सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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माया का अर्थ है ईश्वर की विचित्रार्थ-सर्गंकरी (अद्भुत विषयों की सृष्टि
करने वाली) शक्ति ।'
द्वैताद्वैत, द्वैत तथा शुद्धाद्वैत आदि सभी दर्शनों ने मायावाद को स्वीकार किया
है। इसे ब्रह्म की शक्ति भी बताया गया है।
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि मायावाद की परंपरा प्राचीन काल
में वेदों से प्रारंभ हुई और सभी भारतीय दार्शनिकों पर उसका प्रभाव पड़ा। विचारकों
ने अपने अपने विचारों के अनुकूल उसका वर्णन किया । माया, अविद्या, भ्रम, अज्ञान,
मिथ्या ज्ञान, नामरूपात्मक जगत् आदि शब्दों का प्रयोग माया के अर्थ में होता
रहता है ।
नामदेव का माया वर्णन
नामदेव ने भी अपनी रचनाओं में माया का वर्णन किया है । उनके अनुसार
माया ही जीव को ब्रह्म से विमुख करती है । कोई विरला ही व्यक्ति गुरु उपदेश द्वारा
माया के प्रभाव से बचकर ब्रह्म तक पहुँच सकता है ।
माया के दो रूप हैं—एक अविद्या माया तथा दूसरी विद्या माया । अविद्या
माया के वशीभूत होकर जीव संसार के मोहजाल में फँस जाता है । विद्या माया, सब
गुण जिसके वश में हैं और जो ईश्वर की प्रेरणा से संसार की रचना करती है, जीव
को संसार के मोहनाल से छुड़ा कर ब्रह्म की भक्ति की ओर ले जाती है ।
नामदेव कहते हैं—'हे विट्ठल ! तेरी माया बहुत ही प्रबल है । पहले ही से
वह भक्तों को भरमाती आई है । तथ्य यह है कि माया के प्रबल हो जाने पर ब्रह्म तथा
ब्रह्म के प्रबल हो जाने पर माया दृष्टिगोचर नहीं होती ।'२
'हे माधव ! यह माया तुम्हारी भक्ति में बाधक होती है । यह भक्तों को तुमसे
मिलने नहीं देती ।'३
'जीव का गर्भयोनि में आना ही माया है, यदि वह छूट सके तो दर्शन हो
१. भारतीय दर्शन : सतीशचंद्र चट्टोपाध्याय
—गीता, पृ० २७० ।
२. बीहौ बीहौ तेरी सबल माया । आगे इनि अनेक भरमाया ॥ टेक ॥
माया अंतर ब्रह्म न दीसै । ब्रह्म के अंतर माया नहीं दीसै ॥ १ ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद ३६ ।
३. माधौ त्री माया मिलन न देई । जन जीवै तो करै सनेही ॥ टेक ॥
सं० ना० हिं० प०, पद १०६ ।