सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव की दार्शनिक विचारधारा १६६
तुमसे हुई है। तुम घट-घट वासी हो।’¹
‘भगवान वैसे ही प्राणिमात्र में अन्तर्यामी है जैसे दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब दिख-
लाई पड़ता है। ब्रह्म घट घट वासी है। ज्ञान हो जाने पर उसका दिव्य प्रकाश छिपता
नहीं।’²
जीवात्मा (आत्म दर्शन)
आत्म परम्परा—मनुष्य के शरीर के भीतर एवं बाहर जिस सत्त्व का प्रकाश
है, उसे जानने का प्रयास सदा से होता आ रहा है। प्राचीन काल ही से मनुष्य की
चेष्टा रही है कि यह आत्मा क्या है, उसका स्वरूप क्या है? उसकी गति-प्रगति आदि
क्या है इसका परिचय प्राप्त करे।
जीवात्मा के स्वरूप का परिचय ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंत्र ‘द्वासुपर्णा’ में व्यक्त किया
गया है। इस मंत्र में कहा गया है—‘सदा साथ रहने वाले, परस्पर सख्य भाव रखने
वाले दो पक्षी एक ही वृक्ष का आश्रय लेकर रहते हैं। उनमें एक जीवात्मा उस वृक्ष के
फलों का उपभोग करता है किंतु दूसरा उनका उपभोग न करता हुआ साक्षी रूप में
केवल देखता रहता है।’³
उपनिषदों में आत्म तत्त्व की पूर्ण प्रतिष्ठा है। यहाँ ब्रह्म और आत्मा को
ही ध्वनित किया गया है। यह आत्मा ब्रह्म है।⁴ मैं ब्रह्म हूँ।⁵ यह पुरुष स्वयं ज्योति
है।⁶ यह आत्मा ब्रह्म है, सबका अनुभव करने वाला है।⁷
आत्म-ज्ञान को उपनिषदों में जीवन का चरम लक्ष्य माना गया है। बृहदारण्यक
१. जामै सकल जीव की उतपति। सकल जीव मै आपजी।
माया मोहु करि जगत भुलाया। घटि घटि व्यापक बापजी॥
—सं० ना० हि० प०, पद ४८।
२. ऐसो रामराइ अंतरजामी। जैसे दरपनमाहि बदन परवानी।
बसै घटाघट छीप न छीपै। बंधनमुकता जानु न दीसै॥
—पंजाबातील नामदेव, पद ५८।
३. द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥
—ऋग्वेद १। १६४। २०।
४. अयमात्मा ब्रह्म। —बृहद० २। ५। १६।
५. अहं ब्रह्मास्मि। —बृहद० १ ४। १०।
६. अत्रायं पुरुषः स्वयं ज्योतिः। —बृहद० ४। ३। ६।
७. अयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः। —बृहद० २। ५। १६।