सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७७
रिक्त कोई अन्य विचरण नहो करता है ।'१
नामदेव अपने मन को चेतावनी देते हुए कहते है—'रे मन ! तू विषय रूपो
संसार सागर को कैसे पार कर सकेगा ? तू तो झूठी माया को देखकर ही अपने को भूल
गया ।'२
मराठी रचनाओं से उदाहरण
नामदेव कहते है—'यह संसार असार है, माया है, मृगजलबत् है। इसको प्राप्ति
के प्रयत्नों मे अंत में निराश ही होना पड़ेगा अतः परमात्मा की शरण में जाओ ।
निष्काम भाव से भक्ति करो तो तुम्हारा उद्धार होगा ।'३
संसार दुःख पूर्ण होते हुए भी नामदेव कही भी उसका त्याग करने के लिये नही
कहते । उनके अनुसार प्रत्येक भक्त को उत्पादक धम करना चाहिए । प्रत्येक मानव को
अपनी जीविका का काम करते समय हरि-भजन या नाम-स्मरण भी करते रहना
चाहिए । नामदेव ने जीवन पर्यंत अपना पेशेवर कार्य-कपड़े सीने का अर्थात् दर्जी का
काम किया ।४
भक्ति का मार्ग प्रवृत्ति मार्ग है । अत, नामदेव ने भक्ति को अधिक महत्त्व
दिया । उन्होने मुक्ति का निरादर किया और मुक्ति को मुक्ति से उच्चतर मूल्य माना ।
१. जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जल ते भिन्न न कोई ॥
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला विचरत आन न होई ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५० ।
२. कैसे मन तरहिगा रे संसार सागरु बिखै को बना ।
झूठो माइआ देखि के भूला रे मना ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५१ ।
३. मृगजल डोहो का उपससी वाया । बेगी लवलाह्या शरण रिघें ।
भजे तू विठ्ठला सर्वांभूती भावें । न लगति नावें आणिकाची ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग १६८२ ।
४. का करौ जाती का करौ पांती । राजाराम सेऊँ दिन राती । टेक ।
मन मेरा गज जिभ्या मेरी काती । रामरमे काटौं जम की फासी ॥ १ ॥
अनंत नाम का सीऊँ बागा । जा सीजत जम का डर भागा ॥ २ ॥
सीवना सीऊँ हौंसीऊँ ईव सीऊँ । राम बिना हूँ कैसे जीऊँ ॥ ३ ॥
सुरति की सुई प्रेम का धागा । नामा का मन हरि सूँ लागा ॥ ४ ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १८ ।
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