सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ नामदेव की हिन्दी कविता
जीव की एकता और अद्वैतता
हम माया के कारण आत्मा और ब्रह्म की अद्वैतता पहचान नही पाते । नामदेव
भी आत्मा और ब्रह्म में भेद नहीं मानते । वे कहते हैं—'हे परमात्मा ! तुम्हारा वियोग
मुझे असह्य है । तुम्हारे बिना मैं घडी भर भी नहीं रह सकता । यदि तुम गिरिवर हो
तो मैं मोर हूँ । यदि तुम चंद्रमा हो तो मैं चकोर हूँ । तुम तरुवर हो तो मैं पक्षी ।
तुम यदि सरोवर हो तो मैं उसमें रहने वाली मछली हूँ ।'१ इस प्रकार जीव और ब्रह्म
की एकता एव अद्वैतता को नामदेव ने स्पष्टतया घोषित किया है ।
'हे जीव ! तेरी गति तू जानता है । मैं उसका क्या वर्णन करूँ ? जैसे लवण
(नमक) पानी में द्रवित होने पर अलग नही किया जा सकता उसी प्रकार का मेरा
और मेरे स्वामी का संबंध है । सत्संग से मुझे उसकी प्राप्ति हुई । मैं प्रेमातिशय से
उसकी वंदना करता हूँ । २
माया
मायावाद की परंपरा—मायावाद भारतीय दर्शन में अपना विशिष्ट स्थान
रखता है । ऋग्वेद में उल्लेख है कि इन्द्र अपनी शक्ति से अनेक प्रकार के रूप धारण
कर लेता है ।३ वेदों में रूप बदलने की क्रिया को माया कहा गया है ।
उपनिषदों में नाम रूप के अर्थ में माया शब्द का प्रयोग हुआ है । कठोप
माया अंतर ब्रह्म न दीसै ।
ब्रह्म के अंतर माया नहीं दीसै ॥ १ ॥
— स० ना० हिं० प०, पद ३६ ।
१ तुम बिनु धरि येक, रहूँ नहिं न्यारा ।
सुन यहु केसव नियम हमारा ॥
जहाँ तुम गिरीवर तहाँ हम मोरा ।
जहाँ तुम चंदा तहाँ मैं चकोरा ॥ १ ॥
—स० ना० हिं० प०, पद १६१ ।
२ तेरी गति तू ही जाने । अल्प जीव गति कहा बपाने । टेक ।
जैसा तू कहिये तैसा तूं नाही । जैसा तू है तैसा आद्धि गुसाई ॥ १ ॥
लून नीर घे नाहिं न्यारा । ठाकुर साहिब प्राण हमारा ॥ २ ॥
साध की संगति संत सू भेटा । प्रणवत नामा राम सहेटा ॥ ३ ॥
—स० ना० हिं० प०, पद १४ ।
३. इन्द्रो मायाभि पुरुरूप ईयते । ऋग्वेद ६ । ४७ । १८ ।