सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १७६
भवसागर को पार करना दुस्तर है । नामदेव कहते हैं कि संसार से मेरा जी
ऊब गया । काल (यम) मेरे समक्ष उपस्थित है और वह मुझे अपना ग्रास (निवाला)
बनाना चाहता है । १
ऐसे दुःखपूर्ण संसार से ऊबकर नामदेव कहते हैं कि 'हे विठ्ठल ! तूने मुझे भव-
सागर में ढकेल दिया । वे आर्त स्वर से विनय करते हैं कि जन्म-मृत्यु के बीज अज्ञान को
जड़ से नष्ट कर दे ।' २
अभेद भक्ति
ज्ञानेश्वर 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस उपनिषत्प्रणीत अद्वैत सिद्धात के पुरस्कर्ता थे ।
उनका विश्वास था कि अद्वैत की एकता का संदेश घर-घर पहुँचाने के लिए 'गीता' एक
उत्कृष्ट साधन है । इस प्रकार संत ज्ञानेश्वर के अनुसार भगवद गीता भागवत धर्म का
आद्य तथा प्रमुख अद्वैत प्रतिपादक ग्रन्थ है ।
पंढरपुर का भक्ति संप्रदाय भी अद्वैती है । अतः ज्ञानेश्वर के समान नामदेव भी
अद्वैती है । ज्ञानेश्वर के अनुसार अद्वैत में भक्ति है यह बात न तो सिद्ध करने की है
और न उसका वर्णन ही किया जा सकता है, यह स्वय केवल अपने अनुभव से संबंध
रखता है । अपने 'अमृतानुभव' में वे इसके लिए एक दृष्टांत भी देते हैं—'जैसे एक ही
चट्टान में गुफा, मंदिर, मूर्ति एवं भक्त के भी आकार खुदवाये जाते हैं वैसे ही हमें अभेद
भक्ति का व्यवहार भी समझ लेना चाहिये तथा विश्व एवं विश्वात्मक देव को अभिन्न
मानकर अभेद-भक्ति करनी चाहिए ।' ३
इस प्रकार महाराष्ट्र के संतो की वास्तविक साधना निर्गुण भक्ति ही प्रतीत
होती है और उनकी रचनाओं में जो कुछ उदाहरण सगुण भक्ति के मिलते हैं वे उसके
लिये किये गये प्रारंभिक प्रयोगों जैसे जान पडते है तथा केवल उसी दृष्टि से उनका
कोई महत्त्व भी हो सकता है ।
१. नामा म्हणे थोर उवगलो संसारा ।
काल वैरी पुढ़ारा ग्रासू पाहे ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १४२४ ।
२. नामा म्हणे नको पाहो माझी लाज ।
संसाराचे बीज मूल खुड़ी ॥
—सकल संत गाथा, अभङ्ग, १६५६ ।
३. देव देऊल परिवारु । कीजे कोरूनि डोंगरु ।
तैसा भक्तीचा वेव्हारु । कां न व्हावा ?
—हिन्दी साहित्य का बृहत् इतिहास (चतुर्थ भाग) में उद्धृत, पृ० ८ ।