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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 332 में से

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पृष्ठ 173

१७८ नामदेव की हिन्दी कविता
इसी से निष्काम कर्मयोग का सिद्धांत निकलता है। भाव भक्ति को ही कर्म-दृष्टि से
निष्काम कर्मयोग कहा जाता है।
नामदेव का ऐहिक तत्व विचार
नामदेव का लौकिक जीवन विषयक दृष्टिकोण —व्यक्ति अपना ऐहिक जीवन
किस प्रकार व्यतीत करे इस विषय में नामदेव ने जो विचार व्यक्त किये हैं उन्हें एक
पारमार्थिक का प्रकट चिंतन समझना समीचीन होगा। भौतिक जीवन या केवल सुखोप-
भोग का पक्ष ही उसमें व्यक्त नहीं हुआ है। नामदेव का यह ऐहिक तत्त्व विचार अँधेरे
में टटोलने वाले साधकों के लिए मानो उनका लगाया ज्ञान दीप है। अतः नामदेव के
ऐहिक तत्त्व-चिंतन में अंतर्भूत उपदेशों का विशेष महत्त्व है।
जगत्, मानवी जीवन, नर देह तथा कुल की मर्यादा संबंधी प्रदर्शित विचारों से
उनका लौकिक जीवन विषयक दृष्टिकोण स्पष्ट होता है।
नामदेव कहते हैं—'जन्म जन्मांतर के बाद नर-देह मिला है। दुर्लभ मनुष्य जन्म
पाकर भी यदि तूने ईश-भक्ति नहीं की तो तुझे पुनः आवागोन के फेर में पड़ना होगा।
अतः सुखोपभोग के विषयों का त्याग कर आत्मा राम से लौ लगाओ। घर गृहस्थी को
संभालते हुए भी हम उसके प्रति आसक्त न हो और निरन्तर नाम-स्मरण करते रहे।'१
'टूटे फूटे बर्तन चुराये जाने की आशंका नहीं रहती। स्वप्न में हम जिस सुख
का, ऐश्वर्य का उपभोग लेते हैं जागृतावस्था में वह हमारे लिए अनुपयुक्त होता है।
उसी प्रकार भाग्य वश पारिवारिक सुख प्राप्त होता है। नामदेव कहते हैं कि यह संसार
नाशवान् है।'२
यह जगत् (संसार) मदारी के खेल अथवा इंद्रजाल के समान है।३
१. शेवटली पाली तेह्वां मनुष्य जन्म। चुक लिया धर्म फेरा पड़े ॥
एक जन्मी ओलखी करा आत्माराम। संसार सुख भोगूं नका ॥
संसारी असावे असोनि नसावे। कीर्तन करावे वेळोवेळा ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १६७७ ।
२. फुटल्या घड्याचे नाही नागवणे ।
संसार भोगणे तेणे न्याये ॥
—सकल संत गाथा, १६६२ ।
३. गारड्याचा खेळ दिसे क्षण भर।
तैसा हा संसार दिसे खरा ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १६५७ ।