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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 332 में से

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पृष्ठ 106

११० नामदेव की हिन्दी कविता
जायेगा। नाथ पंथ की साधना को 'हठयोग' की साधना भी कहा गया है जो योग
दर्शन का ही एक प्रकार है।
सन्त सम्प्रदाय का सीधा सम्बन्ध नाथ सम्प्रदाय से है। सन्त सम्प्रदाय ने सिद्ध
सम्प्रदाय से आई हुई नाथ सम्प्रदाय की विचारधारा मूल रूप से ग्रहण की। नाथ
सम्प्रदाय की आचारनिष्ठा, विवेक-सम्पन्नता, अंध विश्वासों को तोड़ने की उग्रता एवं
परम्परागत कर्मकांडों की निरर्थकता सन्त सम्प्रदाय में सीधी चली आई। यहाँ तक कि
उलटबासियों की कुतूहलजनक शैली भी सन्तों को नाथ सम्प्रदाय से ही प्राप्त हुई।
डॉ० कोमलसिंह सोलंकी¹ के अनुसार नाथ पंथ की मूल प्रवृत्तियों को हम
संक्षेप में इस प्रकार रख सकते हैं—
(१) चारित्रिक उत्कर्ष और पवित्रता का आग्रह
(२) स्मार्त आचारों की अवहेलना
(३) निर्गुण भावना में विश्वास
(४) योग साधना का आध्यात्मिक स्वर
(५) ज्ञान और अक्खड़ता की प्रधानता
(६) लोक भाषा द्वारा अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत आदर्श की प्रतिष्ठा।
निर्गुण सन्त कवियों की वाणियों में जिन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग है उनमें
जो रूढ़ि-विरोधिता, खण्डनात्मक वृत्ति और अक्खड़ता है वह सब नाथ पंथी योगियों
और सिद्धों की ही देन है। किन्तु हिन्दी का निर्गुण सन्त काव्य ठीक वही नहीं है जो
नाथ पंथी योगियों की रचनाओं में उपलब्ध है। निर्गुण सन्त कवि भक्ति के मर्मस्पर्शी
गायक हैं। योग और ज्ञानमूलक अभिव्यक्ति के साथ भक्ति भावना का अनुकूल वाता-
वरण पाकर निर्गुण सन्त काव्य लोक-जीवन में जिस व्यापक प्रभाव को लेकर अवतरित
हुआ, वह उसकी अपनी विशेषता ही मानी जायगी। फिर भी सन्त सम्प्रदाय के लिए
अनुकूल वातावरण प्रस्तुत करने में नाथ पंथ का महत्त्वपूर्ण योग है इसे कोई अस्वीकार
नहीं करेगा।
वैष्णव धर्म
मध्ययुग में वैष्णव धर्म का बहुत अधिक प्रचार था। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण
ग्रन्थ भागवत है। भागवत में विविध प्रकार के अवतारों की चर्चा मिलती है। अवतार-
वाद को सर्वाधिक मान्यता देते हुए भी भागवत् निर्गुण ब्रह्म के महत्त्व को नहीं भूली।
सन्तों को वैष्णव धर्म का अवतारवाद का यह सिद्धांत मान्य न था।
१. नाथ पंथ और निर्गुण सन्त काव्य, पृष्ठ १३०।