सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १८५
पुर ही मेरा तीर्थस्थान है क्योंकि यहाँ अदृश्य, अव्यक्त निर्गुण परब्रह्म का निधान
विट्ठल के रूप में सदैव सामने रहता है। पहले भी महान् भक्तों ने यह निधान प्राप्त
किया था। खेचरजी ने नामदेव को निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति कराई ।१ निर्गुण की
अनुभूति होने पर विसोबा खेचर ने नामदेव से सगुण रूप विट्ठल की भक्ति करने के लिए
कहा । इसका कारण यही है कि विट्ठल परब्रह्म के प्रतीक हैं।
परमार्थ ज्ञान की प्राप्ति के कारण मुक्ति तो उनको मिल ही गई थी परन्तु
'ज्ञानादेवतु कैवल्यम् ।' अर्थात् केवल ज्ञान के कारण प्राप्त होने वाली (केवल परब्रह्म
रूप होकर रहने की) कैवल्य मुक्ति नामदेव नहीं चाहते थे। मुक्ति प्राप्त होने पर भी
वे भक्ति-सरिता में अवगाहन करना चाहते थे।
नामदेव ने मुक्ति-सहित भक्ति के निम्नलिखित लक्षण बताये हैं-
(१) परमात्मा के निर्गुण तथा सगुण दोनों रूपों के प्रति समान आकर्षण ।
(२) वृत्ति-सहित मन से चिदाकाश में डुबकी लगाना ।
(३) देह की सुध-बुध भूल जाना ।
(४) ब्रह्मानन्द सहोदर आनन्द की इस अवस्था में कीर्तन करते हुए भावावेश
में आकर गाना तथा नाचना ।२
नामदेव ने अपने अनेक अभंगों में परमात्मा के निर्गुण-परक ज्ञान से मुक्ति का
तथा उसी के सगुण-स्वरूप की भक्ति का वरदान माँगा है-'अन्तःकरण में तेरा त्रिगुण,
निराकार तथा अव्यक्त रूप और बाहर तेरा सगुण, साकार, व्यक्त रूप देखकर मेरा
मन उन्मन हुआ। सन्तों की कृपा से तेरी अंतर्बाह्य व्यापकता मुझे प्रतीत हुई और मुझ
में परिवर्तन हुआ। नामदेव याचना करते हैं कि हे परमात्मा ! तुझमें और मुझमें
१. माझे तीर्थ क्षेत्र पंढरी पे जाण । उघडे निधान दृष्टीपुढे ।
मागे थोर थोरी हेचि पै साधिले । नामयासि दिधले खेचर याने ॥
—सकल संत गाथा, अभंग १८०७ ।
२. आम्हां वैष्णवांचा कुलधर्म कुळीचा । विश्वास नामाचा सर्व भावें ॥
तरी त्याचे दास म्हणतां लाघिजे । निर्वासना कीजे चित्त आधी ॥
गाऊँ नाचूँ आम्ही आनंदे कीर्तनीं । भक्ति मुक्ति दोन्ही मागूँ देवा ॥
वृत्ति-सहित मन बुडे प्रेम डोही । नाठवती देही देहभाव ॥
सगुणो निर्गुणो एकच आवडी । मनें दिली बुडी चिदाकाशी ॥
नामा म्हणे देवा ऐसी मज सेवा । द्यावी जी केशवा जन्मोजन्मी ॥
—सन्त वचनामृत; रा० द० रानडे, पृ० १०४ ।