सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७५
सकते हैं। आगे चल कर कहते हैं कि अब माया मुझसे नहीं लिपटेगी, मैं इस संसार से
मुक्त हो जाऊँगा ।'१ भगवत्कृपा होने पर ही परब्रह्म परमेश्वर को जाना जा सकता है,
अन्यथा नहीं।
'इस संसार में उत्पन्न प्राणी माया-पाश के कारण अपने को भूल गये हैं। हे
भगवन् ! जिस व्यक्ति को तुम ज्ञान देते हो केवल वही तुमको जान पाता है।'२
'माया वस्तुतः जीव मात्र को मुग्ध कर लेती है। इससे उसका रहस्य जान
सकना कठिन है। इसी से माया अनिर्वचनीय कही जाती है।'३
'हे मन रूपी पंछी ! तू संसार रूपी जाल को स्पर्श न कर। माया दिन में तीन
फेरे लगाती है। काल तुझ पर झपट रहा है।'४
अभिमानी मनुष्य को चेतावनी देते हुए नामदेव कहते हैं—'यह संसार धोखे
की टट्टी है, मायाजाल है। धन, यौवन, पुत्र तथा स्त्री को तू अपना न समझ । ये बालू
के मंदिर के समान नष्ट हो जायेंगे।'५
जगत्
जड़ जगत् का भौतिक स्वरूप .—सभी प्रकार की प्रतीतियों का नाम जगत् या
संसार है। समस्त जगत् या इसके प्रत्येक विषय को एक-सा अन्त-तम सत्य या पार-
मार्थिक सत्य नहीं कह सकते। जगत् जब नामरूपात्मक हो लिया जाता है तब वह केवल
व्यावहारिक दृष्टि से सत्य है या यों कहें कि प्रातिभासिक सत्ता की अपेक्षा अधिक सत्य है
और पारमार्थिक सत्ता की अपेक्षा कम सत्य ।
१. इहु संसार ते तब ही छूटउ जउ माइया नह लपटावउ ।
माइआ नामु गरभ जोनि का तिह तजि दरसन पावउ ॥
—ग्रन्थ साहब, रागु धनासरी २ ।
२. सभ ते उपाई भरम भुलाई । जिस तू देहि तिहहि बुझाई ॥
—ग्रन्थ साहब, रागु आसा—१ ।
३. माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझै कोई ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद १५० ।
४. रे मन पंछीया न परसि पिंजरै । संसार माया जाल रे ।
येक दिन मे तीन फेरा । तोहि सदा झपै काल रे ॥ टेक ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ७५ ।
५. यहु ममिता अपनी जिनि जानौ । धन जोवन सुत दारा ।
बालू के मंदिर बिनसि जाँहिगे । झूठे करहु पसारा रे नर ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ६२ ।