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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १०६
है संयोग की आनंदावस्था का चित्रण और तीसरा है वियोग के करण विदग्ध रूप का
चित्रण ।
सिद्ध संप्रदाय
सिद्ध साहित्य की विचार धारा का संत साहित्य पर विचार और शैली दोनों
दोनों ही दृष्टियों से बड़ा प्रभाव है। भगवान् बुद्ध द्वारा अनुप्राणित तथा अशोक द्वारा
प्रचारित बौद्ध धर्म को आगे चलकर वज्रयान और मंत्रयान द्वारा कलंकित किया गया ।
ये वज्रयानी सिद्ध रहस्यात्मक उक्तियाँ कहा करते थे । इनका धर्म 'महासुखवाद' था ।
इनकी अटपटी वाणी - 'काया तरुवर पंच बिडाल', 'गंगा जमुना माँझि बहेरी एक
नाडी' आदि योग की ओर आध्यात्मिक ढंग से संकेत करती हैं। इन्हीं की चलाई प्रणाली
से संत साहित्य की सृष्टि हुई । इसी परंपरा का विकसित रूप गोरखनाथ के नाथ
संप्रदाय में तथा व्यापक एवं पुष्ट रूप ज्ञानाश्रयी निर्गुण भक्ति शाखा में पाया जाता है,
जहाँ संत काव्य अपनो पराकाष्ठा पर पहुँचा प्रतीत होता है ।
वज्रयान के सिद्धों और निर्गुणयों में यह समता है कि दोनों ही ने तत्कालीन
काव्य भाषा की उपेक्षा कर जन भाषा में ही अपनी रचनाएँ कीं । दोनों ने अन्तः
साधना पर जोर दिया और पण्डितों का तिरस्कार कर शास्त्रों को निरर्थक ठहराया ।१
शून्यवाद, सुरति, निरति, इडा, पिंगला, सुपुम्ना आदि को इंगला, पिंगला,
सुखमना आदि बनाकर कबीर ने इसी मत से ले लिया है। सिद्धों ने जिसे 'काया तरुवर
पंच विडाल' कहा केवल उन्हो पाँच विकारों को निर्गुण धारा के संतों ने भी लिया ।
शैली की दृष्टि से भी सिद्धों की 'संधा भाषा' में जो 'कूट' और प्रतीक हैं उन्हीं से
कबीर के रूपक और उलटवासियों का निर्माण हुआ है !
इस प्रकार वज्रयानी सिद्धों तथा वाममार्गियों ने नाथ पंथ का तथा नाथ पंथी
योगियों ने कबीर द्वारा प्रवर्तित निर्गुण सन्त मत के प्रचार के लिए पहले से ही रास्ता
तैयार कर दिया था ।
नाथ पंथ
भारतीय धर्म साधना में दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दी में जिन विभिन्न साधनाओं
का बोलबाला था उनमें नाथ पंथ की साधना पद्धति का स्वर अत्यन्त प्रभावशाली रहा
१. (अ) अवणा गमण ण तेन विखंडिअ ।
तो विणिलज्ज भणइ हउं पंडित ॥—सरहपा,
(आ) मै कहता हूँ आँखिन देखी । तू कहता है कागद लेखी । कबीर

११० नामदेव की हिन्दी कविता
जायेगा। नाथ पंथ की साधना को 'हठयोग' की साधना भी कहा गया है जो योग
दर्शन का ही एक प्रकार है।
सन्त सम्प्रदाय का सीधा सम्बन्ध नाथ सम्प्रदाय से है। सन्त सम्प्रदाय ने सिद्ध
सम्प्रदाय से आई हुई नाथ सम्प्रदाय की विचारधारा मूल रूप से ग्रहण की। नाथ
सम्प्रदाय की आचारनिष्ठा, विवेक-सम्पन्नता, अंध विश्वासों को तोड़ने की उग्रता एवं
परम्परागत कर्मकांडों की निरर्थकता सन्त सम्प्रदाय में सीधी चली आई। यहाँ तक कि
उलटबासियों की कुतूहलजनक शैली भी सन्तों को नाथ सम्प्रदाय से ही प्राप्त हुई।
डॉ० कोमलसिंह सोलंकी¹ के अनुसार नाथ पंथ की मूल प्रवृत्तियों को हम
संक्षेप में इस प्रकार रख सकते हैं—
(१) चारित्रिक उत्कर्ष और पवित्रता का आग्रह
(२) स्मार्त आचारों की अवहेलना
(३) निर्गुण भावना में विश्वास
(४) योग साधना का आध्यात्मिक स्वर
(५) ज्ञान और अक्खड़ता की प्रधानता
(६) लोक भाषा द्वारा अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत आदर्श की प्रतिष्ठा।
निर्गुण सन्त कवियों की वाणियों में जिन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग है उनमें
जो रूढ़ि-विरोधिता, खण्डनात्मक वृत्ति और अक्खड़ता है वह सब नाथ पंथी योगियों
और सिद्धों की ही देन है। किन्तु हिन्दी का निर्गुण सन्त काव्य ठीक वही नहीं है जो
नाथ पंथी योगियों की रचनाओं में उपलब्ध है। निर्गुण सन्त कवि भक्ति के मर्मस्पर्शी
गायक हैं। योग और ज्ञानमूलक अभिव्यक्ति के साथ भक्ति भावना का अनुकूल वाता-
वरण पाकर निर्गुण सन्त काव्य लोक-जीवन में जिस व्यापक प्रभाव को लेकर अवतरित
हुआ, वह उसकी अपनी विशेषता ही मानी जायगी। फिर भी सन्त सम्प्रदाय के लिए
अनुकूल वातावरण प्रस्तुत करने में नाथ पंथ का महत्त्वपूर्ण योग है इसे कोई अस्वीकार
नहीं करेगा।
वैष्णव धर्म
मध्ययुग में वैष्णव धर्म का बहुत अधिक प्रचार था। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण
ग्रन्थ भागवत है। भागवत में विविध प्रकार के अवतारों की चर्चा मिलती है। अवतार-
वाद को सर्वाधिक मान्यता देते हुए भी भागवत् निर्गुण ब्रह्म के महत्त्व को नहीं भूली।
सन्तों को वैष्णव धर्म का अवतारवाद का यह सिद्धांत मान्य न था।
१. नाथ पंथ और निर्गुण सन्त काव्य, पृष्ठ १३०।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १११
वैष्णव धर्म में विष्णु और उनके भक्तों के नामों की बड़ी प्रतिष्ठा है । भगवान्
विष्णु के सहस्र नाम बतलाये गये हैं। सन्तों ने अपने निर्गुण ब्रह्म के लिए हरि, गोविंद,
गोपाल, माधो, राम आदि सैकड़ो वैष्णवी अभिधान प्रयुक्त किये हैं। इन समस्त अभि-
धानो में उन्हे राम, गोविंद और हरि विशेष प्रिय थे। सन्तों द्वारा भगवान् के इन
वैष्णवी नामो का प्रयोग उन पर वैष्णव धर्म के प्रभाव के परिणाम-स्वरूप ही है ।
वैष्णव धर्म की सदाचार-प्रियता का सन्तो पर बहुत प्रभाव पड़ा । निर्मलता
तथा सात्विकता की अभिव्यक्ति उन्होंने विविध सद्गुणों के आचरण पर बल देकर की
है ।१ वास्तव में सन्त वैष्णव धर्म की सदाचरण-प्रियता और सात्विकता से बहुत अधिक
प्रभावित थे।
सन्तों ने वैष्णव धर्म के अनुकरण पर भक्ति को अन्य साधनो की अपेक्षा सर्व-
श्रेष्ठ ठहराया है ।२ प्रेम भगति और भाव भगति का उपदेश तो उन्होंने अपनी रचनाओ
में सर्वत्र दिया है ।३ यहाँ पर हम केवल इसी बात पर बल देना चाहते है कि
वैष्णवो की सदाचरण-प्रियता और प्रेम भगति ने सन्तों को अत्यधिक प्रभावित किया है ।
नामदेव की हिन्दी कविता और निर्गुण काव्य की प्रवृत्तियाँ
समस्त निर्गुण काव्य का अनुशीलन और अध्ययन करने पर कुछ सामान्य
विशेषताएं समान रूप से सभी सन्तो मे प्राप्त होती है जिन्हें हम निर्गुण काव्य की
प्रवृत्तियाँ कह सकते हैं। नामदेव की रचनाओ में ये सारी प्रवृत्तियाँ परिलक्षित होती
हैं। नीचे इन्ही का विवेचन संक्षेप में प्रस्तुत किया जा रहा है—
(१) निर्गुण भावना
यह निर्गुण भावना उपनिषद् काल से चली आई है। नामदेव ने भी इसे
अपनाया है। निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप का निरूपण करते हुए वे कहते है—
वह निर्गुण ब्रह्म अनेक और एक सब कुछ है। मैं जिधर देखता हूँ उधर वही
है । 'माइया मोहिया' बिरला ही इस बात को समझ सकता है । वह व्यापक राम शत
१. निर्मल तन मन आत्मा निर्मल मनसा सार ।
निर्मल प्राणी पंच करि दादू लंघे पार ॥
—दादू बानी भाग, १ पृ० ४ ।
२. बिना भक्ति थोथे सभी जोग जुक्ति आचार ।
सहजोबाई की बानी, पृ० ३२ ।
३. भाव भगति सूँ हरि न अराधा । जनम मरन की मिटी न साधा ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृ० २४४ ।

११२ नामदेव की हिन्दी कविता
सहस्र मणियों में एक सूत्र की भाँति सब में ओत-प्रोत है।१ जिस प्रकार तरंग, फेन
और बुदबुद जल से भिन्न नहीं हैं उसी प्रकार संसार के नाना रूप भी उस एक ही के
रूप हैं जो सब में समाया हुआ है। यह संसार परमात्मा की लीला है। विचार करने
पर भी वह भिन्न सिद्ध नहीं होता। वस्तुतः सब कुछ गोविन्द-मय है। केवल वह एक
मुरारी घट-घट वासी है।२
सर्वत्र राम ही राम है। घट-घट में वही बोल रहा है। स्थावर, जंगम, कीट,
पतंग सब में वही समाया हुआ है। एक ही मिट्टी से हाथी, चींटी तथा नाना प्रकार की
वस्तुएँ बनती हैं। निष्काम की अथवा अनासक्त की दशा उपलब्ध होने पर साम्य भाव
आ जाता है और स्वामी-सेवक भाव जाता रहता है।३
नामदेव का गोविंद (विट्ठल) निराकार एवं सर्वव्यापी है। ब्रह्म ज्ञानी ही इस
बात को समझ सकता है। नामदेव के अनुसार हिन्दू अन्धा है और मुसलमान काना है
(दोनों में यथार्थ को देखने की क्षमता नहीं रह गई है)—इन दोनों में ज्ञानी चतुर है।
हिन्दू मन्दिर में भगवान् को पूजा करता है और तुर्क मसजिद में। नामदेव कहते हैं—
मैं तो ऐसे भगवान् की आराधना करता हूँ जो न मन्दिर में है न मसजिद में।४
१. मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि-गणा इव। गीता ७, ७।
२. एक अनेक बिआपक पूरक जत देखउ तत सोई।
माइआ चित्र विचित्र बिमोहित, बिरला बूझै कोई॥१॥
सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंदु बिनु नहि कोई।
सूतु एकु मणि सत सहस्र जैमे ओति पोति प्रभु सोई॥२॥
जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जलतें भिन्न न होई।
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला, विचरत आन न होई॥३॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १५०।
३. सभै घट रामु बोले रामा बोलै। राम बिना को बोले रे॥१॥
एकल माटी कुंजर चीटी भाजन हे बहु नाना रे।
असथावर जंगम कीट पतंगम घटि-घटि रामु समाना रे॥२॥
एकल चिंता राखु अनंता अउर तजहु सभ आसा रे।
प्रणवै नामा भए निहकामा को ठाकुर को दासा रे॥३॥
—पंजाबातील नामदेव, पृ० १२१।
४. हिन्दू अन्धा तुरकू काणा दोहाते गियानी सिआणा।
हिन्दू पूजे देहुरा मुसलमाणु मसीत॥
नामे सोई सेविआ जह देहुरा न मसीत॥
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पृ० २०८।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११३
ठाकुर को स्नान कराने के लिए मैं जल से भरा घड़ा लाया, उस जल में
बयालीस लाख जीव रहते हैं, जिनमें भगवान् का निवास है, फिर मैं उन्हें कैसे स्नान
कराऊँ ? मैं जिधर भी जाता हूँ उधर भगवान् है जो परमानन्द में लीन हो सदैव
लीलाएँ करता है। इधर भगवान् है, उधर भगवान् है, भगवान् के बिना संसार में कुछ
भी नहीं है। नामदेव कहते हैं—हे भगवन् ! पृथ्वी के जल-थल आदि सभी स्थानों में
तुम व्याप्त हो ।¹
ज्ञानी भक्त सब भक्तों में श्रेष्ठ होता है। अपना व्यक्तित्व अपने इष्टदेव के चरणों
पर समर्पित कर देने पर वह स्वयं ईश्वर हो जाता है। उसका अपना अलग अस्तित्व
नहीं रहता । इसीलिए कहा गया है कि 'जीवो भूत्वा शिवं यजेत्' अर्थात् स्वयं विट्ठल
होकर उसकी भक्ति करना ही पराकोटि की भक्ति है। 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' की अनु-
भूति होने पर नामदेव कहने लगे कि केवल मन्दिर ही में परमात्मा का वास नहीं है।
वह सारे संसार में व्याप्त है। अतः मैं फूलों तथा पत्तियों से उसकी पूजा न करूँगा।
हरि की शरण में जाने पर आवा-गोन के फेर से मेरी मुक्ति हुई।²
कबीर तथा अन्य सन्त कवियों की रचनाओं में भी यह प्रवृत्ति पाई जाती है।
सन्त काव्य धारा की मूल भावना निर्गुण की उपासना है। सन्त कवियों ने भगवान् के
सगुण और निर्गुण इन दो रूपों में से निर्गुण रूप का निर्वाचन किया। उनका निर्गुण
बौद्ध साधकों के शून्य से पृथक् है। वह संसार के कण-कण में व्याप्त है, वही प्रत्येक
साँस में है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, वह केवल अनुभवगम्य ही है। उसी
को गूँगे का गुड़ कहा गया है। कबीर के अनुसार वह पुस्तकीय विद्या से प्राप्त नहीं हो
सकता, वह प्रेम से प्राप्त है।³
१. आनीले कुंभ भराईले उदक ठाकुर कउ इसनानु करउ ।
बइआलीस लख जी जल महि होते बीठलु भैला काई करउ ॥ १ ॥
जत्र जाउ तत बीठलु भैला । महा आनन्द करे सद केला ॥ २ ॥
ईभे बीठलु ऊभे बीठलु बीठल बिनु संसारु नही ।
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिओ तू सरब मही ॥ ३ ॥
—पञ्जाबातील नामदेव, पृ० ८३ ।
२. पातो तोडि पूजूं देवा । देवलि देव न होई ।
नामा कहै मैं हरि को सरना । पुनरपि जनम न होई ।
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६५ ।
३. अकथ कहानो प्रेम की कछु कहो न जाई ।
गूँगे केरी सरकरा बैठे मुसकाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १२० ।
८

११४ नामदेव की हिन्दी कविता
परम तत्त्व की अभिव्यक्ति एक दुर्गम कार्य है । सन्तों ने इस बात को स्वीकार
किया है कि वह जैसा कहा जाता है वैसा ही उसका पूर्ण रूप में भी होना सम्भव नहीं
है, वह जैसा है, वैसा ही है ।१
वास्तव में परम तत्त्व का कोई उपयुक्त विचार ही नही कर सकता । गुरु
नानक के अनुसार वह वाणी और बुद्धि दोना की सीमा से परे है ।२
दादू उस अव्यक्त ब्रह्म को बाहर और भीतर प्रत्येक दिशा में देखते हैं । उनके
अनुसार उसको छोड़कर दूसरा कुछ है ही नहीं ।३
सहजोबाई ने एक स्थान पर लिखा है कि उसका कोई नाम नहीं है फिर भी
सब नाम उसी के है । उसका कोई रूप नही है फिर भी सब रूप उसी के हैं ।४
दादू ने उस नूर-स्वरूपी (ज्योति स्वरूप) ब्रह्म का जिससे ये सब खेलत है,
सुंदर वर्णन किया है ।५
संत रज्जब ने भी घट में ही उस व्यापक ब्रह्म को देखा है ।६
यद्यपि उस पर ब्रह्म को यथार्थ रूप में कोई नही जान सकता तब भी संतों ने
१. जस कहिये तस होत नही, जस है तैसा सोई ।
कहत सुनत सुख उपजै, अस परमारथ होई ॥
—कबीर ग्रन्थावली पृ० २३१
२. सोचे सोच न होवई, जे सोचे लखवार ।
—ग्रन्थ साहब, पृ० १
३. दादु देखौ दयाल को बाहिरि भीतरि सोई ।
सब दिसो देखौ पीव को दूसर नाही होई ॥
—दादू दयाल की बानी भाग १, पृ० २३ ।
४. नाम नही और नाम सब, रूप नही सब रूप ।
—सन्त सुधासार, पृ० १६१ ।
५. नूर सरीखा नूर है तेज सरीखा तेज ।
जोति सरीखी जोति है दादू खेले सेज ।
—दादू दयाल की बानो, भाग १ पृष्ठ ५६ ।
६. सब घट घटा समानि है, ब्रह्म बिज्जुली मांहि ।
रज्जब चमकै बौन में सो समझै कोई नाहिं ॥
—सत बान्य, पृष्ठ ३३६ ।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११५
उसे तत, परम तत, परम पद, अभै पद, सहज, अं त, सीव, ब्रह्म आदि कई नाम
दिये हैं।१
कबीर के अनुसार ब्रह्म देश, काल और अवस्था से परे अर्थात् सकल अतीत
है। उसे व्यक्त करने के लिए उन्होंने अनेक प्रकार की चेष्टाएँ कीं किन्तु फिर भी
उन्हें उसमें सफलता नहीं मिली।२
(२) गुरु महिमा—हृदय को शुद्ध रखने के लिए कुछ कार्य विधेय हैं और कुछ
वर्ज्य हैं। संत काव्य में बार-बार हृदय की पवित्रता के लिए विधि निषेध के अंतर्गत
गुण-ग्रहण और दोष परिहार पर उपदेश दिये गये हैं। विधि निषेध का वास्तविक ज्ञान
तब तक नहीं होता जब तक कि गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त न हो। निर्गुण संप्रदाय में
गुरु का स्थान सर्वोपरि है। नवीन साधकों के लिए तो गुरु परमेश्वर से भी बड़ा हुआ
करता है क्योंकि गुरु कृपा द्वारा ही शिष्य भगवत्कृपा की ओर उन्मुख होना सीख
पाता है।
जिस प्रकार संपूर्ण संत साहित्य में गुरु को सर्वश्रेष्ठ माना गया है उसी प्रकार
नामदेव ने भी गुरु का स्थान सर्वोपरि माना है। सत्य का अन्वेषण और ज्ञान की
प्राप्ति, बिना गुरु-कृपा के संभव नहीं है। नामदेव के लिए गुरु का शब्द बैकुंठ को सीढ़ी
के समान है।३ वे अपने मन को चेतावनी देते हुए दुःख का कारण भी स्पष्ट कर देते
हैं—तूने अनेक बार पशु होकर मानव देह धारण किया। चौरासी लाख योनी में भ्रमण
करता रहा परन्तु कही भी तुझे शांति नही मिली। सत् गुरु की शरण में जाकर तूने
राम नाम का उच्चार नही किया।४
१. कबीर साहित्य की परख—परशुराम चतुर्वेदी, पृष्ठ ६१।
२. अलख निरंजन लखै न कोई। निरभै निराकार है सोई॥
सुंनि अस्थूल रूप नहीं रेखा, दिस्टि अद्रिस्टि छिप्यो नहीं पेखा॥
वरन अवरन कथ्यौ नहि जाई, सकल अतीत घट रह्यो समाई॥
आदि अंत ताहि नहीं मधे। कथ्यौ न जाई आहि अकथे।
अपरंपार उपजै नहीं बिनसै। जुगति न जानिये कहिये कैसे॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ २३०।
३. गुरू को शब्द बैकुंठ निसरनी। —संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २६।
४. अनेक बार पसु ह्वै अवतर्यो।
लष चोरासी भरमत फिरयो ॥ १ ॥
पायो नही कही विश्राम।
सत् गुरु सरनि कह्यो नही राम ॥ २ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १२४।

११६ नामदेव की हिन्दी कविता
यह निश्चित है कि बिना गुरु प्रसाद के कुछ प्राप्त नही होता ।¹
सद्गुरु की कृपा से ही नामदेव ने साधु का जीवन ग्रहण किया ।²
'गुरु कृपा से जीव के सभी संशय मिट जायेंगे, वह यम यातना से मुक्त हो
जायेगा। उसे निर्वाण पद प्राप्त होगा। गुरु को छोड़कर वह कहो अन्यत्र न जायेगा।
नामदेव कहते हैं कि में तो केवल गुरु ही की शरण में जाऊँगा जिससे सभी प्रकार का
हित संभव है।'³
ईश्वरोन्मुखता के कारण नामदेव का जीवन सफल हो गया जिससे दुख के
स्थान पर वह सुख की अनुभूति हुई है।⁴
अपने एक कूटामक पद में नामदेव कहते हैं कि सद्गुरु ने उनको निर्वाण पद
का मार्ग बताया ।⁵
अपने गुरु विसोबा खेचर का उन्होंने बड़ी श्रद्धा से स्मरण किया है। कहते हैं कि
उनके कृपा-प्रसाद ही से मैने तुलसी की माला पाई। उन्होंने सदगुर होकर मुझे परम
तत्त्व का साक्षात्कार कराया।⁶
१. प्रणवत नामदेव गुर प्रसादे। पाया तिनही सुहावा ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४।
२. गुरु के मेहेर रो नामा भए साधु ।
देखत रौ लगे जन हे भोदु ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १८५।
३. जउ गुरदेव त संसा टूटे।
जउ गुरदेउ त भउ जल तरे।
जउ गुरदेव न जनमि न मरे।
बिनु गुरु देउ अवर नही जाई।
नामदेउ गुरु की सरनाई।
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद २१६।
४. सफल जनमु मोकउ गुरु कीना।
दुख बिसारि सुख अंतरि लीना ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०४।
५. सत् गुरु कथीया पद निरवाना।
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ७६।
६. खचर भूचर तुलसी माला गुर परसादी पाइआ।
नामा प्रणवे परम तव है सति गुर होइ लखाइआ ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०६।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११०
निमिष मात्र में नर किस प्रकार नारायण हो जाता है यह बात मुझे सद्गुरु ने
बताई ।१
जिन पर सद्गुरु का अनुग्रह हुआ वे सब भव सागर पार हुए ।२
साधना का मार्ग रहस्यमय है । जब तक कोई ऐसा गुरु नहीं मिल जाता जो
साधना में सफलता प्राप्त कर चुका है तब तक कोई भी साधक अपनी साधना को
मर्यादित नहीं कर सकता । इसके अतिरिक्त गुरु के महत्त्व का एक कारण और भी
है । गुरु की आध्यात्मिक शक्ति शिष्य के लिए प्रबल प्रेरणा का कार्य करती है ।
कबीर ने गुरु के महत्त्व का वर्णन मुक्त कण्ठ से किया है । वे कहते हैं कि वे
लोग अंधे है जो गुरु के विषय में कुछ और कहा करते हैं । यदि परमेश्वर रुष्ट हो
जाय तो गुरु हमें बचा सकता है किंतु यदि स्वयं गुरु ही रुष्ट हो जाय तो फिर अपनी
रक्षा की कोई आशा नहीं रह जाती ।३
कबीर के लिए तो गुरु तथा गोविन्द दोनों में कोई भेद नहीं है । गुरु तो
गोविन्द का दूसरा रूप ही है । वे कहते हैं कि गुरु और गोविन्द दोनों मेरे समक्ष खडे
है मैं किसके चरण पकडूं ? मै तो अपने गुरु की ही बलिहारी जाऊँगा जिन्होंने मुझे
गोविन्द के दर्शन कराये ।४
गुरु को परमेश्वर-स्वरूप कहा जाता है । कबीर साहब ने कहा है कि गुरु और
गोविन्द में कोई अन्तर नहीं, केवल आकार मात्र से ही भिन्नता लक्षित होती है । अपने
अहं भाव का त्याग कर के जीते जी मर जाओ तभी तुम्हे वह परमेश्वर प्राप्त होगा ।५
१. नर ते सुर होई जात निमख में सतिगुर बुधि सिखलाई ॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०५ ।
२. जिह गुरु मिले तिह पारि उतारे ।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २१५ ।
३. कबीर ते नर अंध है गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठोर है गुरु रूठे नहिं ठौर ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ३१ ।
४. गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागों पांव ।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय ॥
—कबीर वचनावली, पृष्ठ ३० ।
५. गुरु गोविन्द तो एक है दूजा यहु आकार ।
आपा मेटि जोवित मरे, ता पावै करतार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ३ ।

११८ नामदेव की हिन्दी कविता
संत रज्जब कहते है कि गुरु-कृपा से ऐसी दृष्टि भास होती है जिससे शिष्य
प्रगट तथा गुप्त बात को पहचान सकता है जिसे न कोई देख सकता है न पहचान
सकता है ।¹
गुरु की महत्ता का वर्णन करते हुए नानक कहते हैं कि गुरु-कृपा से इंद्रादिक
देवता, सनक, सनंदन से तापस तथा तितने ही जन मुक्त हो गये ।²
शिष्य अपने गुरु की सेवा द्वारा मन को ज्ञान के अमृत में स्नान करा कर ६८
प्रधान तीर्थों का फल पा जाता है और उससे उपदेश रूपी रत्न भी पा लेता है ।³
सद्गुरु का मर कर जीने का रहस्य मुझे बहुत पसंद आया ।⁴
दादू दयाल गुरु की महिमा का वर्णन इस प्रकार करते हैं—मुझे सच्चा और
समर्थ गुरु मिल गया जिसने परम तत्त्व से मेरा परिचय करा दिया ।⁵
जो अपने आप जगत्-जाल में उलझ रहे हैं उनको सारा जगत् उलझा हुआ ही
दीखता है और जो स्वरूप दर्शन द्वारा सुलझ गया है उसे सब कुछ सुलझा हुआ दीखता
है । इस प्रकार का महाज्ञान अथवा महामन्त्र ही 'गुरु ज्ञान विचार' है ।⁶
दरिया साहब (मारवाड़ वाले) कहते हैं कि गुरु के उपदेश से सारा संशय
१. जन रज्जब गुर की दया दृष्टि परापति होय ।
परगट गुप्त पिछानिये जिनहि न दीखै दोय ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ३१५ ।
२. गुरु के सबदि तरे मुनि केते इंद्रादिक ब्रह्मादि तरे ।
सनक सनंदन तपसी जन केते गुरु परसादि पारि परे ।
—संत काव्य, पृष्ठ २१० ।
३. अंम्रितु नीरु गिआनि मन मजनु अठसठि तीरथ संगि गहे ।
गुरु उपदेसि जवाहर माणक, सेवे सिखु सो खोजि लहै ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २१० ।
४. सति गुरु मिले सुमरगु दिखाए । मरण रहण रंगु अंतरि भाए ।
गरबु निवारो गगन पुरु पाए ।
—संत काव्य, पृष्ठ २११ ।
५. साचा समरथ गुरु मिल्या, तिन तत दिया बताई ।
—सन्त काव्य, पृष्ठ २१६ ।
६. दादू आपा उरझै उरझिया दीसै सब संसार ।
आपा सुरझै सुरझिया, यहु गुर ग्यान विचार ॥
—संक्षिप्त संत सुधा सार, पृष्ठ २७५ ।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११६
मिट गया। गुरु ने हरिनाम की ओषधि देकर तन मन को निरोग किया।¹
मूर्ति पूजा तथा बाह्याडाम्बर का खंडन
कालान्तर में बौद्ध धर्म दो भागों में बंट गया—हीन यान और महायान।
आगे चलकर महायान के भी दो टुकड़े हो गये। वज्रयान और सहजयान। बुद्ध ने तो
मंत्र, तंत्र तथा जादू टोनों को 'मिथ्या जीव' कह कर तिरस्कृत ही किया किंतु आगे चल
कर उन्हीं के अनुयायियों ने इन्हें निर्वाण प्राप्ति का एक प्रमुख अंग मान लिया।
सिद्धों के वज्रयान की 'सहज साधना' ही नाथ संप्रदाय के रूप में पल्लवित
हुई। इन दोनों संप्रदायों को एक ही विचार-धारा की दो ऊर्मियाँ कह सकते हैं। सिद्ध
संप्रदाय दोनों ने बहिःसाधना के विपरीत अन्त साधना पर जोर दिया और 'घट' के
भीतर ही परम तत्त्व के उपलब्ध होने की बात कही। जिस प्रकार अन्तःसाधना पर इन
दोनों पंथों में जोर दिया गया उसी प्रकार बाह्य आडम्बरों के तीव्र विरोध पर भी
क्योंकि बाह्याडम्बर अन्त.साधना का प्रबल शत्रु है।
तीर्थ स्नान, देवार्चन आदि बाह्याचार का खण्डन करते हुए सिद्ध मत में कहा
गया है कि बोधिसत्वों को ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि की पूजा नही करनी चाहिये।
पत्थर आदि देवताओं को भी पूजा नहीं करनी चाहिए, न तीर्थ ही जाना चाहिए क्योंकि
बाह्य पूजा से मोक्ष नही मिलता।²
भिन्न-भिन्न तीर्थों में घूम कर अनेक देवताओं की पूजा वा आराधना को योगियों
के भी मूर्खता कहा है।³
१. सत गुरु सबदा मिट गया दरिया संसय सोग।
औषद दे हरिनाम का तन मन किया निरोग॥
—संक्षिप्त संत सुधा सार, पृ० ४२२।
२. ब्रह्म विष्नु महेसुर देवा। बोहिसत ना करहु सेवा॥
देव ने पूजहु तिरथ ण जाना। देव पूजा ही तिरथ ण जावा॥
"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य" शीर्षक लेख
में उद्धृत।
—'साहित्य संदेश' मार्च १६५३।
३. न्हाइये को तीरय न पूजिबे को देव।
भणंत गोरख अलख अभेद॥
—'साहित्य संदेश' मार्च १६५३, पृ० ३६६।

१२० नामदेव की हिन्दी कविता
हिंदू और मुसलमान दोनो में तीर्थ व्रतादि पाखंडो की सिद्धो और नाथों
दोनो ने कटु आलोचना की है ।
मूर्ति पूजा आदि पूजा की विधिया और बाह्याडम्बरो का तिरस्कार सिद्धो तथा
हठयोगियो दोनो ने किया । इन्ही की परंपरा के कारण सत मत में बाह्य विधानों के
प्रति घोर उपेक्षा बुद्धि का पूर्ण प्रचार था । मुसलमानो के कारण संतो की इस प्रवृत्ति
को प्रोत्साहन मिला । इस प्रकार सत मत पर मुसलमानी प्रभाव मूर्ति पूजा के खडन के
रूप में मिलता है ।
यद्यपि प्रथमत नामदेव विट्ठल मूर्ति के उपासक थे परन्तु बाद में अपने दीक्षा
गुरु बिसोबा खेचर से निगुण निराकार ब्रह्म का उपदेश पाकर वे गदगद हुए । उनकी
भक्ति में जो अध भाव था वह दूर हो गया । अपने मराठी के एक अभग में वे कहते हैं
कि पत्थर की मूर्ति अपने भक्तो के साथ बातें करती है ऐसा कहने वाले तथा सुनने
वाले दोनो भी मूर्ख हैं । १
नामदेव के अनुसार भैरउ, भूत तथा शीतला की उपासना और पूजा व्यर्थ हैं ।
ये कहते हैं कि मै तो मात्र भगवान की भक्ति करता हूँ । २
नामदेव ने बाह्याचारो और मिथ्याडम्बरो का घोर विरोध किया है । वे अपने
मन को सबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन । अश्वमेध यज्ञ, तुला दान, प्रयाग के
सगम में स्नान, गया म पिण्ड दान आदि सभी बाह्याचार एकनिष्ठ भक्ति के समक्ष हेय
है । हे मन ! तू सभी भेदो का त्याग कर और निरंतर गोविन्द का स्मरण कर । तू
निश्चय ही ससार सागर से तर जायेगा । इसमें सदेह नहीं । ३
भगवान् की पूजा के लिए जल, पुष्प माला, नैवेद्य, दूध आदि का प्रबंध आडम्बर
१ पाषाणाचा देव बोला भक्तांतें ।
सांगते एकने मूर्ख दोघे ।
—पाँच सत कवी, पृ० १५० ।
२ भैरऊ भूत सीतला धावै । खर वाहन ऊहु छार उड़ावै ॥
हऊ तउ एक रमईआ लेअऊ । आन देव बदलाबनि देहऊ ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०७ ।
३ असुमेध जगने । तुला पुरख दाने । प्राग इस्नाने ॥
तऊ न पूजहि हरि कीरति नामा ॥
अपुने रामहि भजु रे मन आनसीआ ॥
सिमरि सिमिर गोविंद । भजु नामा तरसि भव सिंध ॥
—पजाबातील नामदेव, पृ० १०४ ।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२१
पूर्ण है । भले ही पुजारी इन्हे विशुद्ध और पवित्र समझे । कीटो, भ्रमरों, बछड़ो
आदि के द्वारा ये पहले ही जुठला दिये गये है । इससे वे अपवित्र और अशुद्ध है । फिर
ये पूजा की सामग्री कैसे हो सकते हैं ? १
करोड़ो तीर्थ यात्राएं, पिण्ड दान तथा अन्य सभी प्रकार के दान व्यर्थ है । नाम-
देव अपने मन को प्रबोधित करते हुए कहते है कि हे मन ! तू पाखण्ड को छोड़ दे,
कपट न कर तथा नित्य मनोयोग से हरि नाम ले । २
मूर्ति पूजा का खण्डन करते हुए वे कहते है—एक पत्थर पूजा जाता है और
दूसरा ठुकराया जाता है। यदि एक में देवत्व की अनुभूति है तो दूसरे में क्यो
नही ? ३
संत नामदेव का यह तार्किक मन्तव्य सहज भक्ति की मान्यता और आडम्बर
पूर्ण मूर्ति पूजा की व्यर्थता प्रतिपादित करता है ।
योग, यज्ञ, तप, होम, नेम-व्रत आदि बाह्याडम्बर किस काम के ? हे मन ! तू
राम नाम जप । ४
१. आणिले कुसुम गूँथिले माला बाल गोविद हि हार रचूँ ।
पहली बास जुं भंवरे लोनो, जूठनि भेला काई करुँ ।।
आणिने तंदुल रांधिले खीरा बाल गोविंद हि भोग रचूँ ।
पहली दूध जु बछा विटाल्या जूठानि भेला काइ करुँ ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६१ ।
२. बानारसी तपु करै उलटि तीरंथ मरै
अगनि दहै काइआ कलपु कीजै ।
असुमेध जगु कीजै सोना परमादानु दीजै ।
रामनाम सरि तऊ त पूजै ।।
छोड़ि छोड़ि रे पाखंडा मन कपटु न कीजै ।
हरिवा नामु नित नित ही लीजै ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५६ ।
३. एकै पाथर कीजै भाउ । दूजै पाथर धरीए पाउ ।।
जे ओहु देउ त ओहु भी देवा । कहि नामदेऊ हम हरि की सेवा ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १५२
४. भइया कोई तू ले रे राम नाम ।
जोग जिग तप होम नेम व्रत ए सब कोने काम ।। टेक ।।
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद १३८ ।

१२२ नामदेव की हिन्दी कविता
बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किए तीर्थ व्रत आदि व्यर्थ है। एकादशी का व्रत
एक साधन है। नामदेव कहते हैं कि मै जब गन्तव्य स्थान पर पहुँचा तो मैंने सीढी
का त्याग किया।१
ढोंगी भक्तों पर नामदेव को तरस आता है और वे व्यंग्यपूर्वक कहते हैं—उस
भक्त का क्या कहना जो बिना प्रतीति के पत्थर को पूजता है। नहाता धोता है, गले
में तुलसी की माला पहनता है परन्तु उसका अंत करण कोयले-सा काला है।२
मूर्ति पूजा और बलि का खण्डन नामदेव ने बार बार किया है।३
यदि कोई शरीर को लगे कीचड को कीचड़ ही से स्वच्छ करना चाहे तो उसका
यह प्रयास व्यर्थ होगा। जो भीतर से मलिन और बाहर से स्वच्छ है वह धोखेबाज
है। नामदेव कहते हैं कि हे मन ! सुरभी को छोड़कर भेड़ की पूँछ पकड़ कर तू भव-
सागर को कैसे पार कर सकेगा ?४
लोगों के आडम्बर पर नामदेव को बहुत क्षोभ होता है।५
१. तीरथ बरत जगत् की आस।
फोकट कीजै बिन विस्वास॥ २॥
एकादसी जगत् की करनी।
पाया महल तब तजो निसरनी। —संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५६
२. भगत भला बाबा काढता। बिन प्रतीतिं पूजै सिला॥ टेक॥
न्हायै धोवै करै सनान। हिरदै अँपिन माथै कान॥ १॥
गलि पहिरै तुलसी की माला। अंतरगति कोइला सा काला॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २४।
३. पाहन आगे देव कटीला। वाको प्राण नही वाकी पूजा रचीला॥
निरजीव आगे सरजीव मारै। देषत जनम आपनो हारै॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७।
४. लागी पंक पंक तै धोवै निर्मल न होवै जनम बिगौवै।
भीतरि मैला बाहरि चोप। पाणी पिह्न पषाले धोपा।
नामदेव कहै सुरही परहरिये। भेड पूँछ कैसे भवजल तरिये।
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२।
५. मन थिर होइ वा रे न होइ। ऐसा चिह्न करे संसार।
भीतरि मैला धूतिग फिरै। क्यूँ उतरे भव पार॥ टेक॥
रुद्राष सषा जप माला मंडै। ताको मरम न जानै कोई।
आप न देषै और दिपावै। कपट मुक्ति क्यो होई॥ १॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२३
हिन्दू धर्म और समाज की बुराइयों पर कबीर ने भी कुठाराघात किया है।
हिन्दुओं के तीर्थ, व्रत, मूर्ति पूजा आदि से उन्हे बेहद चिड़ है। मूर्ति पूजा का खण्डन
करते हुए वे कहते हैं कि पत्थर की मूर्ति को पूजने से यदि परमात्मा मिल सकता है तो
मै पहाड़ को पूजा करूँगा। उसकी अपेक्षा तो यह चक्की भली जिसका पीसा सारा
संसार खाता है। १
जो लोग पत्थर की मूर्ति बनाकर उसे करतार समझकर उसकी पूजा करने हे वे
पाप की धारा में डूब जाते हैं। २
तीर्थ और व्रत बेल के समान संपूर्ण संसार पर छाए हुए हैं। कबीर ने इन
बाह्याचारों को जड़ से ही नष्ट कर दिया। इस विष को कौन खायगा ? ३
भक्ति से रहित जप-तप तथा तीर्थों एवं व्रतों पर विश्वास करना भी भ्रम है। ये
सब तो सेमर के फूल के समान हैं जो देखने में बड़ा आकर्षक पर वस्तुतः सारहीन
है। ४
हे जीवात्मा ! केशों के मुड़ाने से भी कुछ नहीं होता। बंधन का कारण तो
वेश नहीं मन के विकार हैं। तू उस मन को क्यों नहीं मारता जिसमें विषय-विकार
भरे पड़े हैं। ५
केवल वैष्णव बनने से काम नहीं चलता। बिना विवेक के संसार की कोई
१. पाहन पूजे हरि मिले तो मै पूजूँ पहार।
ताते वह चाकी भली पीस खाय संसार ॥
—साखी संग्रह, पृष्ठ १८३ ।
२. पाहण केरा पूतला करि पूजै करतार ।
इही भरोसे जे रहे बूड़े काली धार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४३।
३. तीरथ त सब बेलड़ी, सब जग मेल्या छाइ ।
कबीर मूल निकंदिया, कौण हलाहल खाइ ।
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४४ ।
४. जप तप दीसै थोथरा तीरथ व्रत बेसास ।
सूवै सेंबल सेविया यो जग चल्या निरास ॥
—कबीर ग्रंथावली, पृष्ठ ४४ ।
५. केसन कहा बिगाड़िया, जे मूंड़े सौ बार ।
मन कौं काहे न मूंडिए जामै विषै विकार ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४६ ।

१२४ नामदेव की हिन्दी कविता
साधना सफल नही हो सकती। माला तिलक लगाने से ही सफलता नही मिल
सकती।¹
एकेश्वरवाद का प्रतिपादन
जिन परिस्थितियो ने निर्गुंण पथ को जन्म दिया था, एकेश्वरवाद उनकी सब
से बडी आवश्यकता थी। वेदात के अद्वैतवादी सिद्धांतो को मानने पर भी हिन्दू बहुदेव-
वाद में बुरी तरह फँसे हुए थे। एक अल्लाह को माननेवाले मुसलमान भी स्वयं एक
प्रकार से बहुदेववादी हो रहे थे। अतएव निर्गुणवादियो ने हिन्दू और मुसलमानो को
एकेश्वरवाद का संदेश सुनाया और बहुदेववाद का विरोध किया।
वारकरी संप्रदाय में एक देवोपासना का ही महत्त्व है। नामदेव ने बहुदेववाद
का विरोध किया है और एकेश्वरवाद का प्रतिपादन। अपने 'गोविन्द' का परिचय देते
हुए उन्होने कहा है—'वह एक है और अनेक भी है, वह व्यापक है और पूरक भी
है। मैं जहाँ देखता हूँ वहाँ पर वही दीख पड़ता है। माया की चित्र विचित्र बातों
द्वारा मुग्ध होने के कारण सभी कोई इस रहस्य को समझ नही पाते। सर्वत्र गोविन्द
ही गोविन्द है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्तु नही। वह सहस्त्रो मणियो के भीतर
ओत प्रोत धागे की भाँति इस विश्व मे सर्वत्र वर्तमान है। नामदेव का कथन है कि इस
बात को अपने हृदय में भली भाँति समझ लो कि मुरारी ही एक मात्र घट घट में और
सर्वत्र एक रस भाव से व्याप्त है।२
१. बेसनो भया तो का भया बूझा नही विवेक।
छापा तिलक बनाइ करि दगध्या लोक अनेक ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४६।
२ एक अनेक विआपक पूरन जत देखउ तत सोई ॥
माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझै कोई।
सभु गोविन्द है सभु गोबिन्दु है गोविन्द बिनु नहि कोई ॥
सूत एकू मणि सत सहस जैसे उतिपोति प्रभु सोई ॥
जलतरंग अर फेन बुदबुदा जलते भिन्न न होई ॥
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला बिचरत आन न होई ॥
मिथिआ भरमु अरु सुपनु मनोरथ सति पदारथु जानिआ ॥
मुकि मनसा गुरु उपदेसी जागत ही मनु मानिआ।
कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै विचारो ॥
घट घट अंतरि सरब निरंतरौ केवल एक मुरारी ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १५० ।

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२५
संत नामदेव उस एक मात्र राम के प्रति ही अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हैं।
उनका कहना है कि 'जिस प्रकार नाद को श्रवण कर मृग उसमें निरत हो जाता है
और उसका ध्यान मर जाने तक नही टूटता, जिस प्रकार बगला मछली की ओर दृष्टि
लगाये रहता है, उसी प्रकार मेरी दृष्टि भी उसी एक 'राम की ओर लगी हुई है। जहाँ
देखता हूँ यहाँ वही है उसके सिवा और कुछ भी नही।'१
इसीलिए उन्होने उस एक की ही भक्ति को अपनाया था और अन्य देवी-देवताओं
की पूजा को व्यर्थ बतलाया था। उनका कहना है कि जो लोग भैरव का ध्यान करते
है वे भूत होगे और जो शीतला का ध्यान करते हे गधा उनका बाहन होगा और निरंतर
धूल उड़ायेंगे। अब रहा मे, मैं तो मात्र भगवान की भक्ति करता हूँ—भगवान की तुलना
में मै अन्य देवताओ की उपेक्षा करता हूँ।२
अन्य एक स्थान पर वे लिखते है—'एक राम की वदना करने पर मे और
किसी की वंदना न करूँगा। राम-रसायन प्राशन कर मै अन्य देवताओ के सामने न
गिघियाऊँगा। नामदेव कहते है कि एक मात्र राम मेरे जीवन मे रमे हुए है। अन्य
देवता निकम्मे है।३
उस एक के प्रति अपनी अनन्य भावना व्यक्त करते हुए नामदेव कहते है—'मै
अन्य देवो देवताओ को नही जानता। तू सुख का सागर है। मेरे प्राण, माता-पिता,
गुरु आदि तुम ही हो। तुम मेरे सर्वस्व हो, अन्य कोई नही।'४
१. नादि भ्रम जैसे मिरगाए। प्रान तजे वाको धिआनु न जाए॥
ऐसे रामा ऐसे हेरऊ। राम छोड़ि चितु अनत न फेरऊ॥
जह जह देखऊ तह तह नामा। हरिके चरन नित धिआवै नामा॥
—पंजाबातील नामदेव, पृ० १०५।
२. भैरऊ भूत सीतला धावै। खर वाहन ऊहु छार उड़ावै॥
हऊ तऊ एक रमईआ लेअऊ। आन देव बदलावनि देहऊ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २०७।
३. राम जुहारि न और जुहारौ। जीवनि जाइ जनम कत हारौँ।
आन देव सौं दीन न भाषौँ। राम रसायन रसना चाषौँ।
भणत नामदेव जीवनि रामा। आन देव फोकट बेकामा॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ३०।
४. आन न जानौं देव न देवा। जित जित प्राण तित ही तेरो सेवा ॥१॥
तूं सुख सागर आगर दाता। तूं ही मेरे प्राण पिता गुर माता ॥२॥
नामौ भणै मेरे सब कुछ साईं। मनसा वाचा दूसर नाही ॥३॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १२६।

१२६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने ब्रह्म को निर्गुण एव अरूप बताया है । कई स्थलो पर उन्होंने एक
विशेषण से ब्रह्म को विशिष्ट करके उसका वर्णन किया है। यथा—
जिसने उस एक को जान लिया, उसने सब कुछ ही जान लिया। यदि उस एक
को जाने बिना अन्य अनेको विषयो का ज्ञान प्राप्त कर लिया, तो वह अज्ञान के अति-
रिक्त कुछ नही ।¹
कबीर कहते है कि एक ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त न करके यदि अनेको ज्ञान प्राप्त कर
लिए तो उनसे कुछ नही होता । एक से सब हो जाते है पर सबने एक नही बनाया जा
सकता ।²
केवल एक राम को आशा ही उचित है अन्य आशाएं तो व्यर्थ है । जो लोग
ईश्वर की आशा को छोड़कर अन्य की आशा करते हैं वे उन लोगो के समान है जो
पानी मे रह कर भी प्यास मरते हैं ।³
इस कलियुग म मनुष्य अनेक मित्रो को बनाता है लेकिन ये सब दुख-दुख देने
वाले होत हे । परन्तु जिनका हृदय एक से बंध जाता है वही निश्चिंत सो सकता है।⁴
हमन तो एक ही का समझा है, जो दो कहते है उनका तथा जिन्होने उस एक
को नही पहचाना

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२७
कबीर भगवान को विश्वकर्ता, रक्षक, नियन्ता आदि व्यवहार के लिए मानते
हैं। भगवान का यह स्वरूप कबीर के लिए गौण है। कबीर का ब्रह्म घट-घट वासी एक
सर्वव्यास तत्त्व है। उसका रक्षक, संहारक स्वरूप तो केवल जगत् व्यवहार के
लिए है।१
कबीर ने इस्लामी एकेश्वर तथा अपने ब्रह्मैक्य के अंतर को स्पष्ट कर दिया
है।२ एक खुदा या अल्लाह संख्या में बँध जाता है परन्तु कबीर का सत्य तत्त्व सर्व-
व्यापी है और संख्या से अतीत है।
जब प्रभु सर्वत्र व्याप्त है तब उसे मंदिर या मसजिद की परिधि में नहीं बाँधा
जा सकता ।३
अखण्ड एवं सर्वत्र व्याप्त सत्ता को भेद-बुद्धि से दो या अनेक कहना मोटी बुद्धि
अथवा मूर्खता का काम ही कहा जा सकता है।४
निर्गुणी एकेश्वर के भक्त को अलंकारिक भाषा में पतिव्रता नारी कहते हैं।
कबीर की दृष्टि में बहुदेववादी उस व्यभिचारिणी स्त्री के समान है जो अपने पति को
छोड़कर जारों पर आसक्त रहती है।५
चरनदास कहते हैं कि सिर टूट कर पृथ्वी पर भले ही लोटने लगे, मृत्यु भले
ही आ उपस्थित हो परन्तु राम के सिवा किसी अन्य देवता के सामने मेरा सिर
न झुके।६
१. कहै कबीर विचारी करि ये ऊले व्योहार ।
याही थे जे अगम है सो बरतै रह्या संसारि ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २४३ ।
२. मुसलमान कहे एक खुदाई,
कबीरा को स्वामी घटि घटि रह्यो समाइ ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २०० ।
३. खालिक खलक, खलक में खालिक सब घट रह्या समाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १०४ ।
४. कहै कबीर तरक दोइ साधे ताकी मति है मोटी ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १०५ ।
५. नारि कहावै पीव की रहे और संग सोय ।
जार सदा मनमे वसै, खसममुखी क्यो होय ॥
—संत वाणी संग्रह, पृष्ठ १८ ।
३. यह सिर नवे त राम कूँ नाही गिरयो टूट ।
आन देव नाहि परसिए यहु तन जायौ छूट ॥
—सत वाणी संग्रह, पृष्ठ १४७ ।

१२८ नामदेव की हिन्दी कविता
दादू के राम और अल्लाह, अलख, इलाही सब एक ही है ।१
कबीर कहते हैं कि जिन्होंने एक परमात्मा को माना उन्हों को सत्य का साक्षा-
त्कार हुआ । जो उससे लौ लगाते हैं वे आवा-गौन के फेर से मुक्त हो जाते हैं ।२
कथनी तथा करनी में एकरूपता
अपनी तीव्र सामाजिक चेतना के कारण संत व्यावहारिकता एवं आदर्श में
संतुलन स्थापित करने के पक्षपाती थे । इसलिए उनके साहित्य में किसी भी प्रकार की
अतिवादिता के प्रचार की गंध नहीं मिलती । व्यवहार और आदर्श के साथ ही इन
संतो ने विचार और आचरण में भी सामञ्जस्य लाने पर जोर दिया । उनके साहित्य में
भी केवल काल्पनिक बातों और विचारों का ही प्राचुर्य नहीं है । उन्होंने जो कुछ भी
लिखा है अपने अनुभव के आधार पर तथा अपने उपदेशा पर आचरण करके ही लिखा
है । उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तो एवं उनके दैनिक आचरण में कोई विरोध कदाचित
ही मिले ।
सांसारिक व्यक्तियों की सामान्य प्रवृत्ति होती है कि वे कहते कुछ हैं और करते
कुछ और हैं । संतो के अनुसार मनुष्य को वैसा ही आचरण करना चाहिए जैसा वह
उपदेश देता हो । सभी निर्गुण कवियों में इस ढंग की बात मिलती है । नामदेव ने भी
'करनी के बिना कथनी' की आलोचना की है । उनके अनुसार भक्त और परमात्मा में
कोई अन्तर नहीं है । जा इस प्रकार का अन्तर मानता है वह नर पशु है । जो परमात्मा
को छोड़कर वेद-विधि से कार्य करता है वह जल भुन कर मर जाता है । गर्वित बातें
तो बहुत बढ़ बढ़कर बनाता है किन्तु विरला ही कोई उनको कार्यान्वित करता है ।३
१. एकै अलह राम है समरथ सांई सोइ ।
मैदे के पकवान सम खाता होइ सो होइ ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २५६,
२. एक-एक जिनि जांणिया तिनहि सब पाया ।
प्रेम प्रीति ल्यौ लोन मन, तबहुरि न आया ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १६ ।
३. भगवंत भगता नही अंतरा ।
जै करि जानै पशुआ नरा ॥ टेक ॥
छाड़ि भगवत वेद विधि करै ।
दाझै सूजै जारंम परै ॥ १ ॥
कथनी बदनी सब कोई कहै ।
करनी जन कोई बिरला रहै ॥ २ ॥