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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४७
एक ऐसो आश्चर्यजनक घटना घटी कि जिसका वर्णन नही किया जा सकता ।
चोटी की आँखो में गजेन्द्र समा गया । कोई कहता है कि वह (परमात्मा) पास ही है
तो कोई कहता है कि दूर । पानी में रहने वाली मछली खजूर के पेड़ पर चढ सकती
है ? कोई कहता है कि वह इंद्रियों के अधीन है तो कोई कहता है कि यह मुक्त है ।
मूर्ख को वह सहज समाधि द्वारा प्राप्त नही हो सकता । कोई वेद पुराणा का स्मरण
करने के लिए कहता है । सद्गुरु ने निर्वाण पद का वर्णन किया । नामदेव कहते है कि
जिस परम तत्त्व की रूपरेखा नहीं है उसका वर्णन मै कैसे कर सकता हूँ ?'१
'पंडितो इस पद का अर्थ बताओ । मै जब सात वर्ष का था तब मेरी माता पाँच
वर्ष की थी । अगम्य तथा अलक्ष्य का विचार कर देखो । खरगोश ने कुत्ते को छिराया ।
जल की मछली आकाश पर चढ़ गई । गाय बाघ का पीछा कर रही है । बूंद मे
समुद्र नाचता है और बूंद समुद्र में समा गई । नामदेव का एकमात्र सहारा तू ही है ।
तू अलक्ष्य है । मुझे देखा नही जा सकता ।'२
'आहिस्ता आहिस्ता भोजन कैमे किया जाय, यह कहा नही जा सकता । हम
खायें और निर्मल होवें । पहले मै अपनी माता को ही खा गया । तत्पश्चात् सगे जामात
को खा गया । सूर्य को निगल गया तब चंद्र को उगल दिया । फिर मैं श्वशुर को खा
जाऊँगा । तत्पश्चात् पंच लोक निगल जाऊँगा । नामदेव कहते हैं कि यह सिद्धो का
योग है ।'३
१. अदबुद अचंभा कथ्या न जाई । चोटी के नेत्र कैसे गजिंद्र समाई ।
कोई बोले नेरे कोई बोले दूरि । जल की मछली कैसे चढ़ै पजूरि ॥ १ ॥
कोई बोले इंद्री बाध्या कोई बोले मुक्ता । सहजि समाधिन चीन्हे मुगधा । २ ।
कोई बोले वेद सुमृत पुराना । सतगुरु कथीया पद निरवाना ॥ ३ ॥
कहै नामदेव परम तत है ऐसा है । जाके रूष न रेख वरण कहो कैसा ॥४॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७६ ।
२. पांडे एह अरथि लगाई ।
सात वरस को मांहि हो । तब पाँच वरस की माई ॥ टेक ॥
अगम अलेप विचारि देषौ । ससु स्वान छिपाई ।
मीन जलको गगन चढीयी । बाघ पेदे गाई ॥ १ ॥
समंद भीतरि बूँद जावै । बूँद समंद समाई ।
नामदेव के एक सोई । अलप लख्यो न जाई ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १०४ ।
३. धोरे धीरे पाइबो कचन न जेवो । आपन पैबो तब नूमल ह्वै बो ॥
पहली पेह्रौं आई माई । पीछे पेह्रौं सगा जंवाई । १ ॥

!

Line 30:
"सटबयो आछे सांगीला। ताद्यै मोक्ष न मुक्ती ॥ ४ ॥"
Wait, let's look at each word in line 30:
Word 1: 'सटबयो' or 'सटवयो'? स + ट + ब/व + य + ो. It looks like 'सटबयो' or 'सटवयो'.
Word 2: 'आछे' (आ + छ + े).
Word 3: 'सांगीला' (स + ा + ं + ग + ी + ल + ा) or 'सांगिला'? There is a matra 'ी' on 'ग': 'सांगीला'।
Word 4: 'ताद्यै' or 'ताथै' or 'ताद्यै'?
Look at the prose: "उसको मोक्ष अथवा मुक्ति नहीं।"
"ताथै" or "ताद्यै"?
Look at line 32: "ताथै जनमि जनमि भटकाये".
In line 30, the word is: त + ा + ध + ् + य + ै ? Or त + ा + थ + ै ?
Wait, look at line 30, fourth word:
It has: त, ा, then a letter with a tail/loop like 'द्य' or 'थ'? In line 32, "ताथै": त, ा, थ, ै.
In line 30, it

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १४६
यदि इस उलटबांसी की इन दो पंक्तियों पर थोड़ा सा ध्यान दिया जाय तो
पता चलेगा कि कबीर जिस 'घड़े' की ओर संकेत कर रहे हैं वह किसी ऐसी वस्तु का
प्रतीक है जो नष्ट कर देने पर ही समुचित उपयोग में लायी जा सकती है। वह वस्तु
(नर-देह) मानव-जीवन से भिन्न नहीं है जिसमें आमूल परिवर्तन लाने पर ही जीवन्मुक्त
की सहज दशा उपलब्ध हो पाती है।
'कबीर ग्रन्थावली' के अंतर्गत उलटबासी का एक अन्य पद इस प्रकार आता
है : 'हे अवधू ! जागते समय नीद मे नही आना चाहिए। ऐसा करना चाहिए जिसमें
न तो हम काल का ग्रास बनें, न हमारा शरीर जरा के कारण जीर्ण हो सके। इसके
लिए चाहिए कि गंगा उलट कर समुद्र को सोख ले, चंद्रमा सूर्य को निगल जाय, रोगी
नव ग्रहों को मार डाले और जल में बिंब प्रकाशित हो उठे। डाल के पकड़ने से मूल
नही दीख पड़ता और मूल के पकड़ने पर फल की प्राप्ति हो जाती है। बाँबी उलटकर
सर्प को लग जाती है और पृथ्वी महारस का पान करती है। गुफा में बैठे रहने पर
सारा संसार दीखने लगता है, बाहर कुछ भी नही सूझ पड़ता। मनुष्य उलटकर बाण
चलाने वाले को ही मार डालता है और यह आश्चर्य विरला ही बूझ पाता है औंधा
घड़ा जल में नही डूबता, सीधा रहने पर पूरा-पूरा भर जाता है और जिसके प्रति
जगत् घृणा प्रदर्शित करता है उसी के प्रसाद से निस्तार होता है।'
एक और उलटबासी को अर्थ-सहित देखिये—
'ऐ भाई ! एक अचंभा देखो। सिंह खड़ा गाय को चरा रहा है। पहले पुत्र
हुआ और तत्पश्चात् माता हुई। गुरु शिष्य के पांव पकड़ रहा है। जल में रहने वाली
मछली पेड़ पर जाकर जनती है। मुर्गे ने बिल्ली को पकड़ कर खा लिया। बैल तो
खड़ा ही रहा और गोनी गृह में प्रवेश कर गई। बिल्ली कुत्ते को दबोच ले गई। पेड़
१. अवधू जागत नीद न कीजै।
काल न खाइ कल्प नही व्यापै देही जरा न छीजै ॥ टेक ॥
उलटी गंग समुंद्र हि सोखै ससिहर सूर गरासै।
नव ग्रिह मारि रोगिया बैठै, जल मे ब्यंब प्रकासै ॥
डाल गह्या थै मूल न सूझै, मूल गह्या फल पावा।
बंबई उलटि सरप कौ लागी, धरणि महा रस खावा।
बैठि गुफा मे सब जग देख्या, बाहरि कछु न सूझै।
उलटै धन कि पारथी मान्यौ, यहु अचिरज कोई बूझै।
औंधा घड़ा न जलमै डुबै, सूधा सूभर भरिया।
जाकौ यहु जग धिणा करि चालै, ता प्रसादि निस्तरिया।
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ १४१-१४२।

१५० नामदेव की हिन्दी कविता
की जड़ को ऊपर रख और डाली, पत्ती आदि को नीचे कर दे। इस जड़ में फूल खिले
हैं। इस पद को जो समझ जाये, वह त्रिलोक को समझ सकता है।' १
इस पद का आध्यात्मिक पक्ष में उत्तर होगा—
ज्ञान द्वारा वाणी समृद्ध होती है। प्रथम जीव उत्पन्न हुआ और पश्चात् माया
प्रकट हुई। शब्द जीवात्मा की शरण में जाता है। कुण्डलिनी जागृत होकर मेरुदण्ड पर
चढ़कर फलवती होती है। कायाने अज्ञानी (सुग्गा या कुत्ता) को नष्ट कर दिया। पंच
प्राण तो घरे ही रह गये, स्वरूप की सिद्धि घर में बस गई। मूल तो मस्तिष्क में है
जिसमें कमल खिले हैं और शाखा आदि नीचे हैं। ऐसा शरीर में वृक्ष का बोध कर, तब
तीनों लोकों का ज्ञान प्राप्त होगा।
कबीर साहब कहते हैं कि हठयोगियों का ज्योति के दर्शन आदि का उपर्युक्त
ढंग से परिचय दे देना तथा इसी पर संतुष्ट होकर अपने को अमरत्व का अधिकारी तक
समझबैठना उनमें किसी कमी का होना सूचित करता है। आत्मोपलब्धि की सबसे
बड़ी विशेषता यह है कि उसमें सफल हो जाने वाले व्यक्ति में अपनी अनुभूति को
अभिव्यक्ति के लिए क्षमता नहीं रहती।
इस प्रकार हम देखते हैं कि नामदेव के पश्चात् हिंदी निर्गुण काव्य की जो
प्रवृत्तियाँ हैं वे नामदेव की हिंदी रचनाओं में मिलती हैं। नामदेव की रचनाओं में इन
प्रवृत्तियों और तत्संबंधित विषयों पर संक्षेप में कहा गया है। नामदेवोत्तर कालीन संतों
ने इन पर विस्तारपूर्वक कहा है।
☐ ☐
१. एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढा सिंघ चरावै गाई ।। टेक ।।
पहले पूत पीछे भई माइ, चेला कै गुर लगे पाई ।
जल की मछली तरवर ब्याई, पड़ि बिलाई मुरगे खाई ।
बैलहि डारि गूँनि घरि आई, कुत्ता कूं ले गई बिलाई ॥
तलि करि साखा ऊपरि करि मूल, बहुत भांति जड़ लागे फूल ।
कहै कबीर या पद कौं बूझै ताकूं तीन्यूं त्रिभुवन सूझै ॥
—कबीर ग्रंथावली, पद ११, पृष्ठ ६२।

चतुर्थ अध्याय
नामदेव की दार्शनिक विचारधारा
भारतीय दर्शन—आत्मा की श्रेष्ठता
आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न दार्शनिक सिद्धांत
विदेशी दार्शनिक सिद्धांतों का प्रभाव
संत कवियों पर अन्य विचार-धाराओं का प्रभाव
नामदेव पर अन्य दर्शन एवं विचार-धाराओं का प्रभाव
वैष्णव मत का प्रमुख उपादान—भक्ति तत्त्व
भगवान का लोकरक्षक एवं लोकरंजक स्वरूप
महाराष्ट्रीय वारकरी सम्प्रदाय
वारकरी सम्प्रदाय का उदय
वारकरी मत के सिद्धांत
(१) विट्ठल (२) भक्ति तथा अद्वैत ज्ञान (३) भगवत् रूप
वारकरी पंथ के सिद्धांत की विशेषता
नामदेव की रचनाओं में प्राप्त उनके दार्शनिक विचार
१. (अ) ब्रह्म (ब) ब्रह्म परंपरा (क) नामदेव का ब्रह्म वर्णन
२. जीवात्मा (आत्म दर्शन)—आत्म परंपरा—
(अ) जीव सम्बन्धी नामदेव के विचार
(ब) जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध
(स) जीव की एकता और अद्वैतता
३. माया-माया की परंपरा
नामदेव का माया वर्णन
४. जगत्—जड़ जगत् का भौतिक स्वरूप
नामदेव का ऐहिक तत्त्व विचार
नामदेव का लौकिक जीवन विषयक दृष्टिकोण
अभेद भक्ति—अद्वैतपरक भक्ति कल्पना—
निर्गुण-सगुण की एकता—ज्ञानोत्तर भक्ति
सर्वं खलु इदं ब्रह्म—वात्सल्य भक्ति—
भक्ति और साधना सम्बन्धी व्यावहारिक विचार

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा
भारतीय दर्शन
इस संसार में आकर जीवन संग्राम में अपने को विजयी बनाना प्रत्येक मनुष्य
का कर्तव्य है। अन्य जीवित प्राणियों के समान मनुष्य भी अपने को जीवित बनाये
रखने के लिए अपने परिवेश से निरंतर संघर्ष करता रहता है। परन्तु वह विवेक-प्रधान
जीव होने के कारण प्रत्येक अनुष्ठान के अवसर पर अपनी विचार शक्ति का उपयोग
करता है। शांत चित्त से विचार करने पर प्रतीत होगा कि प्रत्येक मानव दृश्य या
अदृश्य जगत् विषयक कतिपय श्रद्धाओं, विचारों तथा कल्पनाओं का एक समुदाय मात्र
है। निखिल मानवीय कार्य विधानों की आधारशिला मानवीय विचार है। गीता कहती
है कि श्रद्धाओं के अनुरूप ही मनुष्य होता है।१ उसकी कार्य प्रणाली निश्चित होती है
तथा उसी के अनुरूप उसे फल की उपलब्धि होती है। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य की
एक दृष्टि होती है, उसका एक दर्शन होता है।
सृष्टि विभिन्न रूपा होकर भी एक है। अंग्रेजी में इसका नाम ही युनिव्हर्स
(Universe) है जिसे हिंदी में एकात्म काव्य कहा जा सकता है। वेद तो इसे देव का
काव्य कहता है। काव्य की संगीतात्मक, भावात्मक एवं कल्पनात्मक एकता उसके जनक
चेतन तत्त्व की एकरूपता को प्रकट करती है। इसी प्रकार सृष्टि का काव्यत्व
(Harmony) उसके एक स्रष्टा होने का संकेत देता है जो चेतन है।२ ब्रह्म विद्या में
इन सभी बातों पर विचार किया जाता है।
अध्यात्म विद्या भारतीय मनीषियों की प्रतिष्ठा की वस्तु रही है। सभी ज्ञान
तथा विषयों में इसे सर्वोत्कृष्ट कहा जाता रहा है। कठोपनिषद् में इस विद्या के संबंध में
लिखा है—
'ब्रह्म विद्या बहुतों को तो सुनने को भी नहो मिलती और बहुत से इसे सुनकर
समझ ही नहो पाते। इस गूढ़ अध्यात्म विद्या का वर्णन करनेवाला भी कठिनाई से
१. यो यच्छ्रद्धः स एव सः । गीता १७।३
२. भक्ति का विकास, डॉ० मुंशीराम शर्मा, पृ० ११ ।

१५४ नामदेव की हिन्दी कविता -
मिलता है और इसे जानने की इच्छा रखने वाला तो विरला ही होता है ।१
ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए की गयी जिज्ञासा- ब्रह्म जिज्ञासा कही जाती है,
इसी लिए वेदान्त ब्रह्म सूत्र का आरंभ 'अथा तो ब्रह्म जिज्ञासा' से किया गया है।
ब्रह्म विद्या अथवा ब्रह्म ज्ञान हर किसी को उपलब्ध नहीं होता। मुण्डकोप-
निषद में कहा है—
'परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही प्राप्त
हो सकता है। यह जिसको स्वीकार कर लेता है उसके लिए ही अपने यथार्थ स्वरूप
को प्रकट कर देता है।२
मुण्डकोपनिषद ने ब्रह्म विद्या को सर्व विद्या प्रतिष्ठा बतलाया है।३ भगवान्
श्रीकृष्ण ने गीता में अपनी व्यापक विभूतियों के वर्णन के अवसर पर समस्त विद्याओं में
अध्यात्म विद्या (दर्शन शास्त्र) को अपना स्वरूप बतलाकर उसकी महत्ता पूर्णरूपेण
प्रदर्शित की है।४
संक्षेप में जीव, जगत्, और परमात्मा का स्वरूप तथा उनके पारस्परिक संबंध
निश्चित करना दर्शनशास्त्र का उद्दिष्ट है। इस प्रकार दर्शनशास्त्र अंतिम सत्य
(Ultimate reality) के उद्घाटन का प्रयत्न करता है। पर इस अंतिम सत्य के
स्वरूप के संबंध में सभी दार्शनिक सहमत नहीं है।
भारतवर्ष में दर्शन तथा धर्म का, तत्त्वज्ञान तथा भारतीय जीवन का घनिष्ठ
संबंध है। ताप त्रय—आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक—से संतप्त मानव
की शांति के लिए, क्लेशमय संसार से आत्यंतिक दुःख निवृत्ति के लिए भारत में दर्शन
शास्त्र का आविर्भाव हुआ है। दर्शन शास्त्र के द्वारा सुचिंतित आध्यात्मिक तथ्यों पर ही
भारतीय धर्म की दृढ़ प्रतिष्ठा है।
१ श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥
—कठोपनिषद् १।२।२।
२ नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥
—मुण्डकोपनिषद् ३।२।३ ।
३ स ब्रह्म विद्यां सर्व विद्या प्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठ पुत्राय प्राह ।
—मुण्डकोपनिषद् १।१।
४ अध्यात्म विद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ।
—गीता १०।३२

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५५
इस भारतीय दर्शन की धारा सुदूर वैदिक काल से अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित
होती चली आ रही है। इस धारा में कभी भी विराम नही आया। लगातार ब्रह्म,
जीव और माया के संबंध में विचार होता चला आ रहा है। सभी दर्शनों ने लगभग
यही निष्कर्ष दिया है कि ब्रह्म कोई अलभ्य तथा अलौकिक और अद्भुत पदार्थ नहीं है
प्रत्युत प्रत्येक प्राणी अपने भीतर नियामक (अंतर्यामी) आत्मा के रूप में उसी की
सत्ता का अनुभव किया करता है। इसी लिए ब्रह्म का साक्षात्कार करने तथा उसे
पहचानने का सबसे बड़ा उपाय है आत्मा को पहचानना और उसका साक्षात्कार
करना।
आत्मा की श्रेष्ठता
जगत् के समस्त प्रिय पदार्थों में श्रेष्ठ पदार्थ आत्मा ही है। प्रियतम होने के
कारण ही पुत्रवत्सला, करुणामयी माता की भाँति श्रुति उपदेश देती है कि आत्म तत्व
का साक्षात्कार करो।१ मुक्ति की कल्पना में पर्याप्त मतभेद होने पर भी विभिन्न
दार्शनिक इस विषय में नितांत एकमत है। आत्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना ही
मोक्ष है।२
आत्मा का ज्ञान कराना, चाहे वह ब्रह्म से भिन्न हो या अभिन्न हो प्रत्येक दर्शन
का लक्ष्य है। इस संदर्भ में दार्शनिक-शिरोमणि याज्ञवल्क्य ने अपनी पत्नी मैत्रेयी को
जो आध्यात्मिक उपदेश दिया वह भारतीय धर्म तथा दर्शन के इतिहास में सदा अमर
रहेगा। उन्होंने कहा 'पति के लिए पति प्यारा नही है बल्कि आत्मा के लिये। पत्नी
के लिए पत्नी प्यारी नही है, बल्कि आत्मा के लिए। पुत्र के लिए पुत्र प्यारा नही है
बल्कि आत्मा के लिए। संसार की समस्त वस्तुएँ अपने लिये प्यारी नही होती बल्कि
आत्मा के लिए। अतः सबसे प्रिय वस्तु आत्मा ही है। इस लिए इस आत्मा का प्रत्यक्ष
करना चाहिए, श्रवण करना चाहिए, मनन करना चाहिए तथा निदिध्यासन (सतत्
ध्यान करना) चाहिए। क्योकि आत्मा के दर्शन से, श्रवण से, मनन से तथा विज्ञान
से सब कुछ जाना जा सकता है।’३
१. आत्मा वा अरे दृष्टव्यः ।
—बृहदारण्यकोपनिषद् ५।१।१५।
२. आत्मन. स्वरूपेणावस्थितिः मोक्षः ।
३. न वा अरे पत्यु. कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।
न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।
न वा अरे पुत्राणा कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया
भवन्ति ।

१५६ नामदेव की हिन्दी कविता
आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न दार्शनिक सिद्धांत
भारतवर्ष आदि काल से ही एक धर्म प्रधान देश रहा है। यहाँ के ऋषियों ने
समय समय पर धर्म तथा दर्शन की विस्तृत विवेचना की है। मध्ययुग के पूर्व भी यहाँ
अनेक आचार्यों द्वारा प्रतिपादित विभिन्न दार्शनिक सिद्धांत प्रचलित थे। इनमें प्रमुख
शंकराचार्य का अद्वैतवाद तथा मायावाद था। उन्होंने जैनों, बौद्धों तथा मंडन मिश्र
आदि कर्मकांडियों से शास्त्रार्थ करके अपने अद्वैतवाद का प्रतिपादन किया। उनके
अनुसार सब कुछ ब्रह्म है। यह संसार असत्य है, भ्रम है। १ जिस प्रकार हम अँधेरे में,
रस्सी को देखकर साँप की कल्पना कर भयभीत होते हैं उसी प्रकार इस संसार को,
असत्य जान ममता, मोह के बंधन में पड़कर हम दुःख भोगते हैं। उनके अनुसार जीव
और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं। जीव ब्रह्म का ही रूप है जो माया के कारण ब्रह्म से,
भिन्न प्रतीत होता है। इस प्रकार शंकराचार्य 'अहं ब्रह्मास्मि' के सिद्धांत को माननेवाले,
थे। उन्होंने बौद्ध दर्शन के स्थान पर अपने दार्शनिक सिद्धांतों को रखा जो अब तक
किसी न किसी रूप में चले आ रहे हैं।
वैष्णव आचार्यों की परम्परा में सर्वप्रथम नाम नाथमुनि का आता है। नाथ
मुनि का आविर्भाव नवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध अथवा दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ काल
में हुआ। कहा जाता है कि सर्वप्रथम उन्होंने ही आठवार भक्तों के पदों का संकलन
किया। उनकी परम्परा में पुण्डरीकाक्ष एवं राम मिश्र नामक दो अन्य आचार्य हुए।
तत्पश्चात् यामुनाचार्य तथा प्रसिद्ध स्वामी रामानुजाचार्य इस सम्प्रदाय के आचार्य हुए।
रामानुजाचार्य के पश्चात् भी थी सम्प्रदाय की परम्परा आगे चलती रही। इनकी चौथी
या पांचवी शिष्य परम्परा में सुप्रसिद्ध स्वामी रामानंद हुए। २
शंकराचार्य ने जिस अद्वैतवाद का निरूपण किया था वह भक्ति के सन्निवेश के
लिए उपयुक्त न था। अतः स्वामी रामानुजाचार्य ने एक अन्य मत विशिष्टाद्वैत की
स्थापना की। जिसके अनुसार जीव (चित्) और जगत् (अचित्) ब्रह्म के ही
विक्षेप हैं। माया उसी ब्रह्म की शक्ति है। जीव भक्ति द्वारा ब्रह्म का चिरंतन सामीप्य
प्राप्त कर लेता है जो उसका परम लक्ष्य है। जैसा कि अद्वैतवाद में माना जाता है,
जीव अपने अस्तित्व को ब्रह्म में खो नहीं देता।
न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति ।
आत्मा वा रे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयि ।
आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं विदितम् ।
—बृहदारण्यकोपनिषद् २।४।५ ।
१ ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः ।
२ हिन्दी साहित्य की भूमिका डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, पृ० ४७ ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५७
आचार्य रामानुज के महान् व्यक्तित्व के कारण वैष्णव सम्प्रदाय की लोक-
प्रियता बहुत बढ़ी। उन्होंने शंकराचार्य के मायावाद का खण्डन किया तथा यह सिद्ध
किया कि ब्रह्म की एकता अद्वितीय नहीं है अपितु वह चिन्मय आत्मा तथा जड़ प्रकृति
से विशिष्ट है। १
अन्य वैष्णव आचार्यों का लक्ष्य भी शंकराचार्य के मायावाद तथा विवर्तवाद से
पीछा छुड़ाना था जिसके अनुसार भक्ति अविद्या ठहरती है। शंकराचार्य ने केवल निरू-
पाधि निर्गुण ब्रह्म की ही पारमार्थिक सत्ता स्वीकार की है। वल्लभाचार्य ने ब्रह्म में
सर्व धर्म माने हैं। सारी सृष्टि को उन्होंने लीला के लिए ब्रह्म की आत्मकृति कहा है।
अक्षर ब्रह्म अपनी आविर्भाव तथा तिरोभाव की अचिन्त्य शक्ति से जगत् के रूप
में परिणत होता है और उससे परे भी रहता है। ब्रह्म सत्, चित्, तथा आनन्द से युक्त
है। जीव में आनन्द का तथा जड़ में चित् तथा आनन्द दोनों का तिरोभाव रहता है।
माया कोई वस्तु नहीं। श्रीकृष्ण ही परब्रह्म हैं जो पुरुषोत्तम कहलाते हैं। वे अपने
भक्तों के लिये 'व्यापी वैकुण्ठ' में (जो विष्णु के वैकुण्ठ से ऊपर है) अनेक प्रकार की
क्रीड़ाएँ करते रहते हैं। भगवान् की इस 'नित्य लीला सृष्टि' में प्रवेश करना ही जीव
की सबसे उत्तम गति है। शंकर ने निर्गुण को ही ब्रह्म का पारमार्थिक रूप कहा था
और सगुण को व्यावहारिक या मायिक। किन्तु वल्लभाचार्य ने बात उलटकर सगुण
रूप को ही असली पारमार्थिक रूप बताया और निर्गुण को उसका अंशतः तिरोहित
रूप कहा।
प्रायः सभी वैष्णव आचार्यों ने (मध्व, निम्बार्क, रामानुज, विष्णु स्वामी)
वेदान्त सूत्रों के प्रतिपादित अद्वैतवाद को लेकर चलते हुए मूल सिद्धान्तों में कुछ छोटे-
मोटे परिवर्तन भी किये हैं। फलस्वरूप अलग-अलग सिद्धान्तों की स्थापना हुई। वास्तव
में सभी ने सिद्धान्त की दृष्टि से अद्वैतवाद को माना है किन्तु साथ ही साथ व्यवहार
की दृष्टि से द्वैतद्वैतवाद का भी सहारा लिया है।
विदेशी दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रभाव
वैष्णव आचार्यों के दार्शनिक सिद्धान्तो के अतिरिक्त तत्कालीन मुसलमान
सभ्यता के कारण विदेशी दार्शनिक सिद्धान्तो का भी प्रचार हुआ। मध्ययुग में हिन्दू
और बौद्ध धर्म के बाद इस्लाम धर्म की ही मान्यता और प्रतिष्ठा थी। शासक वर्ग का
धर्म होने के कारण उसका प्रसार व प्रचार और भी अधिक बढ़ा। शासक वर्ग का धर्म
शासित वर्ग को किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित करता है। यद्यपि सन्त लोग

१. भारतीय दर्शन : डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ४६५।

१५८ नामदेव की हिन्दी कविता
सब प्रकार के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक बंधनों से मुक्त थे फिर भी वे अपने
युग की क्रियाओं और प्रति क्रियाओं की उपेक्षा नहीं कर सके । यह अवश्य है कि उन
पर इस्लाम का प्रत्यक्ष और गहरा प्रभाव दिखलाई नहीं पड़ता । इस्लाम एक आस्था-
प्रधान धर्म है उसमें बुद्धिवादिता के लिए कोई स्थान नहीं है । इसके विपरीत सन्त मत
की आधारभूमि बुद्धिवादिता रही है । अतएव वे कोरी आस्था में, जो अन्धविश्वास की
सीमा तक पहुँच गयी थी, विश्वास नहीं करते थे । इसीलिए उन्होंने कोरे आस्था-प्रधान
इस्लाम धर्म का महत्त्व हृदय से नहीं स्वीकार किया । इस्लाम का जो कुछ प्रभाव उन
पर दिखाई पड़ता है वह अधिकतर परम्परागत संस्कार जनित और वातावरणमूलक
है। फिर भी मुसलमानों के एकेश्वरवाद तथा सूफी सन्तों के सर्वेश्वरवाद का प्रभाव
तत्कालीन साहित्य पर पड़ा । सूफियों के अनुसार यह संसार ब्रह्म कृत है । संसार में
उसी का स्वरूप प्रगट हुआ है । सूफियों ने यद्यपि माया को स्थान नहीं दिया फिर भी
शैतान के अस्तित्व को माना है जो जीव को भ्रम में डालकर ब्रह्म से मिलने में बाधा
पहुँचाता है ।
सन्त कवियों पर अन्य विचार-धाराओं का प्रभाव
साहित्य समाज का दर्पण होता है । वह अपने युग की प्रत्येक विचारधारा से
प्रभावित होता है । हिन्दी साहित्य के मध्ययुग के पूर्व, भारतवर्ष में अनेक दार्शनिक
विचार धाराओं का प्रचार था । जनता पर इन सभी सिद्धान्तों का मिले-जुले रूप में
प्रभाव पड़ा । फलतः इस काल में जो साहित्य रचा गया वह पूर्णतः धार्मिक साहित्य
रहा । साथ-साथ ब्रह्म, जीव, माया, जगत् आदि सम्बन्धी दार्शनिक विचारों की भी
विवेचना होती रही ।
सन्त कवियों पर कई विचार धाराओं का प्रभाव पड़ा । वे योग मार्ग, नाथ
पंथ, अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैत आदि सभी विचार धाराओं से प्रभावित हुए। उन्होंने
वेदान्त से ज्ञान तत्त्व, सूफियों से प्रेम तत्त्व, वैष्णवों से भक्ति तत्त्व, योगियों की बानियों
से सुरति निरत आदि शब्द अपना लिए । इस प्रकार सन्त काव्य में विशिष्ट दार्शनिक
सिद्धान्त नहीं मिलते वरन् सभी का मिश्रित रूप से उन पर प्रभाव पड़ा है ।
नामदेव पर अन्य दर्शनों एवं विचारधाराओं का प्रभाव
(क) वैष्णव परम्परा का प्रभाव
वैष्णव मत अत्यन्त प्राचीन मत है । भगवान् के विष्णु और उनके अवतारों
की उपासना ही इस मत की प्रमुखता है ।
विष्णु इस मत के परम आराध्य हैं । ऋग्वेद में विष्णु से सम्बन्धित सूक्त हैं।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १५६
विष्णु अन्य देवताओ की अपेक्षा मानवोचित गुणो से विभूषित है । उनमें अत्यन्त व्या-
पकत्व, अतुलनीय पराक्रम, विश्व धारण सामर्थ्य, अमृतत्व, पोषण-शक्ति, अवतार-
धारणा-शक्ति आदि की प्रतिष्ठा है।
कालांतर में विष्णु के दिव्य गुणो मे वृद्धि होती गयी और वे शील, शक्ति एवं
सौंदर्य इन तीनो विभूतियो से प्रतिष्ठित किये गये । इस प्रकार विष्णु के निर्गुण एवं
सगुण दोनो स्वरूपो का विकास हुआ।
डॉ० भांडारकर के अनुसार वैष्णव मत का प्रारम्भिक नाम ऐकान्ति धर्म था । १
भगवद्गीता इसका प्रमुख आधार ग्रंथ था। इसने साम्प्रदायिक रूप धारण कर
लिया और यह पांचरात्र या भागवत् धर्म के नाम से प्रसिद्ध हो गया । आगे चलकर
नारायणीय धर्म से इसका सम्मिलन हुआ । कालांतर में उस पर योग एवं सांख्य दर्शन
का भी प्रभाव पड़ा ।
पांचवी शताब्दी में इसका प्रभाव कम हो गया । छठी तथा सातवी शताब्दी में
आलवार भक्तो के रूप में इसका पुनः स्फुरण हुआ । मध्ययुग के आचार्यों ने इसको
पल्लवित किया । रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णु स्वामी, निम्बार्काचार्य तथा वल्लभा-
चार्य आदि ने इस मत को अच्छी प्रगति दी ।
वैष्णव धर्म का अपना विस्तृत साहित्य है । महाभारत का नारायणीयोपाख्यान,
गीता, भागवत्, नारद भक्ति सूत्र, शांडिल्य भक्ति सूत्र, विष्णु पुराण, पद्म संहिता
और लक्ष्मी तन्त्र आदि इसके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं ।
वैष्णव धर्म के सभी ग्रन्थो में भगवान् के दोनो-निर्गुण एवं सगुण-स्वरूपो का
वर्णन मिलता है । निर्गुण ब्रह्म से क्रमशः सगुण भगवान् का विकास हो जाता है ।
महाराष्ट्र का वारकरी सम्प्रदाय 'भागवत् सम्प्रदाय' है । बहुत प्राचीन काल से
महाराष्ट्र भागवत् धर्म का मुख्य क्षेत्र बना हुआ है । अपनी लोकप्रियता तथा विपुल
प्रचार के कारण वारकरी पंथ महाराष्ट्र का सार्वभौम पंथ है ।
महाराष्ट्रीय संतो की परंपरा का उदय संत ज्ञानेश्वर से माना जाता है ।
वारकरी अर्थात् वैष्णव संप्रदाय के प्रधान प्रवर्तक यही माने जाते हैं । इस संप्रदाय में
पंढरपुर के विट्ठल (पांडुरंग) की उपासना पर ही सबसे अधिक बल दिया गया है ।
भगवान् विट्ठल विष्णु के ही प्रतिरूप समझे जाते हैं। इसलिए यह संप्रदाय वैष्णव संप्रदाय
कहा जाता है । संत ज्ञानेश्वर के अतिरिक्त नामदेव, एकनाथ, तुकाराम आदि अन्य
महाराष्ट्रीय संतो ने भी इस संप्रदाय का प्रचार किया ।
१. वैष्णविज्म शैविज्म एण्ड अदर मायनर रिलीजस सेक्ट्स
—डॉ० आर० जी० भांडारकर—पृ० ९८-१०० ।

१६० नामदेव की हिन्दी कविता
उत्तर भारत में भागवत धर्म की पताका फहराने वाले पहले संत नामदेव थे।
ये परम वैष्णव थे। उन्होंने हरि के दासों (वैष्णवों) की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। संत
(वैष्णव) सदा सुखी हों। उनको दीर्घायु प्राप्त हो। उनको अहंकार का स्पर्श न हो।
पांडुरंग का नाम जिनकी वाणी के लिए थाती बन गया है, ऐसे संतजनों की नामदेव
मंगल कामना करते हैं।१
वैष्णव मत का उपादान—भक्ति तत्व
वैष्णव मत का दूसरा प्रमुख उपादान भक्ति तत्त्व है। वैष्णव धर्म की इस भक्ति
में प्रेम का विशेष महत्त्व है। वैष्णव धर्म का प्रेम प्रधान भक्ति तत्त्व नामदेव को पूर्णतया
मान्य है। उनकी भक्ति प्रेमा भक्ति है। उन्होंने स्थान स्थान पर इस भक्ति की महिमा
का वर्णन किया है—
'मै बावरी हूँ, राम मेरे पति हैं, मैं बडे मनोयोग से रच-रच कर उनके लिए
श्रृंगार करती हूँ।'२
'हे प्रभु ! तुम्हारे सामीप्य के लिए मैं व्यग्र हूँ। जैसे बछड़े के बिना गाय व्याकुल
रहती है, और पानी के बिना मछली तड़पती है—ठीक वैसे ही राम नाम के बिना
बेचारा नामदेव पीड़ित है।'३
'जैसे मारवाड़ी को जल और ऊंट को वनस्पति प्रिय है वैसे ही मेरे मन को
ईश्वर प्रिय है। जैसे पत्नी को पति प्रिय है वैसे ही ईश्वर मेरे मन को प्रिय है।'४
१. आखंड आयुष्य व्हावें तया कुळा । माझिया सकळा हरिच्या दासा ।१।
छलनेची बाधा न हो कोणे काळी । हे संत मंडळी सुखी असो ।२।
अहंकाराचा वारा न लागो राजसा । माझिया विष्णु दासा भाविकासी ।३।
नामा म्हणे तया असावें कल्याण । ज्या मुखा निधान पांडुरंग ।४।
—सकल संत गाथा, अभंग ८८३ ।
२. मैं बउरो मेरा रामु भरतारु
रचि रचि ताकउ करउ सिंगारु । —संत० ना० की हिं० प०, पद २७४ ।
३. मोहि लागी ताला बेली । बछरे बिनु गाइ अरला ।
पानीया बिनु मीनु तलफै । ऐंगे राम नामा बिनु बापुरो नामा ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद २६ ।
४ मारवाड़ी जेम नीरु वाल्हा, बेलि वाल्हा करहला ।
जिउ तरणी कउ कंतु वाल्हा तिउ मरे मनि रामईआ ॥
—स० ना० की हिं० प०, पद २०२।

द्वितीय भाग: आत्म-निवेदन, विठ्ठल-दर्शन एवं रहस्यवादी पद

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६१
पत्नी (जीव) का पति (ब्रह्म) के प्रति कैसा प्रेम होना चाहिए इसके लिए
नामदेव ने क्षुधा ओर तृषातुर, लोभी एवं कामी व्यक्ति और माता तथा सुत के प्रेम का
आदर्श उपस्थित किया है ।¹ आदि वैष्णव भक्ति के अनुरूप ही है ।
भगवान का लोकरक्षक एवं लोकरंजक स्वरूप
भगवान् के लोकरक्षक एवं लोकरंजक स्वरूप की प्रतिष्ठा वैष्णव मत की विशे-
षता है । नामदेव में भी यह विशेषता पाई जाती है । वे कहते हैं कि हे ईश्वर ! तुम्हारी
कृपा से पत्थर समुद्र पर तैर उठे थे । फलस्वरूप तुम्हारा स्मरण करने से भक्त भव-
सागर क्यो न तर जायेंगे ?²
इस प्रकार यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि नामदेव वैष्णव मत से प्रभावित
है जिसके फलस्वरूप उन्होंने वैष्णवों के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की ।
(ख) महाराष्ट्रीय वारकरी संप्रदाय—महाराष्ट्र का भागवत धर्म जो वारकरी
ग्रन्थ के नाम से प्रसिद्ध है पूर्ण रूप से वैदिक है। यह वारकरी पंथ चतुर्व्यूह के सिद्धान
को बिलकुल नही मानता । अद्वैत ज्ञान के साथ भक्ति का मंजुल सम्मिलन वारकरी पंथ
की विशेषता है । इस पंथ के देवता श्री विट्ठल (थो पाडुरंग) हैं जो श्रीकृष्ण के बाल
रूप माने जाते हैं ।
वारकरी संप्रदाय का उदय
इस संप्रदाय का उदय कब हुआ इस विषय में विद्वानो के भिन्न-भिन्न मत हैं।
संत तुकाराम की शिष्या बहिणाबाई ने एक अभङ्ग में³ वारकरी पंथ के मंदिर के
१. जैसी भूखै प्रीति अनाज । तृषावंत जल सेती काज ।
जैसी पर पुरखारत नारी । लोभी नर धन का हितकारी ।
जैसी प्रीति बारिक अरन माता । ऐसा हरि सेती मनु राता ॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ४८ ।
२. देवा पाहन तारीअले ।
—राम कहत जन कस न तरे ॥१॥ सं० ना० हिं० प०, पद १४६ ।
३. संत कृपा झाली । इमारत फळा आली ॥१॥
ज्ञानदेवे रचिला पाया । उभारिले देवालय ॥२॥
नामा तयाचा किंकर । तेणे केला हा विस्तार ॥३॥
जनार्दन एकनाथ । ध्वज उभारिला भागवत ॥४॥
भजन करा सावकाश । तुका झालासे कळस ॥५॥
—भागवत संप्रदाय, पृ० ५७२
११

निर्माण का बड़ा आलंकारिक वर्णन किया है जो इतिहास की घटनाओं से विरोध नही
खाता । परन्तु यहाँ ज्ञानदेव द्वारा 'पाया' (नींव) रखने का मतलब यह नही है कि
उन्होने इस मत का प्रारम्भ किया । यथार्थ बात तो यह है कि ज्ञानदेव के पूर्व ही इस
सम्प्रदाय के भक्तों की स्थिति थी परन्तु वे इधर-उधर बिखरे हुए थे । इन सब को
एक सूत्र में संगठित कर पथ को व्यवस्थित रूप देने का स्तुत्य कार्य ज्ञानेश्वर ने किया
इसीलिए वे इस संप्रदाय के मान्य आचार्य हैं । कृष्ण भक्ति के प्रचार के निमित्त ज्ञानदेव
ने अपने भ्राता निवृत्तिनाथ तथा सोपानदेव एवं भगिनी मुक्ताबाई के सहयोग से जो
महनीय कार्य किया उसके कारण आज भी महाराष्ट्र में अद्वैतवाद के साथ कृष्ण-भक्ति
का मनोरम सामंजस्य दिखाई देता है ।
प्रसिद्ध है कि संत ज्ञानेश्वर के पिता विट्ठलपंत ने संन्यास ले लिया था परन्तु
अपने गुरु रामानन्द के आग्रह से फिर वे गृहस्थी में प्रवृत्त हुए । इन्हीं के पूर्वोक्त चार
संतानें हुईं । इनकी गुरु परम्परा नाथ संप्रदाय के आचार्यों से संबद्ध मानी जाती है ।
गोरखनाथ के शिष्य गैनीनाथ ने निवृत्तिनाथ को स्वयं कृष्ण भक्ति की दीक्षा दी थी
और निवृत्तिनाथ ने फिर अपने दोनों अनुजों तथा भगिनी मुक्ताबाई को स्वयं दीक्षा
देकर अध्यात्म मार्ग का पथिक बनाया । निवृत्तिनाथ का कथन है कि प्राणियों का उद्धार
कर्ता वह श्रीधर है । कर्म सहित ब्रह्म साक्षात् श्रीकृष्ण मूर्ति है । वह रूप इस भूमंडल पर
सचमुच पांडुरंग रूप है, जो पुण्डलीक के निर्धार से यहाँ खड़ा है ।१ निवृत्तिनाथ की
शिक्षा में योग के साथ भक्ति का मंजुल मिश्रण था ।
वारकरी मत के सिद्धांत
(१) विट्ठल—वारकरी मत में सर्वश्रेष्ठ देवता पंढरीनाथ है जो बालकृष्ण के
ही रूप है । इस प्रकार यह कृष्णोपासक संप्रदाय है । यह विट्ठल संप्रदाय सं० १२६६
(ई० स० १२०६) के लगभग पंढरपुर में प्रचारित हुआ । इसके प्रचारक कन्नड संत
पुंडलीक कहे जाते है । विट्ठल संप्रदाय, वैष्णव तथा शैव संप्रदायों का मिश्रित रूप है ।
इस प्रकार विट्ठल संप्रदाय के संत विष्णु और शिव में कोई अन्तर नही मानते । विट्ठल
की उपासना विष्णु के अवतार वासुदेव कृष्ण की उपासना से ही आरम्भ हुई पर
१. प्राणिया उद्धार सर्व हा श्रीधर ।
ब्रह्म हें साचार कृष्णमूर्ती ।
तें रूप भीवरें पांडुरंग खरें ।
पुण्डलीक निर्धारि उभे असे ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग २३० ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६३
आगे चल कर विट्ठल और पांडुरंग में कोई अन्तर नही रह गया । पांडुरंग वस्तुतः श्वेत
अंग वाले शिव ही हैं। इस प्रकार विष्णु ही शिव है। और शिव ही विष्णु हैं। पंढरपुर
में विट्ठल की मूति शिवलिंग को शीश पर धारण किये हुए विष्णु की ही है।¹ ये
विट्ठल इस भांति एक सर्वव्यापी ब्रह्म के प्रतीक बन कर समस्त महाराष्ट्र में आराध्य
मान लिए गए। ऐसा ज्ञात होता है कि आठवी शताब्दी के शैव धर्म से ग्यारहवी
शताब्दी के वैष्णव धर्म का समझोता विट्ठल संप्रदाय के रूप में हुआ जिसके सबसे
महान् संत नामदेव हुए। ज्ञानेश्वर और नामदेव ने साथ-साथ सारे उत्तर भारत का
पर्यटन किया और अपने इस व्यापक धर्म का प्रचार किया। इस विट्ठल संप्रदाय के
अन्तर्गत अनेक संत हुए जिनमें गोरा कुम्हार, सावंता माली, नरहरी सोनार, चोखा
मेला, दासी जनाबाई, सेना नाई तथा कन्होपात्रा वेश्यापुत्री प्रमुख है।२
इस संप्रदाय में दक्षिण भारत के शैवो और वैष्णवो के बीच चलने वाले संघर्ष
का कही नाम व निशान तक नही है । कृष्णोपासक होने पर भी शिव को पूर्ण मान्यता
प्रदान करने का एक ऐतिहासिक हेतु भी है। ज्ञानदेव जो इस संप्रदाय के आदि
प्रतिष्ठापक थे स्वयं नाथ सप्रदाय में दीक्षित थे और नाथ संप्रदाय के आदि आचार्य
शिवजी ही है जो 'आदि नाथ' नाम से विख्यात है। इस प्रकार वारकरी संप्रदाय धार्मिक
मामलों में सदा उदार तथा समन्वयवादी रहा।³
(२) भक्ति तथा अद्वैत ज्ञान—वारकरी संप्रदाय की समन्वयवादी प्रवृत्ति का
दूसरा उदाहरण है अद्वैत ज्ञान तथा भक्ति का पूर्ण सामंजस्य । वारकरी पंथ आदि से
लेकर अन्त तक भक्ति-प्रधान है परन्तु उपनिषदों का 'एकमेवाद्वितीय ब्रह्म' तथा 'नेह
नानास्ति किंचन' आदि वाक्यो के द्वारा प्रतिपादित अद्वैत ब्रह्म में भी इसके अनुयायियों
की पूर्ण आस्था है। संत तुकाराम का स्पष्ट कथन है कि यह जगत् विष्णुमय है, वैष्णवों
का यही धर्म है। हरि के विषय मे भेदाभेद मानना अमंगलकारक भ्रम है।४
यह संप्रदाय निष्काम कर्म की शिक्षा सर्वतोभावेन देता है। यह पूर्ण प्रवृत्ति-
मार्गी है।
१. रूप पाहता डोलसू । सुंदर पाहता गोपवेपु ।।
महिमा वर्णिता महेसू । जेणे मस्तकी वंदिला ।।
—श्री ज्ञानेश्वर का अभंग, भागवत संप्रदाय, पृ० ५८७ ।
२. हिंदी साहित्य (द्वितीय खण्ड) पृ० १६१ ।
३. भागवत संप्रदाय ; डॉ० बलदेव उपाध्याय, पृ० ५८७ ।
४. विष्णुमय जग वैष्णवाचा धर्म ।
भेदाभेद भ्रम अमंगल ॥
—संत तुकाराम का गाथा ।

१६४ नामदेव की हिन्दी कविता
संतो को ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्म रूप बनकर जगत् में प्राणियों के भीतर अंतर्यामी
रूप से विद्यमान ब्रह्म की सेवा करनी चाहिए । इस विषय का बड़ी रोचक वर्णन संत
ज्ञानेश्वर ने किया है। उन्होने अपने 'अमृतानुभव' में एक बड़ा ही सुंदर दृष्टांत उस
सामंजस्य की तुलना के लिए दिया है । वे कहते हैं कि 'यदि एक ही पर्वत को काटकर
उसकी गुफा के भीतर देवता, देवालय तथा भक्त-परिवार का निर्माण एक साथ किया
जा सकता है, तो अद्वैत भाव के साथ भक्ति क्यों संभव नही है ?'१
'ज्ञानेश्वरी' में ज्ञानेश्वर इस तथ्य को आत्मानुभव का उदाहरण मानते हैं जो
शब्दो के द्वारा ठीक-ठीक प्रकट नही किया जा सकता । साढ़े पंद्रह के सोने में अर्थात्
खरे सोने में खरा सोना मिला देने पर ही उत्तम सुवर्ण तैयार होता है उसी प्रकार
मद् रूप होने पर ही मद्भक्ति उत्पन्न होती है । यदि गंगा समुद्र से भिन्न होती तो उसके
साथ मिलकर वह एकाकार कैसे बन जाती ?'२ इसी प्रकार भगवान् का भक्त भगवान को
अद्वैत रीति से जान कर ही उसका सच्चा भक्त बन सकता है ।
नामदेव ने इस संप्रदाय की विशेषता अद्वैत ज्ञान के साथ भक्ति का मृदुल सामंजस्य
कर बतलाई है । इन भक्तों की पूर्ण निष्ठा थी कि उपनिषदो का परब्रह्म ही विट्ठल के
रूप में प्रकट हुआ है । ज्ञान के साथ भक्ति का योग हो जाने से इनकी वाणी में अतीव
मृदुता और मधुरता आ गई है । इनका विश्वास था कि निर्गुण ब्रह्म ही नाम रूप को
ग्रहण कर भक्तो की मंगल-कामना के निमित्त इंद्रिय गम्य बन गया है। नामदेव ने
अभंगो द्वारा ब्रह्म रस तथा भक्ति रस के ऐक्य का प्रतिपादन किया है । नामदेव भगवान्
को सख्य कर पुकार रहे हैं कि 'भगवान् जल्दी आइए, पुकारते-पुकारते गला सूख गया,
शरीर पुलकित हो गया तथा अश्रु धाराओ से पृथ्वी भीग गई । हे दीन दयालु ! आने में
इतनी देर क्यों कर रहे हो ? किसी भक्त के यहाँ तो नही फँस गये ?'३
१. देव देऊल परिवारु । कीजे कोरूनि डोंगरू ॥
तैसा भक्तीचा वेव्हारु । का न व्हावा ? ॥ ४१ ॥
—अमृतानुभव ।
२. साडे पंधरा मिसलावे । तें साडे पंधराचि होआवे ।
तेवि मो आलिया समवे । भक्ति माझी ॥ ५६७ ॥
ह्वां गा सिंधूसि आनी होती । तरि गंगा कैसेनि मिलती ।
म्हणोनि मी न होता भक्तो । अन्वयो आहे ॥ ५६८ ॥
—ज्ञानेश्वरी, अध्याय १५ ।
३. येवडा वेल का लाविला । कोण्या भवताने गोविला ?
झडकरी येई गा विठ्ठला । कंठ आळविता सुकला ।

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६५
(३) भगवत् रूप—वारकरी पंथ को भगवान् के दोनों रूप—सगुण तथा
निर्गुण मान्य हैं। पूर्ण सगुणोपासक होने पर वह परमात्मा को व्यापक एवं निर्गुण-
निराकार भी मानता है तथा इस निराकार ब्रह्म की प्राप्ति का साधन सगुणोपासना,
नाम स्मरण तथा भजन है।
वारकरी संतों ने ज्ञान तथा भक्ति के परस्पर सहयोग तथा मैत्री भाव पर
विशेष बल दिया है। संत एकनाथ ने भक्ति तथा ज्ञान के परस्पर संबंध की सूचना
बड़े ही रोचक उदाहरण द्वारा दी है। वे भक्ति को मूल, ज्ञान को फल तथा वैराग्य को
फूल बतलाते हैं। जिस प्रकार बिना मूल के फल उत्पन्न नहीं हो सकता और बिना
फूल के फल असम्भव है उसी प्रकार बिना भक्ति और वैराग्य के ज्ञान का उदय नहीं
हो सकता। 'भक्ति के उदर से ज्ञान उत्पन्न होता है। भक्ति ने ही ज्ञान को उसका
गौरव प्रदान किया है। अतः दोनों का मधुर समन्वय ही साधक के लिए अवश्यमेव
संपादनीय व्यापार है।'१
वारकरी पन्थ के सिद्धान्त की विशेषता
वारकरी पंथ के सिद्धांत का प्रतिपादन करने वाला संत तुकाराम का एक
प्रसिद्ध अभंग है जिसमें वे कहते हैं कि 'मुख से विट्ठल के नाम का उच्चारण, गले में
तुलसी की माला धारण करना तथा एकादशी का व्रत रखना—ये तीन इस पंथ के
मान्य सिद्धांत हैं।'२ इष्टदेव तो विट्ठल हैं। विष्णु के सभी अवतार मान्य हैं परन्तु
राम-कृष्ण विशेष रूप से अभीष्ट हैं। भगवान् के सगुण तथा निर्गुण रूप एक ही हैं।
ध्येय है अभेद-भक्ति, अद्वैत भक्ति अथवा मुक्ति के परे की भक्ति। अद्वैत का सिद्धांत
इस सम्प्रदाय को स्वीकार है परन्तु इस कौशल के साथ इस ध्येय को प्राप्त करना उचित
है कि अभेद को सिद्ध करके भी संसार में प्रेम-सुख बढ़ाने के लिए भेद को भी अभेद
कर रखना। इस पंथ में भक्ति और ज्ञान दोनों की एकरूपता मानी गई है, जिसके
नामा गहिवरें दाटला । पूर धरणिये लोटला ॥
—नामदेवाचा गाथा ।
१. भक्तिचें उदरीं जन्मलें ज्ञान । भक्तीनें ज्ञानासी दिधलें महिमान ॥
भक्ती तें मूल, ज्ञान तें फल । वैराग्य केवळ तेथीचे फूल ॥
—संत वचनामृत : रा० द० रानडे, पृ० १६६ ।
२. आम्ही तेणें सुखी, म्हणा विट्ठल-विट्ठल मुखीं ।
कंठी मिरवा तुलसी, व्रत करा एकादशी ॥
—भागवत सम्प्रदाय—पृ० ५१६ पर उद्धृत ।

१६६ नामदेव की हिन्दी कविता
केंद्र स्थल में हैं स्वयं भगवान् श्रीहरि विट्ठल । सम्प्रदाय का मुख्य मंत्र है—'राम कृष्ण
हरि ।'
यह सम्प्रदाय चैतन्य सम्प्रदाय के समान युगल उपासना में कृष्ण के साथ राधा
को सम्मिलित नहीं करता बल्कि उसके स्थान में रुक्मिणी को महत्त्व देता है। इसका
सुपरिणाम यह हुआ कि महाराष्ट्र में कृष्ण भक्ति का नितांत समुज्ज्वल तथा उदात्त रूप
दृष्टिगोचर होता है। यहाँ उस विकृत रूप का दर्शन नहीं होता जो उत्तर भारत के
कतिपय प्रांतों में अश्लीलता की कोटि तक पहुँच कर भावुकों के लिए उद्वेग-जनक
होता है ।
इस प्रकार वैष्णव धर्म परम्परा का प्रभाव नामदेव पर पर्याप्त मात्रा में है।
उनके पूर्व जो वैष्णव आचार्य हुए, जिनका विशेष प्रचार उत्तरी भारत में था, नामदेव
पर उनकी विचार-धाराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। एक ओर नामदेव
महाराष्ट्रीय वारकरी परम्परा के प्रतिनिधि हैं तो दूसरी ओर उत्तरी भारत की वैष्णव
भक्ति परम्परा के । उनमें दोनों परम्पराओं का अभूतपूर्व समन्वय दिखाई पड़ता है ।
नामदेव की रचनाओं में प्राप्त उनके दार्शनिक विचार
सन्त नामदेव महाराष्ट्र के प्रसिद्ध वारकरी सम्प्रदाय के अनुयायियों में से थे। इस
कारण वारकरी सम्प्रदाय के दार्शनिक सिद्धांतों का प्रतिपादन उनकी रचनाओं में पाया
जाना स्वाभाविक है । इस सम्प्रदाय के सन्तों में निर्गुण सर्वात्म-स्वरूप अद्वैत ब्रह्म के
प्रति पूरी निष्ठा पाई जाती है किन्तु सगुण मूर्ति के समक्ष वे कीर्तन भी किया करते थे ।
ब्रह्म (ईश्वर दर्शन)
ब्रह्म परम्परा—पारमार्थिक तत्त्व, परम तत्त्व, अन्ततम सत् एवं परम अस्तित्व
को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है ।
उपनिषदों में ब्रह्म की पूर्ण प्रतिष्ठा है । तैत्तिरीयोपनिषद् में—इस सम्पूर्ण
विश्व की उत्पत्ति, गति, पालन और स्थिति तथा इस सम्पूर्ण जगत् के लय के कारण
को ब्रह्म कहा गया है ।१
ब्रह्म ही पूर्ण है, सब कुछ वही है, वह सब प्रकार से पूर्ण है ।२
१. यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, यतो जातानि जीवन्ति ।
यत् प्रयन्ति अभिसं विशन्ति तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म ॥
—तैत्तिरीयोपनिषद् ३ । १ ।
२. ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
—ईश. शांतिपाठ

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६७
यही एक ब्रह्म अपूर्व, अद्वितीय, अनन्तर और अबाह्य है। १
ब्रह्म एक ही है दूसरा नहीं। २
यह निखिल जगत् ब्रह्म ही है। ३
सकल विश्व ब्रह्म ही है। ४
वह माया से विश्व का सृजन करता है। ५
अद्वैत वेदांत दर्शन ने ब्रह्म ही को पारमार्थिक सत्य कहा है। शंकराचार्य का
कथन है।—जिसका स्वरूप सदा सर्वदा अखण्ड रूप में एक ही सा बना रहे वही
पारमार्थिक सत्ता हो सकती है। ६
नामरूपात्मक जगत् सत्य रूपेण सत्य है अर्थात् ब्रह्म सर्वव्यापी, अखण्ड, एकरस
सब में है अतः ये उसकी विद्यमानता के कारण सत्य है किन्तु विकार-जनित होने से
अपने विशेष नाम व रूपधारी स्वरूप में असत् है क्योंकि ये सब देश, काल और अवस्था
के द्वारा बाधित हो जाते हैं। ७
उपर्युक्त ब्रह्म सम्बन्धी विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि ब्रह्म विश्व का
मूल तत्त्व है। वह निर्गुण, अव्यक्त, अचिंत्य, निराकार तथा अनिर्वचनीय है। व्यक्त
रूप में वही सृष्टिकर्त्ता, धर्त्ता, संहारक आदि भी है।
नामदेव द्वारा ब्रह्म वर्णन
ब्रह्म के सर्व शक्तिमान तथा सर्वव्यापक रूप के पर्याप्त प्रमाण नामदेव के पद
साहित्य में मिलते है।
नामदेव के अनुसार ईश्वर एक है जो सर्वव्यापक और सर्वपूरक है। जिधर
१. तदेतत् ब्रह्म अपूर्वमनपरमनन्तरमवाह्यम् ।
—बृहदा. २।५।१६ ।
२. ब्रह्म एकमेवाद्वितीयम् ।
—छान्दोग्य. उप, ६।१।१।
३. एकमेव सत् नेह नानास्ति किंचन ।
—बृहदा. उप. ३।८।८।
४. सर्वं खल्विदं ब्रह्म ।
—छांदोग्य. उप. ३।१४।१।
५. माया सृजते विश्वमेतत् । —श्वेता. उप, ४।६।
६. एक रूपेण हि अवस्थितो योऽर्थः स परमार्थः ।
—शांकर भाष्य २।१।११।
७. सर्वं च नामरूपादि सदारमनेव सत्यं विकारजातं स्वतस्तु अनृतमेव ।
—छान्दोग्य० उप० ६ । ३ । २ ।