सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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साधना सफल नही हो सकती। माला तिलक लगाने से ही सफलता नही मिल
सकती।¹
एकेश्वरवाद का प्रतिपादन
जिन परिस्थितियो ने निर्गुंण पथ को जन्म दिया था, एकेश्वरवाद उनकी सब
से बडी आवश्यकता थी। वेदात के अद्वैतवादी सिद्धांतो को मानने पर भी हिन्दू बहुदेव-
वाद में बुरी तरह फँसे हुए थे। एक अल्लाह को माननेवाले मुसलमान भी स्वयं एक
प्रकार से बहुदेववादी हो रहे थे। अतएव निर्गुणवादियो ने हिन्दू और मुसलमानो को
एकेश्वरवाद का संदेश सुनाया और बहुदेववाद का विरोध किया।
वारकरी संप्रदाय में एक देवोपासना का ही महत्त्व है। नामदेव ने बहुदेववाद
का विरोध किया है और एकेश्वरवाद का प्रतिपादन। अपने 'गोविन्द' का परिचय देते
हुए उन्होने कहा है—'वह एक है और अनेक भी है, वह व्यापक है और पूरक भी
है। मैं जहाँ देखता हूँ वहाँ पर वही दीख पड़ता है। माया की चित्र विचित्र बातों
द्वारा मुग्ध होने के कारण सभी कोई इस रहस्य को समझ नही पाते। सर्वत्र गोविन्द
ही गोविन्द है, उसके अतिरिक्त अन्य कोई भी वस्तु नही। वह सहस्त्रो मणियो के भीतर
ओत प्रोत धागे की भाँति इस विश्व मे सर्वत्र वर्तमान है। नामदेव का कथन है कि इस
बात को अपने हृदय में भली भाँति समझ लो कि मुरारी ही एक मात्र घट घट में और
सर्वत्र एक रस भाव से व्याप्त है।२
१. बेसनो भया तो का भया बूझा नही विवेक।
छापा तिलक बनाइ करि दगध्या लोक अनेक ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ ४६।
२ एक अनेक विआपक पूरन जत देखउ तत सोई ॥
माइआ चित्र विचित्र विमोहित बिरला बूझै कोई।
सभु गोविन्द है सभु गोबिन्दु है गोविन्द बिनु नहि कोई ॥
सूत एकू मणि सत सहस जैसे उतिपोति प्रभु सोई ॥
जलतरंग अर फेन बुदबुदा जलते भिन्न न होई ॥
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला बिचरत आन न होई ॥
मिथिआ भरमु अरु सुपनु मनोरथ सति पदारथु जानिआ ॥
मुकि मनसा गुरु उपदेसी जागत ही मनु मानिआ।
कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै विचारो ॥
घट घट अंतरि सरब निरंतरौ केवल एक मुरारी ॥
—संत नामदेव की हिन्दी पदावली, पद १५० ।