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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 114, कुल 332 में से

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पृष्ठ 114

११८ नामदेव की हिन्दी कविता
संत रज्जब कहते है कि गुरु-कृपा से ऐसी दृष्टि भास होती है जिससे शिष्य
प्रगट तथा गुप्त बात को पहचान सकता है जिसे न कोई देख सकता है न पहचान
सकता है ।¹
गुरु की महत्ता का वर्णन करते हुए नानक कहते हैं कि गुरु-कृपा से इंद्रादिक
देवता, सनक, सनंदन से तापस तथा तितने ही जन मुक्त हो गये ।²
शिष्य अपने गुरु की सेवा द्वारा मन को ज्ञान के अमृत में स्नान करा कर ६८
प्रधान तीर्थों का फल पा जाता है और उससे उपदेश रूपी रत्न भी पा लेता है ।³
सद्गुरु का मर कर जीने का रहस्य मुझे बहुत पसंद आया ।⁴
दादू दयाल गुरु की महिमा का वर्णन इस प्रकार करते हैं—मुझे सच्चा और
समर्थ गुरु मिल गया जिसने परम तत्त्व से मेरा परिचय करा दिया ।⁵
जो अपने आप जगत्-जाल में उलझ रहे हैं उनको सारा जगत् उलझा हुआ ही
दीखता है और जो स्वरूप दर्शन द्वारा सुलझ गया है उसे सब कुछ सुलझा हुआ दीखता
है । इस प्रकार का महाज्ञान अथवा महामन्त्र ही 'गुरु ज्ञान विचार' है ।⁶
दरिया साहब (मारवाड़ वाले) कहते हैं कि गुरु के उपदेश से सारा संशय
१. जन रज्जब गुर की दया दृष्टि परापति होय ।
परगट गुप्त पिछानिये जिनहि न दीखै दोय ॥
—संत काव्य, पृष्ठ ३१५ ।
२. गुरु के सबदि तरे मुनि केते इंद्रादिक ब्रह्मादि तरे ।
सनक सनंदन तपसी जन केते गुरु परसादि पारि परे ।
—संत काव्य, पृष्ठ २१० ।
३. अंम्रितु नीरु गिआनि मन मजनु अठसठि तीरथ संगि गहे ।
गुरु उपदेसि जवाहर माणक, सेवे सिखु सो खोजि लहै ॥
—संत काव्य, पृष्ठ २१० ।
४. सति गुरु मिले सुमरगु दिखाए । मरण रहण रंगु अंतरि भाए ।
गरबु निवारो गगन पुरु पाए ।
—संत काव्य, पृष्ठ २११ ।
५. साचा समरथ गुरु मिल्या, तिन तत दिया बताई ।
—सन्त काव्य, पृष्ठ २१६ ।
६. दादू आपा उरझै उरझिया दीसै सब संसार ।
आपा सुरझै सुरझिया, यहु गुर ग्यान विचार ॥
—संक्षिप्त संत सुधा सार, पृष्ठ २७५ ।