सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 115, कुल 332 में से
संदर्भ में पढ़ेंनामदेव और निर्गुण काव्यधारा ११६
मिट गया। गुरु ने हरिनाम की ओषधि देकर तन मन को निरोग किया।¹
मूर्ति पूजा तथा बाह्याडाम्बर का खंडन
कालान्तर में बौद्ध धर्म दो भागों में बंट गया—हीन यान और महायान।
आगे चलकर महायान के भी दो टुकड़े हो गये। वज्रयान और सहजयान। बुद्ध ने तो
मंत्र, तंत्र तथा जादू टोनों को 'मिथ्या जीव' कह कर तिरस्कृत ही किया किंतु आगे चल
कर उन्हीं के अनुयायियों ने इन्हें निर्वाण प्राप्ति का एक प्रमुख अंग मान लिया।
सिद्धों के वज्रयान की 'सहज साधना' ही नाथ संप्रदाय के रूप में पल्लवित
हुई। इन दोनों संप्रदायों को एक ही विचार-धारा की दो ऊर्मियाँ कह सकते हैं। सिद्ध
संप्रदाय दोनों ने बहिःसाधना के विपरीत अन्त साधना पर जोर दिया और 'घट' के
भीतर ही परम तत्त्व के उपलब्ध होने की बात कही। जिस प्रकार अन्तःसाधना पर इन
दोनों पंथों में जोर दिया गया उसी प्रकार बाह्य आडम्बरों के तीव्र विरोध पर भी
क्योंकि बाह्याडम्बर अन्त.साधना का प्रबल शत्रु है।
तीर्थ स्नान, देवार्चन आदि बाह्याचार का खण्डन करते हुए सिद्ध मत में कहा
गया है कि बोधिसत्वों को ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि की पूजा नही करनी चाहिये।
पत्थर आदि देवताओं को भी पूजा नहीं करनी चाहिए, न तीर्थ ही जाना चाहिए क्योंकि
बाह्य पूजा से मोक्ष नही मिलता।²
भिन्न-भिन्न तीर्थों में घूम कर अनेक देवताओं की पूजा वा आराधना को योगियों
के भी मूर्खता कहा है।³
१. सत गुरु सबदा मिट गया दरिया संसय सोग।
औषद दे हरिनाम का तन मन किया निरोग॥
—संक्षिप्त संत सुधा सार, पृ० ४२२।
२. ब्रह्म विष्नु महेसुर देवा। बोहिसत ना करहु सेवा॥
देव ने पूजहु तिरथ ण जाना। देव पूजा ही तिरथ ण जावा॥
"सिद्ध सम्प्रदाय और नाथ पन्थ के पारस्परिक साम्य और वैषम्य" शीर्षक लेख
में उद्धृत।
—'साहित्य संदेश' मार्च १६५३।
३. न्हाइये को तीरय न पूजिबे को देव।
भणंत गोरख अलख अभेद॥
—'साहित्य संदेश' मार्च १६५३, पृ० ३६६।