सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० नामदेव की हिन्दी कविता
उपनिषद् मे कहा गया है—इस आत्मा की खोज करनी चाहिए ।'१ तथा आत्मा है, इस
प्रकार उसकी उपासना करनी चाहिए ।२ यहाँ आत्मा को परमार्थ सत्य एवं मूल तत्त्व
माना गया है ।
शांकर वेदांत के अनुसार जिस तत्त्व का व्यतिरेक अथवा बाध नही हो सकता,
वह अन्वयी तत्त्व ही सत्य एव नित्य है ।३ आचार्य शंकर कहते है कि कोई भी व्यक्ति
अपने अस्तित्व से इनकार नही कर सकता । मे हूँ, यह अनुभव सभी को होता है ।'४
वही ज्ञाता है और वही ज्ञेय है । उसे जानने के लिए किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं । वह
स्वयं सिद्ध है । आत्मा अकर्ता है, अभोक्ता है और सुख दुख से परे है । सुख दुख की
समस्त प्रतीतियाँ अंत करण, शरीर, इन्द्रियां आदि उपाधियों के संबंधो के कारण है, वे
आत्मा के निजी स्वरूप में नही है ।'५
स्वरूप लक्षण में आत्मा नित्य, मुक्त, अजन्मा, निराकार, अमर, अनन्त, सर्व-
व्यापी तथा चैतन्य-स्वरूप है ।
तटस्थ-लक्षण अथवा आत्मा की व्यावहारिक प्रतीति जीव होती है । अविद्या
जीव का अज्ञान है । यही आत्मा जब नाम-रूप की उपाधि से युक्त होता है, तब जीव
कहलाता है । जिसे व्यक्ति कहा जाता है वही जीव है । जब अन्त करण आत्मा को नाम
रूप की उपाधि से सीमित कर देता है तो इस चैतन्य को साक्षी कहा जाता है और
जब अन्त.करण व्यक्तित्व का निर्माण करता है तो इसे जीव कहा जाता है । जीव का
ही सम्बन्ध शुभ-अशुभ कर्मों के फल से होता है ।'६
जीव सम्बन्धी नामदेव के विचार
जीव और ब्रह्म का सम्बन्ध—नामदेव जीव को ब्रह्म का अंश मानते हैं । वे
कहते हैं कि 'हे माधव ! तुम मुझसे बाजी क्यो नही लगाते हो ? (तुम बताओ कि
१. आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः । —बृहद० २ । ४ । ५ ।
२. आत्मेत्येवोपासीत । —बृहद्० ६ । ४ । ७ ।
३. एक रूपेण हि अवस्थितो योऽर्थः सह परमार्थः ।
—शांकर भाष्य २ । १ । २ ।
४. सर्वो ह्यात्मास्तित्वं प्रत्येति न नाहम् अस्मीति ।
—शांकर भाष्य १ । १ । १ ।
५. तस्माद् उपाधिधर्माध्यासे नैवात्मन कर्तृत्वम् न स्वाभाविकम् ॥
—शांकर भाष्य, २ । ३ । ४० ।
६. अन्त.करणविशिष्टो जीव अन्त.करणोपहिता साक्षी ।
—वेदान्त परिभाषा, पृ० १०२ ।