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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 332 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११३
ठाकुर को स्नान कराने के लिए मैं जल से भरा घड़ा लाया, उस जल में
बयालीस लाख जीव रहते हैं, जिनमें भगवान् का निवास है, फिर मैं उन्हें कैसे स्नान
कराऊँ ? मैं जिधर भी जाता हूँ उधर भगवान् है जो परमानन्द में लीन हो सदैव
लीलाएँ करता है। इधर भगवान् है, उधर भगवान् है, भगवान् के बिना संसार में कुछ
भी नहीं है। नामदेव कहते हैं—हे भगवन् ! पृथ्वी के जल-थल आदि सभी स्थानों में
तुम व्याप्त हो ।¹
ज्ञानी भक्त सब भक्तों में श्रेष्ठ होता है। अपना व्यक्तित्व अपने इष्टदेव के चरणों
पर समर्पित कर देने पर वह स्वयं ईश्वर हो जाता है। उसका अपना अलग अस्तित्व
नहीं रहता । इसीलिए कहा गया है कि 'जीवो भूत्वा शिवं यजेत्' अर्थात् स्वयं विट्ठल
होकर उसकी भक्ति करना ही पराकोटि की भक्ति है। 'सर्वं खलु इदं ब्रह्म' की अनु-
भूति होने पर नामदेव कहने लगे कि केवल मन्दिर ही में परमात्मा का वास नहीं है।
वह सारे संसार में व्याप्त है। अतः मैं फूलों तथा पत्तियों से उसकी पूजा न करूँगा।
हरि की शरण में जाने पर आवा-गोन के फेर से मेरी मुक्ति हुई।²
कबीर तथा अन्य सन्त कवियों की रचनाओं में भी यह प्रवृत्ति पाई जाती है।
सन्त काव्य धारा की मूल भावना निर्गुण की उपासना है। सन्त कवियों ने भगवान् के
सगुण और निर्गुण इन दो रूपों में से निर्गुण रूप का निर्वाचन किया। उनका निर्गुण
बौद्ध साधकों के शून्य से पृथक् है। वह संसार के कण-कण में व्याप्त है, वही प्रत्येक
साँस में है। उसका वर्णन नहीं किया जा सकता, वह केवल अनुभवगम्य ही है। उसी
को गूँगे का गुड़ कहा गया है। कबीर के अनुसार वह पुस्तकीय विद्या से प्राप्त नहीं हो
सकता, वह प्रेम से प्राप्त है।³
१. आनीले कुंभ भराईले उदक ठाकुर कउ इसनानु करउ ।
बइआलीस लख जी जल महि होते बीठलु भैला काई करउ ॥ १ ॥
जत्र जाउ तत बीठलु भैला । महा आनन्द करे सद केला ॥ २ ॥
ईभे बीठलु ऊभे बीठलु बीठल बिनु संसारु नही ।
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिओ तू सरब मही ॥ ३ ॥
—पञ्जाबातील नामदेव, पृ० ८३ ।
२. पातो तोडि पूजूं देवा । देवलि देव न होई ।
नामा कहै मैं हरि को सरना । पुनरपि जनम न होई ।
—सन्त नामदेव की हिन्दी पदावली, पद ६५ ।
३. अकथ कहानो प्रेम की कछु कहो न जाई ।
गूँगे केरी सरकरा बैठे मुसकाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृ० १२० ।
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