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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 332 में से

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पृष्ठ 123

नामदेव और निर्गुण काव्यधारा १२७
कबीर भगवान को विश्वकर्ता, रक्षक, नियन्ता आदि व्यवहार के लिए मानते
हैं। भगवान का यह स्वरूप कबीर के लिए गौण है। कबीर का ब्रह्म घट-घट वासी एक
सर्वव्यास तत्त्व है। उसका रक्षक, संहारक स्वरूप तो केवल जगत् व्यवहार के
लिए है।१
कबीर ने इस्लामी एकेश्वर तथा अपने ब्रह्मैक्य के अंतर को स्पष्ट कर दिया
है।२ एक खुदा या अल्लाह संख्या में बँध जाता है परन्तु कबीर का सत्य तत्त्व सर्व-
व्यापी है और संख्या से अतीत है।
जब प्रभु सर्वत्र व्याप्त है तब उसे मंदिर या मसजिद की परिधि में नहीं बाँधा
जा सकता ।३
अखण्ड एवं सर्वत्र व्याप्त सत्ता को भेद-बुद्धि से दो या अनेक कहना मोटी बुद्धि
अथवा मूर्खता का काम ही कहा जा सकता है।४
निर्गुणी एकेश्वर के भक्त को अलंकारिक भाषा में पतिव्रता नारी कहते हैं।
कबीर की दृष्टि में बहुदेववादी उस व्यभिचारिणी स्त्री के समान है जो अपने पति को
छोड़कर जारों पर आसक्त रहती है।५
चरनदास कहते हैं कि सिर टूट कर पृथ्वी पर भले ही लोटने लगे, मृत्यु भले
ही आ उपस्थित हो परन्तु राम के सिवा किसी अन्य देवता के सामने मेरा सिर
न झुके।६
१. कहै कबीर विचारी करि ये ऊले व्योहार ।
याही थे जे अगम है सो बरतै रह्या संसारि ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २४३ ।
२. मुसलमान कहे एक खुदाई,
कबीरा को स्वामी घटि घटि रह्यो समाइ ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ २०० ।
३. खालिक खलक, खलक में खालिक सब घट रह्या समाई ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १०४ ।
४. कहै कबीर तरक दोइ साधे ताकी मति है मोटी ॥
—कबीर ग्रन्थावली, पृष्ठ १०५ ।
५. नारि कहावै पीव की रहे और संग सोय ।
जार सदा मनमे वसै, खसममुखी क्यो होय ॥
—संत वाणी संग्रह, पृष्ठ १८ ।
३. यह सिर नवे त राम कूँ नाही गिरयो टूट ।
आन देव नाहि परसिए यहु तन जायौ छूट ॥
—सत वाणी संग्रह, पृष्ठ १४७ ।