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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 332 में से

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पृष्ठ 181

१८६ नामदेव की हिन्दी कविता
स्वामी-सेवक भाव हो।१'
नामदेव कहते हैं—'मैंने मोक्ष की कथा सुनी है। उससे मुझे भय लगता है।
मैं केवल मोक्ष, समाधि अथवा स्वर्ग सुख नही चाहता। हे पांडुरंग। अभयदान देकर
मुझे अपने प्रेम की निशानी दो।
'मैं उस मुक्ति को लेकर क्या करूँ जिससे तेरा वियोग हो। वासना-रहित मन
से तेरा स्मरण किया तो तू मुझे सायुज्य मुक्ति देगा। फिर हे वैकुठनायक ! भक्ति का
आनंद मुझे कैसे प्राप्त होगा ?'२
'हे परमात्मा ! पंचेंद्रियों के विषयों के कारण चित्त में जो खलबली मचती है
उसको शांत कर अपने प्रेम-रस के लिए मेरे मन में रुचि निर्माण कर।३
'हे विट्ठल ! तुम कहोगे कि नामदेव इस भक्ति सुख के प्रेम को लेकर क्या बैठे
हो ? 'तत्वमसि' इस महावाक्य के अनुसार तुझे अनुभूति होगी कि तू शुद्ध बुद्ध चैतन्य
है, तू सर्वगत है, सर्वव्यापी है। इस अद्वैत अवस्था में क्रिया, कर्म, कर्ता, भक्त, भजन,
पूजिता, ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, ध्याता, ध्यान, ध्येय आदि जो भेद-मूलक त्रिपुटियाँ हैं, वे
मिथ्या हैं। तेरे लिए ये साधन अनावश्यक हैं। नामदेव कहते हैं—हे पांडुरंग। मैं
केवल्य मुक्ति नही चाहता। वर दे कि जन्म-जन्मांतर में मैं तेरी सेवा करूँ। अपनी
१. बाहेरी भीतरी तुजचि मी देखे। चित तेणे सुखे बेहावले।
सन्त संगे मज पालट हा झाला। पाहता विट्ठला रूप तुझे।
मी-पणा सहित आनन्दी बुडाले। न निघो काही केले चित माझे।
नामा म्हणे एक उरली से वासना। स्वामी सेवकपणा देई देवा॥
—सकल सन्त गाथा, अभंग १६६८।
२. ऐके मोक्षाची मी कथा। तेणे भय वाटे चित्ता।
नामा म्हणे अभयदान। देऊनि सांगे प्रेम खूण॥
—अभंग १७२०।
३. मुक्ति पद भो गा नभिलाषी न चित्ती।
भणी अंतरती पाय तुझे ॥
—अभंग १७३७।
४. इंद्रियाचे व्यापार अवघेचि तोडी।
प्रेम रस गोडी देई मातें ॥
—अभंग १७२१।