता।'¹
विसोबा खेचर ने नामदेव को निर्गुण की अनुभूति दिलाकर निर्गुण परब्रह्म ही
के विश्व रूप में सगुण होने का 'अन्वयात्मक' ज्ञान दिया। उन्होंने नामदेव से कहा—
'अन्वयात्मक विचार से तू ऐसे स्थान पर मेरे पैर रख जहाँ परमात्मा नहीं है।'²
यह अन्वयात्मक ज्ञान होने पर नामदेव को अनुभूति हुई कि 'कोई स्थान पर-
मात्मा से रिक्त नहीं है। वह सारे संसार में समाया हुआ है।'³
नामदेव एक ही परमात्मा के सगुण स्वरूप का यह अन्वयात्मक विचार निर्गुण
के अद्वैत का व्यतिरेकात्मक वर्णन कर, प्रस्तुत करते हैं। यह विश्व निर्गुण ब्रह्म का
सगुण रूप है। इसका अर्थ यह उससे भिन्न है, विश्व नाम का उससे भिन्न अस्तित्व
रखने वाला कोई पदार्थ है ऐसा नहीं। यह भासमान विश्व उसकी माया है।
१. निर्गुणीचे वैभव आले भक्ति मिषे । तें हें विठ्ठल वेषे ठसावले ।
चोविसा वेगळे सहस्रा आगळे । निर्गुणा निराळे शुद्ध बुद्ध ।
वेदा पडे मोन श्रुतीतो कानडे । वर्णिता कुवाडे पुराणासी ।
भावाचे आलुक भुजले भक्ति सुखें । दिधले पुंडलीके साचूनिया ।
नामा म्हणे आम्हा अनाथा लागुनि । निडारले नयनी वाट पाहे ।
—सकल संत गाथा, अभंग ३२१ ।
२. जेथे देव नसे तेथे माझे पाय । ठेवी पा 'अन्वय' विचारोनी ।
३. नामा पाहे अवघा जिकडे तिकडे देव ।
कोठे रिता ठाव न दिसेचि ॥
श्रीनामदेव गाथा, अभंग १३४६ ।
( महाराष्ट्र शासन प्रकाशन )