सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ें१८० नामदेव की हिन्दी कविता
संत ज्ञानेश्वर के समकालीन एवं सहयोगी संत नामदेव अपनी विचारधारा के
अनुसार वस्तुत निर्गुंणोपासक थे किन्तु सगुणोपासना को भी उन्होंने अपनाया था ।
परमात्मा ही एक मात्र सब कुछ है वही सबके बाहर तथा भीतर सर्वत्र व्याप्त है और
उसी के प्रति एकातनिष्ठ होकर रहना चाहिये इसको वे अपना परमार्थ मानते थे ।
अद्वैत-परक भक्ति कल्पना
महाराष्ट्रीय संतों की यह विशेषता है कि ये द्वैतभाव को मानते न थे। वे
अद्वैत भाव की भक्ति में मग्न रहने वाले जीव थे । आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार
अद्वैत मत का प्रभाव सभी वैष्णव संप्रदायों में वारकरी संप्रदाय पर अधिक पड़ा है।१
अपने 'अमृतानुभव' में एक स्थल पर ज्ञानेश्वर ने अभेद-भक्ति का आदर्श प्रस्तुत
किया है :
'जिस प्रकार दीप और उसकी प्रभा एक दूसरे से भिन्न नहीं है उसी प्रकार मैं
और मेरे भक्त एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं। दीप की प्रभा उसका स्वरूप है उसी प्रकार
मेरे भक्त मेरे स्वरूप हैं । प्रभा का अधिष्ठान जैसे दीप है वैसे मैं भक्तों का अधिष्ठान
हूँ।' इन शब्दों में नामदेव ने अद्वय विचार हमारे सामने रखा है ।२
मूलत. सगुणोपासक नामदेव को अद्वैत की अनिर्वचनीय प्रतीति होने पर 'आप-
पर भाव' ( मैं-तू का भाव ) जाता रहा । अपनी इस अनुभूति का वर्णन नामदेव इस
प्रकार करते हैं—'यदि तू लिंग है तो मैं सालुंका हूँ। यदि तू तुलसी है तो मैं मंजिरी
हूँ। वास्तव में 'स्वयें दोन्ही' तू और मैं ( इष्ट देव और भक्त ) दोनों में तू ही है ।३
१. ईश्वराद्वयवाद की इस अपूर्व अद्वैतपरक भक्ति का ही प्रभाव कदाचित् उस वैष्णव
संप्रदाय पर भी किसी न किसी प्रकार पड़ा था जो पंढरपुर नामक स्थान के आस
पास विक्रम की १३ वीं शताब्दी में प्रचलित हुआ था जिसके प्रवर्तक ज्ञानेश्वर
माने जाते हैं और जो आज तक 'वारकरी संप्रदाय' के नाम से प्रसिद्ध है ।
—उत्तरी भारत की संत परंपरा, पृ० ८८ ।
२. मी तो भक्त रूप भक्त माझे स्वरूप ।
प्रभा आणि दीप जया परी ॥
—सकल संत गाथा, अभंग ६१६।
३. तू अवकाश मी भूमिका । तू लिंग मी साळुंका ॥
तू समुद्र मी द्वारका । स्वयें दोन्ही ॥ १ ॥
तू वृंदावन मी चिरी । तूं तुलसी मी मंजिरी ।
तूं पावा मी मोहरी । स्वयें दोन्ही ॥ २ ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १५२६।