सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)
Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra
सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ नामदेव की हिन्दी कविता
बिना प्रभु पर पूर्ण विश्वास किए तीर्थ व्रत आदि व्यर्थ है। एकादशी का व्रत
एक साधन है। नामदेव कहते हैं कि मै जब गन्तव्य स्थान पर पहुँचा तो मैंने सीढी
का त्याग किया।१
ढोंगी भक्तों पर नामदेव को तरस आता है और वे व्यंग्यपूर्वक कहते हैं—उस
भक्त का क्या कहना जो बिना प्रतीति के पत्थर को पूजता है। नहाता धोता है, गले
में तुलसी की माला पहनता है परन्तु उसका अंत करण कोयले-सा काला है।२
मूर्ति पूजा और बलि का खण्डन नामदेव ने बार बार किया है।३
यदि कोई शरीर को लगे कीचड को कीचड़ ही से स्वच्छ करना चाहे तो उसका
यह प्रयास व्यर्थ होगा। जो भीतर से मलिन और बाहर से स्वच्छ है वह धोखेबाज
है। नामदेव कहते हैं कि हे मन ! सुरभी को छोड़कर भेड़ की पूँछ पकड़ कर तू भव-
सागर को कैसे पार कर सकेगा ?४
लोगों के आडम्बर पर नामदेव को बहुत क्षोभ होता है।५
१. तीरथ बरत जगत् की आस।
फोकट कीजै बिन विस्वास॥ २॥
एकादसी जगत् की करनी।
पाया महल तब तजो निसरनी। —संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ५६
२. भगत भला बाबा काढता। बिन प्रतीतिं पूजै सिला॥ टेक॥
न्हायै धोवै करै सनान। हिरदै अँपिन माथै कान॥ १॥
गलि पहिरै तुलसी की माला। अंतरगति कोइला सा काला॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २४।
३. पाहन आगे देव कटीला। वाको प्राण नही वाकी पूजा रचीला॥
निरजीव आगे सरजीव मारै। देषत जनम आपनो हारै॥
—संत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ४७।
४. लागी पंक पंक तै धोवै निर्मल न होवै जनम बिगौवै।
भीतरि मैला बाहरि चोप। पाणी पिह्न पषाले धोपा।
नामदेव कहै सुरही परहरिये। भेड पूँछ कैसे भवजल तरिये।
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद २२।
५. मन थिर होइ वा रे न होइ। ऐसा चिह्न करे संसार।
भीतरि मैला धूतिग फिरै। क्यूँ उतरे भव पार॥ टेक॥
रुद्राष सषा जप माला मंडै। ताको मरम न जानै कोई।
आप न देषै और दिपावै। कपट मुक्ति क्यो होई॥ १॥
—सत नामदेव की हिंदी पदावली, पद ६४।