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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 332 में से

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पृष्ठ 121

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२५
संत नामदेव उस एक मात्र राम के प्रति ही अपनी भक्ति का प्रदर्शन करते हैं।
उनका कहना है कि 'जिस प्रकार नाद को श्रवण कर मृग उसमें निरत हो जाता है
और उसका ध्यान मर जाने तक नही टूटता, जिस प्रकार बगला मछली की ओर दृष्टि
लगाये रहता है, उसी प्रकार मेरी दृष्टि भी उसी एक 'राम की ओर लगी हुई है। जहाँ
देखता हूँ यहाँ वही है उसके सिवा और कुछ भी नही।'१
इसीलिए उन्होने उस एक की ही भक्ति को अपनाया था और अन्य देवी-देवताओं
की पूजा को व्यर्थ बतलाया था। उनका कहना है कि जो लोग भैरव का ध्यान करते
है वे भूत होगे और जो शीतला का ध्यान करते हे गधा उनका बाहन होगा और निरंतर
धूल उड़ायेंगे। अब रहा मे, मैं तो मात्र भगवान की भक्ति करता हूँ—भगवान की तुलना
में मै अन्य देवताओ की उपेक्षा करता हूँ।२
अन्य एक स्थान पर वे लिखते है—'एक राम की वदना करने पर मे और
किसी की वंदना न करूँगा। राम-रसायन प्राशन कर मै अन्य देवताओ के सामने न
गिघियाऊँगा। नामदेव कहते है कि एक मात्र राम मेरे जीवन मे रमे हुए है। अन्य
देवता निकम्मे है।३
उस एक के प्रति अपनी अनन्य भावना व्यक्त करते हुए नामदेव कहते है—'मै
अन्य देवो देवताओ को नही जानता। तू सुख का सागर है। मेरे प्राण, माता-पिता,
गुरु आदि तुम ही हो। तुम मेरे सर्वस्व हो, अन्य कोई नही।'४
१. नादि भ्रम जैसे मिरगाए। प्रान तजे वाको धिआनु न जाए॥
ऐसे रामा ऐसे हेरऊ। राम छोड़ि चितु अनत न फेरऊ॥
जह जह देखऊ तह तह नामा। हरिके चरन नित धिआवै नामा॥
—पंजाबातील नामदेव, पृ० १०५।
२. भैरऊ भूत सीतला धावै। खर वाहन ऊहु छार उड़ावै॥
हऊ तऊ एक रमईआ लेअऊ। आन देव बदलावनि देहऊ॥
—सं० ना० हिं० प०, पद २०७।
३. राम जुहारि न और जुहारौ। जीवनि जाइ जनम कत हारौँ।
आन देव सौं दीन न भाषौँ। राम रसायन रसना चाषौँ।
भणत नामदेव जीवनि रामा। आन देव फोकट बेकामा॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ३०।
४. आन न जानौं देव न देवा। जित जित प्राण तित ही तेरो सेवा ॥१॥
तूं सुख सागर आगर दाता। तूं ही मेरे प्राण पिता गुर माता ॥२॥
नामौ भणै मेरे सब कुछ साईं। मनसा वाचा दूसर नाही ॥३॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १२६।