सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८३
कहते हैं—'ब्रह्म में ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। चिन्मय परमात्मा से भिन्न
भासमान होने वाला विश्व मायिक है। मृगजल का जैसे वास्तव में अस्तित्व नहीं होता
उसी प्रकार जड़ विश्व का भी वास्तव में अस्तित्व नहीं है। यहाँ सच्चा अद्वैत की बात
श्रवण करो और उसी आत्म स्वरूप में तल्लीन हो जाओ।'
ज्ञानेश्वर ने 'ज्ञानेश्वरी' में अपने जिस अद्वैत सिद्धांत का सविस्तार प्रतिपादन
किया उसको नामदेव ने संक्षेप में केवल तीन अभंगों में समझाया है। मानो वेदान्त का
सार (निचोड़) ही उन्होंने संक्षेप में परस्पर पूरक दृष्टांतों द्वारा प्रस्तुत किया है।
कुछ विद्वानों की यह धारणा कि नामदेव केवल सगुण भक्त थे, दर्शन से उनका
दूर का भी वास्ता नहीं था, वे ज्ञानी नहीं थे, समीचीन नहीं जान पड़ती। डॉ० पेंडसे
ऐसे विद्वानों की धारणा का खण्डन करते हुए कहते हैं—
'अपनी इस धारणा के अनुसार पांगारकर, रानडे, आजगावकर और विनोबा
भावे द्वारा संकलित नामदेव के अभंगों में, जिनमें उनके दार्शनिक विचार व्यक्त हुए हैं,
ऐसे अभंग नहीं हैं। इसी प्रकार विट्ठल को निर्गुण परब्रह्म के सगुण प्रतीक के रूप में
वर्णन करने वाले अभंगों को उन्होंने प्रधानता नहीं दी। ज्ञानदेव केवल योगी और
ज्ञानी थे तथा नामदेव केवल सगुण भक्त थे। ज्ञान और भक्ति का इन दोनों में जो
बटवारा किया गया है वह भी ठीक नहीं जान पड़ता। निवृत्तिनाथ, ज्ञानदेव तथा
नामदेव को निर्गुणानुभूति हुई थी। तीनों ज्ञानी भक्त थे। अन्तर इतना ही था कि
ज्ञानेश्वर का यदि ज्ञान मार्ग पर अधिक विश्वास था तो नामदेव का सर्वजन सुलभ
सगुण भक्ति पर। ज्ञानेश्वर की अपील यदि बुद्धि को थी तो नामदेव की भावना को।
इसीलिए एक ज्ञान राज (ज्ञानियों का राजा) हुआ तो दूसरा भक्त-राज अथवा भक्त
शिरोमणि।'
महाराष्ट्रीय संतों ने ज्ञान और भक्ति का अलग-अलग बटवारा नहीं किया जैसा
कि उत्तरी भारत की संत परंपरा में परिलक्षित होता है।
ब्रह्म चाहे निर्गुण हो अथवा सगुण नाम स्मरण के लिए उसे नाम के बंधन में
बंधना ही पड़ता है। नामदेव कहते हैं—'निर्गुण निराकार ब्रह्म जब सगुण रूप धारण
करता है तब उसको नाम और रूप के बंधन में फँसना पड़ता है। अतः उन्होंने 'नाम
वेद' की स्थापना की।'२
१. ज्ञानदेव आणि नामदेवः डॉ० शं० दा० पेंडसे—पृ० ३०१।
२. नाम तेंचि रूप , रूप तेंचि नाम । नामरूपा भिन्न नाही नाही ॥१॥
आकारला देव नामरूपा आला । म्हणोनी स्थापिला नामवेदी ।२।
—सकल संत गाथा अभङ्ग ६६०।