सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ नामदेव की हिन्दी कविता
कबीर ने ब्रह्म को निर्गुण एव अरूप बताया है । कई स्थलो पर उन्होंने एक
विशेषण से ब्रह्म को विशिष्ट करके उसका वर्णन किया है। यथा—
जिसने उस एक को जान लिया, उसने सब कुछ ही जान लिया। यदि उस एक
को जाने बिना अन्य अनेको विषयो का ज्ञान प्राप्त कर लिया, तो वह अज्ञान के अति-
रिक्त कुछ नही ।¹
कबीर कहते है कि एक ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त न करके यदि अनेको ज्ञान प्राप्त कर
लिए तो उनसे कुछ नही होता । एक से सब हो जाते है पर सबने एक नही बनाया जा
सकता ।²
केवल एक राम को आशा ही उचित है अन्य आशाएं तो व्यर्थ है । जो लोग
ईश्वर की आशा को छोड़कर अन्य की आशा करते हैं वे उन लोगो के समान है जो
पानी मे रह कर भी प्यास मरते हैं ।³
इस कलियुग म मनुष्य अनेक मित्रो को बनाता है लेकिन ये सब दुख-दुख देने
वाले होत हे । परन्तु जिनका हृदय एक से बंध जाता है वही निश्चिंत सो सकता है।⁴
हमन तो एक ही का समझा है, जो दो कहते है उनका तथा जिन्होने उस एक
को नही पहचाना