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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 332 में से

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पृष्ठ 166

नामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७१
तुममें और मुझमें क्या अन्तर है ? अर्थात् कोई अन्तर नही है), भगवान् से भवत और
भवत से भगवान् है । अद्वैत का यही खेल भक्त और भगवान् के बीच चल रहा है ।
तुम्हीं देवता हो, तुम्ही मंदिर हो और तुम्ही पुजारी हो—जल से ही लहरें और लहरों
से ही जल होता है, दोनों अभिन्न हैं—कहने-सुनने में दोनो भले ही अलग हों । 'हे
भगवान् ! तुम ही गाते हो, नाचते हो और वाद्य बजाते हो । नामदेव कहते हैं—हे
भगवान् ! तुम मेरे स्वामी हो । तुम्हारा भक्त अपूर्ण है, तुम पूर्ण हो ।'१
नामदेव के अनुसार सभी जीवों की उत्पत्ति ब्रह्म से होती है । वह सब जीवों
में समाया हुआ है । यह माया ही है जिसने सारे संसार को मोह लिया है । अन्यथा तुम
घट-घट वासी हो ।२ यहाँ पर नामदेव ने आत्मा का निरूपण बहुत कुछ गीता की शैली
पर किया है ।
अज्ञानी जीव को मोहिनी माया अपने पाश में अकड़ लेती है । ऐसे अज्ञानी
जीव को चेतावनी देते हुए नामदेव कहते हैं—'हे जड़ ! तू सचेत हो जा । तुझे यह
औघट घाट पार करना है ।'३
आत्म तत्त्व सारे संसार में व्याप्त है । उसी को लोग विश्वात्मा कहते है । आत्मा
और विश्वात्मा मूलतः एक ही है । यह माया है जो आत्मा को पंचतत्त्वमय शरीर से
आबद्ध कर के अपने वश में कर लेती है ।४ माया से आबद्ध आत्मा ही जीव के नाम
से प्रसिद्ध है ।
१. बदहु की न होइ माधऊ मोसिऊ ।
ठाकुर ते जनु जन ते ठाकुर खेलु परिउ है तोसिऊ ॥
जल ते तरंग तरंग ते है जल कहन सुनन कऊ दूजा ॥
—स० ना० हिं० प०, पद १६१ ।
२. जामै सकल जीव की उतपति । सकल जीव मै आप जी ॥
माया मोहु करि जगतु भुलाया । घटि घटि व्यापक बाप जी ॥
—स० ना० हिं० प०, पद ४८ ।
३. जागि रे जीव कहा भुलाना ।
आगे पीछे जाना ही जाना ॥ टेक ॥
भणत नामदेव चेति अयाना ।
ओघट घाट अरन दूरि पयाना ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १२२ ।
४. बीही बीही तरी सबल माया ।
आगे दूति अनेक भरमाया ॥ टेक ॥