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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 116, कुल 332 में से

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पृष्ठ 116

१२० नामदेव की हिन्दी कविता
हिंदू और मुसलमान दोनो में तीर्थ व्रतादि पाखंडो की सिद्धो और नाथों
दोनो ने कटु आलोचना की है ।
मूर्ति पूजा आदि पूजा की विधिया और बाह्याडम्बरो का तिरस्कार सिद्धो तथा
हठयोगियो दोनो ने किया । इन्ही की परंपरा के कारण सत मत में बाह्य विधानों के
प्रति घोर उपेक्षा बुद्धि का पूर्ण प्रचार था । मुसलमानो के कारण संतो की इस प्रवृत्ति
को प्रोत्साहन मिला । इस प्रकार सत मत पर मुसलमानी प्रभाव मूर्ति पूजा के खडन के
रूप में मिलता है ।
यद्यपि प्रथमत नामदेव विट्ठल मूर्ति के उपासक थे परन्तु बाद में अपने दीक्षा
गुरु बिसोबा खेचर से निगुण निराकार ब्रह्म का उपदेश पाकर वे गदगद हुए । उनकी
भक्ति में जो अध भाव था वह दूर हो गया । अपने मराठी के एक अभग में वे कहते हैं
कि पत्थर की मूर्ति अपने भक्तो के साथ बातें करती है ऐसा कहने वाले तथा सुनने
वाले दोनो भी मूर्ख हैं । १
नामदेव के अनुसार भैरउ, भूत तथा शीतला की उपासना और पूजा व्यर्थ हैं ।
ये कहते हैं कि मै तो मात्र भगवान की भक्ति करता हूँ । २
नामदेव ने बाह्याचारो और मिथ्याडम्बरो का घोर विरोध किया है । वे अपने
मन को सबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मन । अश्वमेध यज्ञ, तुला दान, प्रयाग के
सगम में स्नान, गया म पिण्ड दान आदि सभी बाह्याचार एकनिष्ठ भक्ति के समक्ष हेय
है । हे मन ! तू सभी भेदो का त्याग कर और निरंतर गोविन्द का स्मरण कर । तू
निश्चय ही ससार सागर से तर जायेगा । इसमें सदेह नहीं । ३
भगवान् की पूजा के लिए जल, पुष्प माला, नैवेद्य, दूध आदि का प्रबंध आडम्बर
१ पाषाणाचा देव बोला भक्तांतें ।
सांगते एकने मूर्ख दोघे ।
—पाँच सत कवी, पृ० १५० ।
२ भैरऊ भूत सीतला धावै । खर वाहन ऊहु छार उड़ावै ॥
हऊ तउ एक रमईआ लेअऊ । आन देव बदलाबनि देहऊ ॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २०७ ।
३ असुमेध जगने । तुला पुरख दाने । प्राग इस्नाने ॥
तऊ न पूजहि हरि कीरति नामा ॥
अपुने रामहि भजु रे मन आनसीआ ॥
सिमरि सिमिर गोविंद । भजु नामा तरसि भव सिंध ॥
—पजाबातील नामदेव, पृ० १०४ ।