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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 332 में से

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पृष्ठ 179

१८४ नामदेव की हिन्दी कविता
भक्तो में ज्ञानी भक्त श्रेष्ठ होता है। नामदेव भक्त शिरोमणि हुए। यदि वे
केवल आर्त भक्त होते तो उनको यह उपाधि न मिलती। विट्ठल के सगुण रूप को भक्ति
करते हुए, उसके मूल निर्गुण स्वरूप से उनका मन यत्किंचित भी विचलित नहीं हुआ।
पंढरपुर में पांडुरंग की मूर्ति की यह विशेषता है कि वह परात्पर निर्गुण परब्रह्म की
प्रतीक है, किसी एक साम्प्रदायिक देवता की नहीं।
अपनी एक मराठी रचना में नामदेव कहते हैं—'निर्गुण ब्रह्म विट्ठल के रूप में
सगुण रूप में व्यक्त हुआ। यह निर्गुण ब्रह्म संध्या वन्दनादि करते समय जो चौबीस
नाम लिए जाते हैं उनसे भिन्न है। 'विष्णुसहस्रनाम' में जिन सहस्र नामों का उल्लेख
आता है उससे अनोखा है, निराला है। इसका वर्णन करते हुए वेद मौन हो जाते हैं।
यह श्रुतियों के लिए भी अगम्य है पुराणों के लिए भी अवर्णनीय है। यह ब्रह्म भक्ति के
वश में है। यह भाव-भक्ति का भूखा है। भक्तवर पुण्डलीक ने यह परब्रह्म विट्ठल की
मूर्ति के रूप में हमारे लिए उपलब्ध कर दिया। यह विट्ठल मूर्ति अनिमेष नेत्रों से हमारी
ओर देख रही है।'१
यह निर्गुण ब्रह्म ही ज्ञानियों का 'ज्ञेय' है।२
ज्ञानोत्तर भक्ति
'ज्ञानी सबके आत्म स्वरूप निर्गुण परब्रह्म का साक्षात्कार होने पर भी भावुकता-
पूर्ण अंतःकरण से तथा निष्काम बुद्धि से ईश्वर के सगुण रूप की भक्ति करते हैं।'३
नामदेव ने आमरण यह ज्ञानोत्तर भक्ति का तथा उसका प्रचार भी किया।
उनके दीक्षा गुरु विसोबा खेचर ने उनको यही उपदेश दिया था। वे कहते हैं—'पंढर-
१ निर्गुणीचे वैष्णव आलें भक्ति मिषें । ते हे विट्ठल वेषें ठसावले ॥
चोविसा वेगळे सहस्रा आगळे । निर्गुणा निराळे शुद्ध बुद्ध ॥
वेदां पडे मौन श्रुतीसी पानडे । वर्णिता कुंठाडे पुराणांसी ॥
भावाचें आसुक भुललें भक्ति सुखें । दिधलें पुंडलीके साधूनिया ॥
नामा म्हणे आम्हां अनाथा लागुनि । निहारले नयनी वाट पाहे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३२१ ।
२. ज्ञानियांचे ज्ञेय ध्यानियांचे ध्येय । पुण्डलीकाचे प्रिय सुख वस्तु ॥
ते हे समचरण उभें विटेवरी । पहा भीमातीरी विट्ठल रूप ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३२४ ।
३. ज्ञानिनस्त्वात्मभूतं मां साक्षात्कृत्यापि निर्गुणम् ।
निर्निमित्तं भजन्त्येव सगुणं द्रुत चेतस ॥