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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 332 में से

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पृष्ठ 177

१६२ नामदेव की हिन्दी कविता
निर्गुण सगुण की एकता
निर्गुण सगुण की एकता नामदेव सुवर्ण तथा सुवर्ण से बनी अशरफी के दृष्टांत
द्वारा प्रमाणित करते हैं—'जो सगुण तथा निर्गुण दोनो से परे है, जिसका कोई आकार
नही, वही साकार होकर उपलब्ध हुआ । जल से जैसे बर्फ बनती है उसी प्रकार निरा-
कार पाडुरंग (ब्रह्म) साकार हुआ । जिस प्रकार सुवर्ण तथा उससे बनी अशरफी अभिन्न
होते हैं उसी प्रकार निर्गुण तथा सगुण एक ही ब्रह्म के दो रूप है । पाडुरंग ही संसार
है, संसार ही पाडुरङ्ग है ।'१
आकार के कारण मूल वस्तु से भिन्न कोई अन्य वस्तु निर्मित हुई है ऐसा भास
होता है । वह दूर करने के लिए नामदेव विवर्तवाद का दृष्टांत देते हुए कहते हैं—'एक
ही तत्व एकाकार रूप से सारे संसार में व्याप्त है । वही सारे संसार का संचालन करता
है । इस एकमेव ब्रह्म की प्रतीति हम प्राप्त करें । उससे भिन्न भासमान होने वाला विश्व
मायिक है अतः मिथ्या है ।'२ यहाँ ज्ञानेश्वर के चिद्विलासवाद का प्रभाव स्पष्ट रूप
से दिखाई देता है ।
वेदो का भी यही निष्कर्ष है कि द्वैत तथा अद्वैत से परे सर्वत्र अन्य निरपेक्ष
एकमेव ब्रह्म है—
(१) एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति ।
(२) सर्वं खल्विदं ब्रह्म ।
(३) नेह नानास्ति किंचन ।
नामदेव ने अद्वैत सम्बन्धी इन वैदिक सिद्धान्तों का ही उद्घाटन किया है ।
अपने अभिमत अद्वैत सिद्धांत को मृगजल के दृष्टांत द्वारा पुष्ट करते हुए नामदेव
१. निर्गुण सगुण नाही ज्या आकार । होऊनी साकार तोचि ठेला ।
जली जलगार दिसे जैसा परी । तैसा निराकारी साकार हा ॥
सुवर्ण ची घन, घन ची सुवर्ण । निर्गुणी सगुण यथापरी ॥
पाडुरंगी अंगे सर्व झाले जग । निववी सर्वांग नामा म्हणे ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३३० ।
२. एक तत्व एकाकार सर्व देशी । एक तो देखेसी सकल जनीं ।
ऐसे ब्रह्म पहा आहे सर्व एक । न लगे विवेक करतों कांहीं ।
मिथ्या हे डंबर माया मथितार्थ । हरि हाचि स्वार्थं वेगी करी ।
नामा म्हणे समर्थ बोलिला तो वेद । नाही भेदाभेद ब्रह्मरूपी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ३३२ ।