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सर्वकोश
सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 332 में से

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पृष्ठ 182

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८७
भक्ति का मुझे वर दे।"
सगुणोपासक नामदेव में एक महान् परिवर्तन हुआ। अद्वैत का यह उपदेश कि
ईश्वर तथा भक्त, पूज्य तथा पूजिता, गुरु तथा शिष्य सब तू ही है, नामदेव ने ग्रहण
किया। तदनंतर की अद्वैतानुभूति का वर्णन वे इस प्रकार करते हैं—'मैं अब उस
अवस्था को पहुँच गया हूँ कि जहाँ पहुँचकर मैं ही अपनी भक्ति का आलंबन पंढरीनाथ
हुआ हूँ। मैं ही अपना भक्त हो गया हूँ। बंध और मोक्ष केवल माया-जन्य कल्पनाएँ
हैं। विट्ठलराय की कृपा से मुझे इस सत्य का साक्षात्कार हुआ। अब मे हरि का दास
हो गया हूँ।'२
'हरि का दास होना' का अभिप्राय है अपना व्यक्तित्व हरि के व्यक्तित्व में
विलीन कर देना। इस अवस्था में ईश्वर और भक्त का द्वैत नहीं रहता। यही ज्ञानोत्तर
भक्ति है।
भक्तों में ज्ञानी भक्त सर्वश्रेष्ठ होता है। वह अपने व्यक्तित्व के साथ अपना
सर्वस्व परमात्मा को समर्पण करने के कारण ईश्वर-रूप हो जाता है। उससे भिन्न नहीं
रहता। भक्ति की यह चरम सीमा है। एकरूपता का यह आनन्द अनुभूति से सम्बन्ध
रखता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।
नामदेव कहते हैं—केशव के अर्थात् भगवंत के हृदय में अपने भक्तों के लिए
कितना प्रेम है यह नामदेव ही जानते हैं। उसी प्रकार नामदेव के अंतःकरण में
भगवद्विषयक कितना प्रेम है यह केशवराय (पांडुरंग) जानते हैं। नामदेव ही केशव हैं
१. घेऊनिया नाम्या बैससील किती । पहाशील स्थिति अंतरीची ॥
काहीच न होशी विचारी मानसी । चैतन्य तत्त्वमसि शुद्ध बुद्ध ॥
क्रिया कर्म कर्ता नव्हेसी सर्वथा । आहे सर्वगता रूप तुझे ॥
भजता भजन पूजिताशी पूज्य । हेही काय तुज अति विंथा ॥
ज्ञाता ज्ञान ज्ञेय, ध्याता ध्यान ध्येय । साधिले उपाय नाही तुज ॥
नामा म्हणे मज नकलेचि देवा । मज देई सेवा जन्मोजन्मो ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १७६८ ।
२. मोच माझा देव मोच माझा भक्त । मी माझा कृतार्थ सहज असे ॥
बंध आणि मोक्ष मायेची कल्पना । पडली होती मना कैसी भ्रांती ॥
विठ्ठले विचारे दाखविले सुख । होतें जें असंख्य हारपलें ॥
नामा म्हणे सोय सापडली निकी । झालो एकाएकी हरिचा दास ।
—सकल संत गाथा, अभंग १७६५ ।