सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 168, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७३
निषद् में लिखा है—‘आत्मा-स्वरूप परम पुरुष सब प्राणियों में रहता हुआ भी माया
के पर्दे में छिपा हुआ रहने के कारण सबको प्रत्यक्ष नहीं दीखता। केवल सूक्ष्म तत्वों
को समझने वाले पुरुषों द्वारा ही सूक्ष्म तथा तीक्ष्ण बुद्धि से देखा जाता है।’¹
श्वेताश्वेतर उपनिषद् में माया का उपयुक्त वर्णन है जो इस प्रकार है—
‘माया तो प्रकृति को समझना चाहिए और महेश्वर को मायापति। उसी के अंगभूत
कारण-कार्य-समुदाय से यह संपूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है।² यहीं पर लिखा है कि—
संपूर्ण जगत् को माया का अधिपति परमेश्वर पंच महाभूतादि से रचता है तथा दूसरा
जीवात्मा उस प्रपंच में माया के द्वारा भली भाँति बँधा हुआ है।’³
इस प्रकार उपनिषदों में नामरूपात्मक जगत् को, अविद्या को, भ्रम को तथा
प्रकृति को माया कहा गया है।
गीता में माया को कृष्ण की शक्ति कहा गया है। गीता का कथन है—‘मेरी
यह गुणमयी और दिव्य माया दुस्तर है। इस माया को वे ही पार कर पाते हैं, जो
मेरी शरण में आते हैं।’⁴ और भी कहा है—‘माया ने जिनका ज्ञान नष्ट कर
दिया है ऐसे मूढ और दुष्कर्मी नराधम आसुरी बुद्धि में पड़कर मेरी शरण में नहीं
आते।’⁵
गीता में माया को अविद्या, भ्रम तथा प्रकृति रूप में कहा है।
शास्त्रीय ढंग से माया का विवेचन आचार्य शंकर ने किया। कालान्तर में माया-
वाद मध्यकालीन दार्शनिकों के लिए एक आवश्यक तत्त्व हो गया।
१. एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ कठोप. १ । ३ । १२ ।
२. मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ।
तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥
श्वेताश्वतर उपनिषद् ४ । १० ।
३. अस्मान्मायी सृजते विश्वमेतत् तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ।
—श्वेताश्वतर उपनिषद् ४ । ९ ।
४. दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ।
—गीता ७ । १४ ।
५. न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
—गीता ७ । १५ ।